
Wednesday, 5 August 2009
शिल्पा शेट्टी का चुंबन ले रहे हैं बाबाजी

Tuesday, 4 August 2009
जोस सारामागू की कल्पंनाशील दुनिया

जोस सारामागो पहली बार 1986 में पुर्तगाली भाषा से बाहर ‘बाल्टासर एंड ब्लिमुण्डा’ उपन्यास का अनुवाद होने से चर्चा में आए। यह एक जबर्दस्त फंतासी से सराबोर प्रेमकथा थी, जिसे यूरोप और अमेरिका-लेटिन अमेरिकी देशों में बेहद पसंद किया गया और उनकी तुलना गेब्रिएल गार्सिया मारक्वेज से की जाने लगी। इसके बाद ‘स्टोन राफ्ट’ उपन्यास अंग्रेजी में आया तो तहलका मच गया। इस उपन्यास में उन्होंने कल्पना की थी कि आईबेरिया प्रायद्वीप यूरोप से अलग होकर अटलांटिक महासागर में चला जाता है और फिर शुरू होता है वहां के लोगों के जीवन का एक विचित्र संघर्ष, जिसमें जीवन और संबंधों को बचाना महत्वपूर्ण हो जाता है। इसी बरस उनका उपन्यास ‘द ईयर आफ द डेथ आफ रिकार्डो रीस’ भी प्रकाशित होकर चर्चित हुआ, जिस पर उन्हें दो प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया। उनकी जबर्दस्त कल्पना शक्ति ने ‘ब्लाइंडनेस’ उपन्यास में एक ऐसे देश को प्रस्तुत किया, जहां सभी नागरिक अंधता की महामारी के शिकार हो जाते हैं। इसी प्रकार ‘डेथ विद इंटरप्शन्स‘ में वे एक ऐसे देश की चर्चा करते हैं, जहां सात महीने तक किसी की मृत्यु नहीं होती और लोग इस बात को सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक नजरियों देखते हुए चर्चा करते हैं कि अगर यही सब चलता रहा तो देश का भविष्य क्या होगा। लेकिन जोस सारामागो को विवादास्पद बनाया ‘द गोस्पेल अकॉर्डिंग टू जीसस क्राइस्ट’ उपन्यास ने। इसमें उन्होंने ईसा मसीह को दैवी चरित्र के बजाय एक साधारण मानव की तरह प्रस्तुत किया। इससे ईसाई समुदाय खासकर रोमन कैथोलिक चर्च के अनुयायी जबर्दस्त रूप से खफा हो गए और इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार ने उपन्यास पर प्रतिबंध लगा दिया और जोस को पुर्तगाल छोड़कर स्पेन में शरण लेनी पड़ी। अभी भी वे स्पेन में ही रहते हैं और उनके साथ रहती हैं उनकी आधिकारिक अनुवादक पत्नी पिलर डेल रियो। स्पेनिश पत्रकार रियो से जोस ने 1988 में विवाह किया था। इससे पहले 1944 में ईदा रीस से विवाह किया था, इस विवाह से उन्हें एक बेटा हुआ।
अपने लेखन में मार्क्सवादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए सारामागो ने पुर्तगाल के लिखित इतिहास को मानवीय दृष्टि से अपने उपन्यास ‘द हिस्ट्री ऑफ द सीज ऑफ लिस्बन’ उपन्यास में फिर से लिखा और अपार लोकप्रियता हासिल की। यह उपन्यास कुछ साल पहले हिंदी में भी ‘लिस्बन की घेराबंदी का इतिहास’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। उनकी कुछ कहानियां भी हिंदी में आई हैं और उम्मीद है जल्द ही उनके अन्य उपन्यास भी हिंदी में प्रकाशित होंगे। अपनी तरह के इस अद्भुत किस्सागो के तमाम उपन्यासों में एक ऐसी काल्पनिक दुनिया देखने को मिलती है, जिसे हम बहुत करीब से जानते हैं, लेकिन यह लेखक की खासियत है कि वह उस जाने-पहचाने जगत को एक नई अज्ञात दुनिया की तरह पेश करता है। और जब पाठक उस दुनिया में दाखिल हो जाता है तो उसे समझ में आने लगता है कि लेखक ने यह काल्पनिक दुनिया क्यों बनाई और आखिर इस तरह वह क्या दिखाना चाहता है। दरअसल जोस का अधिकांश लेखन आज के नागर समाज में अकेले पड़ते जा रहे मनुष्य को लेकर है। वह मनुष्य जो आधुनिकता के मोहपाश में फंसा है और मनुष्य की स्वाभाविक सामाजिक होने की प्रवृत्ति के चलते अपने आसपास के लोगों से, समाज से और इतिहास व संस्कृति से जुड़ना चाहता है। यह उस अकेले पड़ गए एक मनुष्य की नहीं बल्कि पूरे नागर समाज की नियति है, जिसे सर्जनात्मक कल्पनाशीलता के साथ डील करते हुए जोस सारामागो हमारे समय के महाकाव्यात्मक उपन्यासों की रचना करते हैं। उनकी चिंता की केंद्रीय धुरी यह है कि क्या वर्तमान आर्थिक-राजनैतिक ढांचे के बाहर कहीं भी मनुष्य को कोई गरिमामय और अर्थवान जगह मिल सकती है।
जोस सारामागो कथा के लिहाज से ही प्रयोग नहीं करते बल्कि वो तो वाक्य विन्यास, पैरेग्राफ संरचना, संवादों की प्रस्तुति और संज्ञा, सर्वनाम तक में बहुत से प्रयोग करते हैं। उनके उपन्यासों में पैरेग्राफ बहुत लंबे होते हैं, कई बार तो एक पैरेग्राफ कई पृष्ठों का होता है। वे संवाद दर्शाने के लिए भी पैरा नहीं तोड़ते, जो कि एक आम चलन है, जोस तो बस वक्ता बदलने पर पहले अक्षर को कैपिटल कर देते हैं। संज्ञा या सर्वनाम की जगह वे पात्र की चारित्रिक विशेषताओं का सहारा लेते हैं।
जोस सारामागो पिछले 40 सालों से कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य हैं और लगातार यूरोपियन यूनियन और मुद्रा कोष की नीतियों की खिलाफत करते रहे हैं। फिलीस्तीन और लेबनान में इजराइल की गतिविधियों को लेकर सारामागो ने एक लंबा और अत्यंत विवादास्पद लेख लिखा, जिसमें इजराइल की यह कहकर खासी निंदा की कि इजराइल सिर्फ यहूदियों से घृणा के कारण यह सब कर रहा है। हाल ही में उन्होंने यूरोपियन यूनियन के चुनावों में हिस्सा लिया और हार गए। लेखन और राजनीति में समान रूप से सक्रिय जोस सारामागो जैसे लेखक हमारे समय में हैं यह विश्व साहित्य का सौभाग्य है, क्योंकि आज के वक्त में सच कहने वाले लेखक दिनोंदिन कम होते जा रहे हैं।
जन्म – 16 नवंबर, 1922 को एक भूमिहीन किसान परिवार में
शिक्षा – स्नातक
पेशा – कार मैकेनिक से शुरू होकर पूर्णकालिक लेखन तक पहुंचा
राष्ट्रीयता – पुर्तगाली
पुरस्कार – पुर्तगाली पैन क्लब अवार्ड, इंडिपेंडेंट फॉरेन फिक्शन अवार्ड और 1998 में नोबल पुरस्कार
मुख्य कृतियां – कुल करीब पचास कृतियां, जिसमें तीन कविता संग्रह, अठारह किताबें कहानी-उपन्यास की, एक डायरी, सात निबंध संग्रह, पांच नाटक संग्रह और एक दर्जन के करीब अन्य पुस्तकें प्रकाशित।
Sunday, 2 August 2009
साहित्य में दोस्ती और लवलीन की अन्तिम कविता
साहित्य की दुनिया में देखें तो सबसे बड़ी दोस्तियों में ज्यां पाल सार्त्र और सीमान दा बोउवा की दोस्ती रही। एक महान दार्शनिक और दूसरी स्त्री स्वाधीनता की प्रबल पक्षधर इन दो महान हस्तियों ने साहित्य की दुनिया की सबसे प्रसिद्ध मित्रता निभाई। जब सार्त्र ने सीमोन से पूछा कि तुम मुझसे शादी करना चाहती हो या जिंदगी भर की दोस्ती, तो सीमोन ने जवाब में दोस्ती मांगी और दोनों बिना शादी किये आजीवन साथ रहे। विश्व साहित्य में इस किस्म की दोस्तियों के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। हमारे यहां भी खासकर हिंदी उर्दू साहित्य में अपने समय की मशहूर हस्तियों ने जबर्दस्त दोस्तियां निभाई हैं और इनके विविध प्रसंगों को लेकर काफी लिखा गया है। खुद लेखकों ने एक दूसरे पर संस्मरण लिखते हुए दोस्ती का फर्ज अदा किया है। दोस्ती को साहित्य में परवान चढाने में डाक विभाग का सबसे ज्यादा योगदान है। पत्र लेखन से ही लेखक, बुद्धिजीवियों के बीच आपसी संवाद बढ़ा और संबंधों में मजबूती आई। यूं मित्रों के बीच पत्राचार की परंपरा हमारे यहां मिर्जा ग़ालिब के जमाने से चली आई है। उर्दू साहित्य में तो पत्रवाहक यानी कासिद के साथ महबूबा के चले जाने की भी परंपरा मिलती है। ग़ालिब का वो मशहूर शेर हर बार याद आता है,
कासिद के आते-आते खत इक और लिख रखूं
मैं जानता हूं वो जो लिखेंगे जवाब में
बहरहाल, उर्दू में मंटो पहले लेखक थे, जिनके साथ अपनी मित्रता को लेकर उनके परम मित्र उपेंद्रनाथ अश्क ने एक पूरी किताब लिखी ‘मंटो मेरा दुश्मन’। ये अपने वक्त की बेहद मशहूर किताब रही और हिंदी-उर्दू में इसको खूब सराहा गया। इस किस्म की किताबों से पाठकों को एक लेखक के व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं का पता चलता है। इसी तरह उर्दू अदब में जोश मलीहाबादी की किताब ‘यादों की बारात’ अपने वक्त की सबसे मशहूर किताबों में शुमार की जाती है जिसमें जोश ने अपनी आत्मकथा लिखते हुए अपनी जबर्दस्त दोस्तियों का भी खासा जिक्र किया है। कुछ बरस पहले अली सरदार जाफरी की किताब ‘लखनउ की पांच रातें’ आई तो रातों रात मशहूर हो गई। इस किताब में सरदार ने अपने छात्र जीवन के प्रसंगों और उस दौर की अपनी दोस्तियों को लेकर बहुत ही खुबसूरत ढंग से संस्मरण लिखे हैं। जांनिसार अख्तर, कैफी आज़मी, सिब्ते हसन और मजाज लखनवी जैसे नामचीन शायर और अदीबों के उन दिनों का जबर्दस्त वर्णन है जब ये लोग अदब की दुनिया में दाखिल हो रहे थे। उर्दू में ऐसी ही एक और प्रसिद्ध किताब है मुज्तबा हुसैन की ‘चेहरा दर चेहरा’ जिसमें उर्दू साहित्य की महान हस्तियों के खाके यानी व्यक्तिचित्र देखने को मिलते हैं। इन खाकों में उन अदीबों के साथ गुजारे गए वक्त और उनकी लेखन प्रक्रिया आदि बातों को बेहद रोचक ढंग से लिखा गया है।
हिंदी साहित्य में माहन आलोचक रामविलास शर्मा और कवि केदारनाथ अग्रवाल की मित्रता चर्चित रही है। इन दोनों की दोस्ती को उनके पत्राचार की पुस्तक ‘मित्र संवाद’ से गहराई से जाना जा सकता है। इन पत्रों से इस बात का पता चलता है कि किस प्रकार एक आलोचक कवि को शक्ति प्रदान करता है और कैसे एक कवि अपने आलोचक मित्र की मदद करता है। इन पत्रों को पढते हुए एक पूरे युग की साहित्यिक बहसों और हलचलों का भी पता चलता है। इसी तरह प्रसिद्ध कहानीकार और नाटककार मोहन राकेश के पत्रों को पढा जा सकता है। हिंदी में पत्र साहित्य बहुत समृद्ध नहीं है और लेखकों के पत्राचार की किताबें भी कम ही छपती हैं, इसलिए दोस्ती के अनेक पहलू अज्ञात रह जाते हैं। लेकिन इधर हिंदी में संस्मरण विधा का जबर्दस्त विकास हो रहा है और कई बड़े लेखकों ने संस्मरण लिखकर अपनी मित्रता के संबंधों को उजागर किया है। इस लिहाज से रवींद्र कालिया की ‘ग़ालिब छुटी शराब’ ने एक इतिहास बनाया है। शराबनोशी के प्रसंगों के बहाने कालिया ने अपने मित्रों का बेहद रोचक वर्णन किया है। इस पर काफी हंगामा भी हुआ और कई लेखकों ने जवाबी हमले के अंदाज में संस्मरण लिखे। कवि नीलाभ ने कथाकार और ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन को लेकर एक लंबा संस्मरण लिखा जिसमें ज्ञानरंजन की याद को एक प्रेमिका की याद की तरह बताया है। कथाकार स्वयं प्रकाश ने कुछ दोस्तों और कुछ बड़े लेखकों को लेकर ‘हमसफरनामा’ लिखी, जिसमें उनके लेखन और अपनी दोस्ती को बहुत जिंदादिली के साथ याद किया है। मित्रता के प्रसंगों को लेकर काशीनाथ सिंह के संस्मरण भी खासी लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं तो कांति कुमार जैन के संस्मरणों की बात ही निराली है। दोस्ती का यह सिसिला जारी है और मोबाइल-इंटरनेट के जमाने में अब पुराने दिनों को याद कर लेखक संस्मरण लिख रहे हैं।
पिछले साल जब लेखक-पत्रकार अशोक शास्त्री का निधन हुआ और उनकी याद में एक कार्यक्रम हुआ तो हिंदी की मशहूर लेखिका लवलीन ने अपने प्रिय साहित्यकार-पत्रकार मित्रों को याद करते हुए एक लंबी कविता मुझे दी कि इसे मंच से पढकर सुनाओ। लवलीन की संभवत: यह अंतिम कविताओं में से एक है और अभी तक कहीं प्रकाशित नहीं हुई। इस कविता से साहित्य में मित्रता के कई पहलुओं को देखा जा सकता है। इस कविता में राजस्थान के अनेक लेखक मित्रों का जिक्र है और मित्रों के बहाने खुद लवलीन अपने लिए जीने की ताकत ढूंढ रही थी।
दिवंगतों के लिए
मेरे दोस्तों, परिजनों, सखियों
देखो मैं वापस लौट आई हूं मैात के मुंह से
वापस आकर धरती पर पाया
मृत्यु ही मृत्यु का तांडव
तुम सब एक के बाद एक
दिंवगत हो रहे हो
जैसे इस बदसूरत
लहूलुहान धरती पर जीना मुहाल है
सच्चे, सुंदर, सह्रदय, ईमानदार बने रहकर जीना अभिशाप हो
चक्की के पाट में तुम्हें ही आना था मेरी पत्रकारिता के गुरू।
ओ रघुनंदन, ओ संजीव, ओ चारूमित्रा
ओ अशोक शास्त्री
ओए रब्बा तूने तो मुझे कंगाल कर दिया
ओ यूं खेल से अधबीच उठकर जाने वालों
तुम धरती पर छोड़ गए हो इतना विराट शून्य
जिसे भर नहीं सकता थार का मरूस्थल भी
और हमें इतना क्षुद्र भी बना दिया कि तुम्हारी स्मृतियां
स्मरण, आख्यान ही बटोर सकते हैं हम
जीवन अनंत संभावना है
तुम सब तो अभी उत्कर्ष पर थे
श्रेष्ठ अभी निसृत होना था
फिर कैसी चली हवा
दीया गया
हम मित्रों के सुरों की सरगम
तीस बरस पुरानी थी
‘भूमिका’ मेरा मायका है- रहेगा
घर तो पहले से नहीं था
मित्रों, द्विजजनों, सखियों से ही
एक कुनबा बसाया था
ज्यों कोई कम्यून
अब वह भी टूट गया
भस्मीभूत हो गया ।
भादानी जी, नंदकिशोर आचार्य, शास्त्री, सीमंतिनी
अंजू, संजीव, कल्पित, अजंता, सत्यनारायणजी
और ना जाने कितने जाने-अनजाने
वो गोष्ठियां-गप्पबाजियां
साहित्याकाश का सितारा बनने
के जुनून की शाब्दिक कसरतें और
मन को मथ मथ कर छोटा छोटा रचना और सुनना सुनाना
तुम्हारा विद्वता भरा बड़प्पन और बड़बोलापन
मैं शायद इसी शाप के साथ
लौट आई हूं कि
तुम सबकी स्मृतियों के एलबम से
एक एक चित्र निकाल कर
तुम सबको याद कर कर ताउम्र कलपती रहूं
तुम्हारी बरसी-श्रा’द्ध मनाती रहूं
अब मैं क्या करूं
विधवाओं की डबडब आंखें
दुख से कातर चेहरे
और चेहरों पर काली झाइ यां देखकर
मेरा दिल दिमाग जलता है
और ईष्वर को शाप देता है
देता है शाप कि तूने मुझे मिला या ही क्यों
मेरी सखियां-सुख-साथ-प्रेम के
सब रंगों का कोलाज बन जाने के
सुखद पलों का इतना बड़ा खजाना देकर
जिंदगी के अधबीच ही डोर तोड़ डाली।
मित्र, परिजनों मैं जानती हूं
तुम सब मेरे सपनों में आओगे
मेरी अंतरंग आत्मा से बतियाओगे
मैं तुम्हारी रचनाएं बार बार पढ़ूंगी
तुम्हें जीवित कर तुम्हारा
साक्षात साथ पाने के लिए
जैसे कोई रोज पूजा-अर्चना करता है
स्मृति दीप जलाना है
सुबह उठकर नित्य नियम की तरह
जिन संबंधों-साथ-मित्रताओं की
जड़ें होती हैं बरगद-सी
उनका उत्तान उनके जाने के बाद भी
आसमान के सितारों से जुड़ जाता है
ओ दिवंगतों एक बार लौट आओ
अब अगर कोई जवान मौत हुई
खिला फूल मसला गया
मैं अपनी तेज गरम गरम नेजों सी आंखें
ईश्वर की घात भरी नजर से लड़ाउंगी
ईश्वर मैं तुम्हारी हत्या कर दूंगी
अशोक शास्त्री की स्मृति में मैं
‘भूमिका’ से एक पौधा ले आई हूं
जो अब पनप गया है मेरी बगिया में
इस तरह ही सही
तुम मेरे निकट सदा रहोगे।
Sunday, 26 July 2009
आ फोटू अठै कयां - सत्यनारायण सोनी की कहानी

14 अक्टूबर, 2007, आज ईद है। ईद से दो दिन चहले अजमेर शरीफ में बम फटा। दो मरे, बाइस जख्मी हुए। यह दर्दनाक हादसा देश के लिए शर्मनाक था। लोग इसमें पाकिस्तान का हाथ बताते। लेकिन... लेकिन, पाकिस्तान-हिंदुस्तान छोड़िए... पाकिस्तान में कौनसे इंसान नहीं बसते और हिंदुस्तान में कौनसे शैतान नहीं रहते। पाकिस्तान का ही एक इंसान ईद से एक दिन पहले की शाम नवभारत टाइम्स की ओर से आयोजित ‘दिल्ली मेरा दिल' कार्यक्रम में गजलें पेश करता है... गुलाम अली। श्रोता झूम रहे हैं। मेरे दोस्त, अंग्रेजी के प्राध्यापक राजेंद्र कासोटिया वहीं विराजमान हैं। वो मुझे मोबाइल पर गजलें सुनवाते हैं... लाइव। एक गजल के शेर थे-
कैसी चली है अबके हवा तेरे शहर में
बंदे भी हो गए हैं खुदा तेरे शहर में
क्या जाने क्या हुआ कि परेशां हो गए
इक लहजा रुक गई थी सबा तेरे शहर में
न दुश्मनी का ढब है न कुछ दोस्ती के तौर
दोनों का इक रंग हुआ तेरे शहर में
शायद उन्हें पता था कि खातिर है अजनबी
लोगों ने उसे लूट लिया तेरे शहर में।
शायर तो शायर है, इसमें हिंदुस्तान-पाकिस्तान क्या, और क्या हिंदू-मुसलमान?
लेकिन उस आदमी का क्या करें... जो पिछले दिनों रामस्वरूप किसान के बाहर वाले कमरे में आकर बैठ गया। कमरे में लगी तस्वीरों की तरफ अंगुली करते हुए पूछा, ये किसकी फोटो है? किसान जी ने बताया, किशोर कुमार की। उसने दूसरी फोटो की ओर इशारा कर पूछा, और ये? मोहम्मद रफी की। किसान जी रफी के जबर्दस्त फैन हैं, उनका बेटा कृष्ण भी। रफी का नाम लेते ही किसान जी के चेहरे पर चमक आ गई और आंखों में नूर। जैसे रफी का नाम लेने से ही उन्हें गर्व महसूस हुआ। लेकिन... लेकिन उस शख्स की आंखों में जैसे जहर बुझे तीर थे और वैसे ही उसके बोल, 'इस तुर्क की फोटो, आपके घर?' सुनते ही किसान जी के चेहरे की रंगत बदल गई, ‘भाई साब, पानी पीजिए और यहां से तुरंत चलते बनिए, मैं आपसे बात नहीं कर सकता।' और वो आदमी चला गया।
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आज ईद है। मेरी नींद भी नहीं खुली थी कि विजय का फोन आ गया।
'गुरूजी ईद मुबारक।'
'तुझे भी... और सुना।'
'गुरूजी ईद मुबारक का एक धांसू एसएमएस तैयार करके भेजो ना।'
क्यों भाई, तेरे को क्या जरूरत है?
'क्यों ईद अपनी नहीं है क्या?' वो हंसते हुए बोला और मैंने भी हंसते हुए कहा, 'अभी भेजता हूं।' इतने में ही महबूब अली का मैसेज आया,
'आज खुदा की हम पर हो मेहरबानी
करदे माफ हम लोगों की सारी नाफरमानी
ईद का दिन आज आओ मिल करें ये वादा
खुदा की ही राहों में हम चलेंगे सदा
सारे अजीजों अकरीबों को ईद मुबारक।'
इसी के साथ मलसीसर से आमीन खान का मैसेज आ गया-
'ईद-दिवाळी दोनूं आवै, ईं महीनै रै मांह।
हिन्दु-मुसळिम सगळा मिलै, घाल गळै में बांह।'
मैंने दोनों मैसेज विजय को भेज दिये।
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घर में रौनक है। आज बेटी नीतू अपनी सहेली मैमुना के घर जीमण पर जा रही है। वो तैयारी कर रही है। इसी बीच मुझे एक बात याद आई, जो नीतू को लेकर उसकी मैडम ने कही थी, 'नीतू की संगत सुधारो।' मैंने मैडम से तो ज्यादा सवाल नहीं किये, लेकिन मेरी चिंता बहुत बढ़ गई। शाम को मैंने बड़े प्रेम से नीतू को मैडम की बात बताई। सुनते ही वो तो रोने लगी...। ' पापा, मैडम मैमुना के कारण यह सब कहती हैं।' मुझे आश्चर्य हुआ, 'क्यों?' नीतू बोली, 'पापा, मैडम को मुसलमानों के बच्चे अच्छे नहीं लगते।'
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प्रमोद को भी मुश्ताक ने न्यौता दिया है। मिठाइयां उड़ेंगी। उसने भी मुश्ताक के लिए तोहफा पैक करवा लिया है। वो तैयार हुआ इतने में ही मुश्ताक आ गया अपनी गाड़ी लेकर, साथ में उसके दो और दोस्त भी थे। नीतू मैमुना और प्रमोद मुश्ताक के घर चल दिये।
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दिवाली के दिन नजदीक आ गए हैं। हारून आज भी नहीं आया। रंग पता नहीं कब होगा। पत्नी कहने लगी, 'पंद्रह साल हो गए, इस घर का तो मुहूर्त ही पता नहीं कब निकलेगा।' मैंने कहा, 'आज तो ईद है, हारून आज तो आएगा नहीं। ईद के अगले दिन काम लगाने की कह रहा था।' पत्नी बोली, 'तो पूछ लो ना फोन करके, अगर कल शुरू करे तो मैं आज ही सामने वाले दोनों कमरे खाली कर लूं। कंप्यूटर और बेड बाहर के कमरे में जचाना पड़ेगा।' हां भई पूछता हूं, कहकर मैंने हारून को मोबाइल लगाया। घण्टी की जगह ‘हरे रामा हरे कृष्णा' सुनाई पड़ा तो मैंने फोन काट दिया। सोचा, यह रिंगटोन हारून की नहीं हो सकती, शायद गलत नंबर लग गया है। फिर नंबर मिलाया, वही रिंगटोन। मैंने अजय को आवाज दी, वो आया। मैंने कहा कि बेटा जरा हारून का नंबर तो डायरी में देखकर बता। फिर नंबर मिलाया, फिर वही रिंगटोन। उधर फोन रिसीव हुआ और मेरे बोलने से पहले ही उसकी आवाज आई, 'गुरूजी राम राम।' मैंने भी राम-राम कहकर उसे ईद की मुबारकबाद दी। बदले में उसने मुझे ईद मुबारक कहा। मैंने पूछा, 'फोन तो तेरा ही है ना और ये रिंगटोन?' उसने कहा, 'क्यों गुरूजी अच्छी नहीं लगी?' मैंने बात टालने के मकसद से कहा, 'नहीं अच्छी है। हारून तू कल से काम लगा रहा है, तो सामान बाहर निकालना शुरू कर दें?' उसने कहा, 'हां गुरूजी, बाहर निकाल लो, कल सुबह आठ बजे आ जाउंगा।' मैंने कहा, 'ठीक है' और फोन काट दिया।
मैं सामान बाहर निकालने लगा। मैं एक कमरे की अलमारी खाली कर रहा था, इसी कमरे में सामने की तरफ पूजा का स्थान है। मतलब यहीं पर शिवजी और गणेशजी की मूर्तियां हैं। मां दुर्गा, लक्ष्मी और हनुमानजी की तस्वीरें लगी हुईं हैं। मैं कभी पूजापाठ नहीं करता और मेरी पत्नी को इस बात से बहुत शिकायत रहती है। वो है पक्की धार्मिक। स्कूल का दरवाजा नहीं देखा, लेकिन बच्चों की देखरेख करते हुए घर में ही पढ गई, और कुछ नहीं अक्षर तो बांच ही लेती है। कल ही बारह महीनों के व्रत त्योहारों की किताब खरीदी है। वो भी यहीं जमा रखी है।
अलमारी खाली करते हुए मेरी नजर पूजास्थल पर पड़ी। हनुमान जी और दुर्गा जी की तस्वीर के बीच मुझे एक नई तस्वीर नजर आई। हाथ में उठाकर देखी, एक पुराने पोस्टकार्ड पर अखबार की एक रंगीन कतरन चिपकी हुई थी। जिसके शीर्ष पर चांद और सितारे का चित्र और हिंदी और उर्दू में ऊपर-नीचे मोटे अक्षरों में ‘ईद मुबारक' लिखा हुआ था। मेरे हर्ष का पारावार नहीं था।
मैंने वो तस्वीर उठाई और आंगन में आकर पूछा, 'ये तस्वीर किसने लगाई पूजाघर में?'
'मैंने लगाई।' पत्नी के बोल थे। वो मुस्कुराती और मेरा मुंह देखती हुई फिर बोली, 'लेकिन आपको क्या तकलीफ है?'
मुझे क्या तकलीफ हो सकती है और इस बात से किसी को भी क्यों कोई तकलीफ होगी?
कहानी अंश
घर में रुणक है।
आज बेटी नीतू नै आपरी सहेली मैमुना रै घरां जीमण जावणो है। बा त्यारी करै।
इणी बीच म्हानै एक बात चेतै आवै, जकी नीतू री मैडम म्हनै कैयी ही कै नीतू री संगत सुधारो।
म्हैं घणा सवाल-जवाब नीं कर्या हा उण मैडम सूं, पण म्हारी चिंता बधगी ही। आथण घणै हेत सूं नीतू नै वा ओळमं-वाळी बात बताई। सुणर वा तो रोवण लागगी।...
'पापा, मैडम मैमुना खातर कैवै।'
म्हनै अचूंभो हुयो, ...'क्यूं?'
'मैडम नै मुसळमानां रा टाबर आछा कोनी लागै।'
.............................
लेखक परिचय
सत्यनारायण सोनी
जन्म 10 मार्च, 1969
प्रकाशित कृतियां
घमसाण (राजस्थानी कहानी संग्रह), पेडों का पालनहार लादू दादा, पैसों का पेड़, रंग बिरंगे फूल खिले
पुरस्कार-
१. मारवाड़ी सम्मेलन, मुम्बई का स्व. घनश्याम दास सराफ सर्वोत्तम राजस्थान साहित्य पुरस्कार- 1997
२. ज्ञान भारती, कोटा का स्व. गोरीशंकर कमलेश राजस्थानी साहित्य पुरस्कार- 1997
३. राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर का पैली पोथी पुरस्कार- 1997
दैनिक नवज्योति के रविवारीय परिशिष्ट में 26 जुलाई, 2009 को एक कहानी स्तंभ में प्रकाशित।
Tuesday, 21 July 2009
सजा-यात्रा - पुष्पा देवड़ा की कहानी

राजस्थान में साहित्यकार दंपतियों में रांगेय राघव और सुलोचना रांगेय राघव के बाद शरद देवड़ा और पुष्पा देवड़ा का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। आज हम पुष्पा देवड़ा की एक कहानी और उनके बारे में चर्चा करेंगे। स्व. शरद देवड़ा जैसे महान साहित्यकार की जीवनसंगिनी पुष्पा जी का जन्म पश्चिमी बंगाल के रानीगंज कस्बे में 13 जनवरी, 1945 को हुआ। कोलकाता में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और देवड़ा जी के साथ परिणय सूत्र में बंध जाने से बचपन का साहित्य प्रेम परवान चढ़ने लगा। बांग्ला और हिंदी दोनों भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार है। बहुत कम लोगों को जानकारी है कि विमल मित्र को हिंदी में लाने का श्रेय ही पुष्पा जी को है। आपने विमल मित्र, ताराशंकर वंद्योपाद्याय और अनेक महत्वपूर्ण बांग्ला लेखकों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। लगभग बीस उपन्यास और सैंकड़ों कहानियों को बांग्ला से आप हिंदी में लेकर आईं। अनुवाद और परिवार की व्यस्तता के चलते मौलिक लेखन काफी देर से प्रारंभ हुआ, इसलिए हिंदी में उनकी कहानियों का पहला संग्रह सोनाली गाथा तथा अन्य कहानियां 2005 में प्रकाशित हुआ। इन दिनों वे दांपत्य संबंधों पर एक उपन्यास और शरद देवड़ा के जीवन पर एक किताब लिख रही हैं। उनके कथा संसार में आपको दांपत्य जीवन के विविध दृश्य देखने को मिलते हैं। नारी मन को पुष्पा जी बहुत गहराई से भेदते हुए अत्यंत मर्मस्पर्शी प्रसंग निकालकर लाती हैं और पाठकों के मन में दर्द का एक गहरा अहसास पैबस्त कर देती हैं। किस प्रकार पुरुष स्त्री को छलता है और किस प्रकार वे छली जाती हैं, क्यों दांपत्य में जरा-सी बात से भयानक तनाव पैदा हो जाता है, इसे पुष्पाजी से बेहतर और कौन बयान कर सकता है। इसी को प्रमाणित करती हुई कहानी ‘सजा-यात्रा का सार-संक्षेप प्रस्तुत है।
मैं अपने पात्रों के साथ दिमागी उधेड़बुन में लगी थी कि सड़क से बढे़ आते हुए उस अजीबोगरीब शख्स की शक्ल उभरने लगी। टोपी, कमीज, धोती और अकड़ी हुई गर्दन में सोने की चेन, हाथों में बैग और पांवों में रबड़ के जूते। कल ही इनके बारे में जब पता चला तो इनकी अजीब शख्सियत का अहसास हुआ। इनसे ध्यान हटा तो उपर से आने वाले हंसी-ठट्ठे में अटक गया, रोज की तरह, कल भी तो ऐसा ही हुआ था।
हमारे उपर वाले फलैट की मिसेज मित्तल ही खुद परिचय करने आईं। मेरा तो खुद आगे बढकर बात करने में संकोच होता है। उन्होंने सिलसिला हमारी बेटी से शुरु किया जो दूसरी कक्षा में पढती है। यहां आने के दूसरे दिन ठेले वाले से सब्जी खरीदने मैं भी पहुंची बेटी के साथ। वो अनुराग से बेटी के बहाने बतियाने लगीं। वापसी में मेरे कहने पर वे हमारे यहां आईं। पता चला वे जौहरी परिवार से हैं। मेरे बारे में खुद ही कहने लगीं कि आपके बारे में सुना कि आप तो पति-पत्नी लेखक हैं, तभी सोच लिया कि आपसे दोस्ती करूंगी। वो हर प्रकार के सहयोग का वादा कर चली गईं तो बड़ी देर तो मैं उनके हंसमुख स्वभाव के बारे में सोचने लगी। मेरा लेखक मन और जानने के लिए व्याकुल हो उठा।
दूसरे दिन शाम जब मैं लिखने में और बेटी होमवर्क में लगी थी तो उपर से उन्होंने आवाज लगा हमें बुला लिया। जाने पर पता चला कि उनके खुशमिजाज बेटे-बेटी भी घर पर हैं। दोनों कालेज में पढ रहें हैं। घर के भीतर का जायजा लेने पर लगा ही नहीं कि ये जौहरी परिवार से हैं। सब कुछ अत्यंत साधारण। शोख बेटी, चंचल बेटा और हंसमुख मां से बातों के बीच चाय-नाश्ते में पता ही नहीं चला कैसे वक्त गुजर गया। एक गरजदार आवाज में जब दरवाजे पर खोलो शब्द गूंजा तो घर से अचानक हंसी गायब हुई और गंभीरता छा गई। बेटे ने कहा, बाउजी आ गए। प्रतिक्रिया में मैं भी अपने घर चल पड़ी। तभी इन महाशय पर एक नजर गई जो अभी सड़क से आ रहे हैं। घर तक आते हुए कई प्रश्न मेरे दिलोदिमाग में उमड़ते रहे। दो दिन गुजर गए। लेकिन आज उसी वक्त देखा कि बेटी ने जैसे ही घण्टी की आवाज सुन दरवाजा खोला मिसेज मित्तल और उनके बेटा-बेटी खड़े थे। बेटे पुनीत ने कहा कि हम पान खाने आए हैं। और इस तरह हमारी निकटता बढती गई।
एक दिन शाम छह बजे उन्होंने फिर बला लिया। आज वो बेहद उदास लग रही थीं। मैं बालकनी में उनके पास बैठी थी। मैंने पूछा बच्चे कहां गए, पता चला दोस्तों के यहां पढने गए हैं। इसके बाद तो उनका दुखों का बांध टूट पड़ा। कहने लगीं कि बहन मैंने तो अपनी नियति से समझौता कर लिया है, लेकिन बच्चे बड़े हो गए हैं। इनकी उपेक्षा और डांटडपट बर्दाश्त नहीं होती। बेटा तो इनकी सुनता नहीं, पर बेटी क्या करे। सुबह बेटा कालेज जा रहा था कि इन्होंने अपने साथ आफिस चलने के लिए कहा। बेटे ने कहा दो पीरियड बाद आ जाउंगा तो बिफर गए, कहने लगे, कौनसी नौकरी करनी है। लड़का भी बिफर गया और बोला, अब तो सीधे घर आउंगा और कहीं नहीं। इस पर वे और बिगड़ गए और लड़के को घर से निकल जाने के लिए कह दिया। मैं दोनों के बीच आ गई और कह दिया कि अगर ये घर से जाएगा तो मैं भी इसके साथ जाउंगी। इस पर कहने लगे, तुम मेरे पीछे आई हो या इसके, और गुस्से में ये बिना कुछ खाए घर से निकल गए। उदासी उनके चेहरे पर मुर्दनी की तरह छा गई थी। कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने अपने दर्द की परतें एक-एक कर खोल दीं।
मिसेज मित्तल ने कहा कि मैं अपने मां-बाप की इकलौती संतान हूं। विवाह के बाद अकेले पड़ गए हैं दोनों। वे चाहते हैं कि बेटा उनके साथ रहे और पढाई के साथ उनके हीरे-जवाहरात के कारोबार को भी संभाल ले। अगर मैं इसे वहां भेज दूं तो मेरा मन कैसे लगे, कभी सोचती हूं कि भेज ही दूं, जिंदगी तो संवर जाएगी। मैंने पूछा कि भाई साहब ऐसा क्यों करते हैं। कहने लगीं कि वे खुद को मालिक समझते हैं और यह भी कि हम सब उन पर आश्रित हैं। मुझे तो शुरु के कुछ सालों के अलावा इनका यही व्यवहार लगा है। और किसी पर तो इनकी हुकूमत चलती नहीं इसलिए सारा गुस्सा घर वालों पर निकालते हैं। आप ही बताइये कहां तक सहन करें, मैं पूरब चलूं तो ये पश्चिम चलेंगे। घर में डबल बैड की बात करो तो कहेंगे, जमीन पर सोना अच्छा लगता है। फ्रिज आने से बासी सब्जियां खाने को मिलेंगी, ट्यूबलाइट की रोशनी नहीं सुहाती। घर की सामान्य सुविधा की चीजें भी इन्हें इसलिए बुरी लगती हैं कि कहीं इन्कम टैक्स वालों को पता नहीं चल जाए। मुझसे रहा नहीं गया, डरते-डरते पूछ ही लिया, ऐसे में आपके निजी संबंध मेरा मतलब दैहिक संबंध। कहने लगीं कि इनके साथ तो मुझे अपनी हालत बाजारू औरत से भी गई गुजरी लगती है। उसकी कम से कम पैसे के लिए ही सही अपनी मरजी तो शामिल रहती है। समृद्ध परिवार की मिसेज मित्तल की जिंदगी के अंदरूनी कलह, दुख, क्रोध और घृणा के साथ उनकी बेबसी से मेरा मन अवसाद से भर गया। कैसे उनका दुख बटाउं, सामने सड़क पर मेरे पति आते दिखे तो मैं उनसे इजाजत ले घर आ गई।
मैं मिसेज मित्तल के बारे में गहराई से सोचने लगी। क्या सिर्फ कुसूर मित्तल साहब का ही है, क्या इसमें मिसेज मित्तल का कोई दोष नहीं, क्या वो किसी भी प्रकार से इन सब चीजों से निजात नहीं पा सकती थीं, उनकी त्रासदी मेरे मन को मथती रही और कोई समाधान नजर नहीं आया। इस बीच मेरे पति का दिल्ली तबादला हो गया और हम दिल्ली चले गए। फिर पांच साल तक जयुपर आना ही नहीं हुआ।
पांच साल बाद जब हम गाड़ी से जयपुर आ रह थे तो मुझे मिसेज मित्तल की याद सताने लगी। पता नहीं वो अब किस हाल में होंगी, उस बिल्डिंग के पास से गुजरते हुए मैंने देखा कि बालकनी में कोई चेहरा नहीं नजर आया। दूसरे दिन पतिदेव को किसी काम से जाना था, तो मैंने कहा कि मुझे मिसेज मित्तल से मिलना है आप मुझे वहां छोड़ दीजिएगा और वापसी में ले लेना।
दोपहर के तीन बजे मैं मिसेज मित्तल के बारे में सोचती हुई उनके दरवाजे पर पहुंची और कालबेल बजाई। दरवाजा खुलने पर उदास और निढाल मिसेज मित्तल दिखाई दीं। मेरे नमस्कार पर जबरन मुस्कुराने की कोशिश करती हुईं बोलीं, अरे इतने साल बाद अचानक कहां से प्रकट हो गईं, फिर हमारी बातों का सिलसिला चल पड़ा। उनमें कोई बदलाव नहीं आया था। घर की हालत अब भी वैसी ही थी। मैंने पूछा कि आपकी यह हालत कैसे हुई, घर में कोई नहीं है क्या, कहने लगीं कि बेटा तंग आकर आखिरकार मुंबई चला गया, बेटी की शादी हो गई। मित्तल साहब दो साल से सर्वाइकल स्पोंडेलाइटिस से पीड़ित होकर घर में ही रहते हैं। बिजनेस खत्म हो गया, अब हुंडियों का कारोबार करते हैं। पूरे दिन बही खातों में घुसे रहते हैं। ना कोई दवा लेते हैं और ना ही एक्सरसाइज करते हैं। पहले से ज्यादा तुनकमिजाज हो गए हैं। अब इनके कारण घर छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकती। ये घर मेरी कैद बन गया है।
मैंने पूछा कि दिन कैसे कटता होगा। बोलीं, खाना बनाकर इन्हें खिलाने के बाद इस खिड़की पर आकर बैठ जाती हूं। राह चलते लोगों को देखना, किताब, पत्रिकाएं पढना या पुराने एलबमों में तस्वीरें देखना, बस यही रह गया है। वो चाय के लिए उठने लगी तो मैंने ही मना कर दिया। इतनी देर में भी मित्तल साहब की मौजूदगी का अहसास नहीं हुआ तो पूछा कि क्या वो सो रहे हैं। दिन में क्या हमे तो रात में भी सोने के लिए गोलियां लेनी पड़ती हैं। मैंने पूछा कि क्या आपस में एक दूसरे की तकलीफ को लेकर बात भी नहीं करते, कहने लगीं, जिस आदमी को मेरी मानसिक तकलीफ का कभी खयाल नहीं आता वो शारीरिक तकलीफ के बारे में क्या पूछेगा, उसी वक्त मुझे नीचे गाड़ी का हार्न सुनाई दिया, ये मुझे लेने आ गए थे।
जाते वक्त मेरी नजर मिसेज मित्तल की खिड़की पर ही टिकी रहीं। जाली के पीछे वह छाया सी दिख रही थीं। मेरा मन गहरी उदासी से भर गया। इस नारी की सजा यात्रा कहां खत्म होगी, पत्नीत्व, मातृत्व कोई सुख नहीं। एक ही छत के नीचे तलाकशुदा जैसा जीवन। आखिर इसका कसूर क्या है।
कहानी अंश
वे क्षुब्ध स्वर में बोलीं, जिस तरह की जिंदगी मैं जी रही हूं, उसमें किसी भी तरह के संबंध में मेरी भागीदारी की तो गुंजाइश ही कहां है, उस वक्त मुझे अपनी स्थिति बाजारू औरत से भी गई गुजरी लगती है। उसमें उसकी मरजी तो शामिल रहती है, चाहे पैसे के लिए ही हो। मगर मैं, मुझे तो हर वक्त इनके साथ दो ध्रुवों की सी मानसिकता में जीना पड़ता है, लेकिन रात में सोते समय जब मरजी हो पति नाम का यह जीव मुझे अपनी लपेट में ले लेता है।
...
पुरुष द्वारा क्रिएट दर्दनाक परिस्थितियों को झेलती इस नारी की सजा यात्रा आखिर कहां जाकर खत्म होगी। उनकी दयनीय हालत और दर्दनाक परिस्थितियां मेरे संवेदनशील मन को यह सोवने पर विवश कर रही थीं कि क्या नारी जीवन इतनी बड़ी यातना भी हो सकता है, न पत्नीत्व का सुख है, ना मातृत्व की तुष्टि। उम्र के इस पड़ाव पर घर की रानी होने का गौरव महसूस करने की बजाय पति के साथ एक ही छत के नीचे तलाकशुदा-सा जीवन बिताने पर मजबूर इस स्त्री का आखिर कसूर क्या है।
Monday, 20 July 2009
पहला नोबल विजेता कवि स्युली प्रूदोम

विश्व साहित्य में प्रूदोम जैसी मानसिक बनावट वाले कवि बहुत हुए हैं, लेकिन प्रूदोम उन दुर्लभ कवियों में हैं, जो ना तो चिंतन कर कविता लिखते हैं और ना ही कविता में चिंतन करते हैं, अपितु उनके काव्य में मनुष्य की आत्मा की गहराइयां, प्रकृति के रहस्य, मनुष्य की नियति और उसके होने की अर्थवत्ता एक वैज्ञानिक दृष्टि के साथ प्रस्तुत होती हैं। उनकी कविता से पाठक को एक रहस्यमयी जगत के बीच चलने वाले मनुष्य के क्रिया व्यापार को गहराई से देखने-समझने की एक नई दृष्टि मिलती है। वे मूलत: विज्ञान, दर्शन और आत्मिक संवदनाओं के कवि हैं। प्रूदोम फ्रेंच कविता के इतिहास की विश्वप्रसिद्ध धारा ‘पारनासियनवाद’ के बड़े कवियों में थे। यह उन्नीसवीं सदी की सकारात्मकतावादी काव्यधारा थी, जिसने रोमांटिक और बिंबवादी कविता के संधिकाल में जबर्दस्त हस्तक्षेप किया और भविष्य की कविता के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
पारनासियन कवि कलावाद के प्रणेता गातियर से प्रभावित थे, लेकिन इन कवियों ने शापेनहावर के दर्शन से प्रभावित होकर अपनी कविता को अतिशय भावुकता से मुक्त करते हुए क्लासिकी विषयों पर कविता लिखी। प्रूदोम के साथ के दूसरे पारनासी कवियों में चार्ल्स लिस्ले, बेनविले, मलार्मे, वरलेन, कोप्पे और हेरेडिया प्रमुख थे। पारनासियन कविता की धारा ने अपने काल में ऐसा जबर्दस्त प्रभाव पैदा किया कि फ्रांस की सीमा से पार वह समूचे यूरोप और लेटिन अमेरिका में छा गई। लेटिन अमेरिकी साहित्य में इसी विचार ने आधुनिकतावाद को जन्म दिया।
स्युली प्रूदोम कवि के साथ एक अच्छे आलोचक भी थे। उनकी आलोचना की दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 1904 में उनकी संपूर्ण कविताओं का चार खण्डों में प्रकाशन हुआ। पारिवारिक विवादों और अस्वस्थता के कारण उनका लेखन प्रभावित होता रहा लेकिन प्रूदोम ने अविचलित होते हुए कविता का दामन नहीं छोड़ा। सहज, सरल और गहरी संवेदनाओं के इस महान कवि का निधन 6 सितंबर, 1907 को हुआ। पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत हैं प्रूदोम की दो छोटी कविताएं, जिनसे उनकी महानता का सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है।
हिंडोले
बंदरगाह के किनारे से चुपचाप आगे बढते जाते
जहाजों को उन हिंडोलों की कोई सुध नहीं
जिन्हें स्त्रियां झुलाती रहती हैं अपने हाथों से
लेकिन एक दिन आएगा विदाई का
जब स्त्रियां दहाड़ें मार रोएंगी
और उत्सुक पुरूष उन क्षितिजिों की ओर तकते रहेंगे
जो उन्हें लुभाते आए हैं
और उस दिन बंदरगाह से ओझल हो दूर जाते जहाजों को
सुदूर हिंडोलों की भावनाओं से यह अहसास होगा कि
पीछे कितना कुछ छूट गया है
इस दुनिया में
इस दुनिया में सारे फूल मुरझा जाते हैं
पंछियों के मीठे गीतों की उम्र कम होती है
मैं उस बसंत का स्वप्न देखता हूं
जो सदाबहार रहे
इस दुनिया में होंठ मिलते हैं लेकिन हौले-से
और माधुर्य का कोई स्वाद नहीं बचा रहता
मैं उस चुंबन का ख्वाब देखता हूं
जो हमेशा कायम रहेगा
इस दुनिया में हर शख्स
दोस्ती या प्रेम के वियोग में रो रहा है
मैं उस दुनिया का सपना देखता हूं
जिसमें सब एक साथ रहें
Sunday, 19 July 2009
सजा-यात्रा - पुष्पा देवड़ा की कहानी
मैं अपने पात्रों के साथ दिमागी उधेड़बुन में लगी थी कि सड़क से बढे़ आते हुए उस अजीबोगरीब शख्स की शक्ल उभरने लगी। टोपी, कमीज, धोती और अकड़ी हुई गर्दन में सोने की चेन, हाथों में बैग और पांवों में रबड़ के जूते। कल ही इनके बारे में जब पता चला तो इनकी अजीब शख्सियत का अहसास हुआ। इनसे ध्यान हटा तो उपर से आने वाले हंसी-ठट्ठे में अटक गया, रोज की तरह, कल भी तो ऐसा ही हुआ था।
हमारे उपर वाले फलैट की मिसेज मित्तल ही खुद परिचय करने आईं। मेरा तो खुद आगे बढकर बात करने में संकोच होता है। उन्होंने सिलसिला हमारी बेटी से शुरु किया जो दूसरी कक्षा में पढती है। यहां आने के दूसरे दिन ठेले वाले से सब्जी खरीदने मैं भी पहुंची बेटी के साथ। वो अनुराग से बेटी के बहाने बतियाने लगीं। वापसी में मेरे कहने पर वे हमारे यहां आईं। पता चला वे जौहरी परिवार से हैं। मेरे बारे में खुद ही कहने लगीं कि आपके बारे में सुना कि आप तो पति-पत्नी लेखक हैं, तभी सोच लिया कि आपसे दोस्ती करूंगी। वो हर प्रकार के सहयोग का वादा कर चली गईं तो बड़ी देर तो मैं उनके हंसमुख स्वभाव के बारे में सोचने लगी। मेरा लेखक मन और जानने के लिए व्याकुल हो उठा।
दूसरे दिन शाम जब मैं लिखने में और बेटी होमवर्क में लगी थी तो उपर से उन्होंने आवाज लगा हमें बुला लिया। जाने पर पता चला कि उनके खुशमिजाज बेटे-बेटी भी घर पर हैं। दोनों कालेज में पढ रहें हैं। घर के भीतर का जायजा लेने पर लगा ही नहीं कि ये जौहरी परिवार से हैं। सब कुछ अत्यंत साधारण। शोख बेटी, चंचल बेटा और हंसमुख मां से बातों के बीच चाय-नाश्ते में पता ही नहीं चला कैसे वक्त गुजर गया। एक गरजदार आवाज में जब दरवाजे पर खोलो शब्द गूंजा तो घर से अचानक हंसी गायब हुई और गंभीरता छा गई। बेटे ने कहा, बाउजी आ गए। प्रतिक्रिया में मैं भी अपने घर चल पड़ी। तभी इन महाशय पर एक नजर गई जो अभी सड़क से आ रहे हैं। घर तक आते हुए कई प्रश्न मेरे दिलोदिमाग में उमड़ते रहे। दो दिन गुजर गए। लेकिन आज उसी वक्त देखा कि बेटी ने जैसे ही घण्टी की आवाज सुन दरवाजा खोला मिसेज मित्तल और उनके बेटा-बेटी खड़े थे। बेटे पुनीत ने कहा कि हम पान खाने आए हैं। और इस तरह हमारी निकटता बढती गई।
एक दिन शाम छह बजे उन्होंने फिर बला लिया। आज वो बेहद उदास लग रही थीं। मैं बालकनी में उनके पास बैठी थी। मैंने पूछा बच्चे कहां गए, पता चला दोस्तों के यहां पढने गए हैं। इसके बाद तो उनका दुखों का बांध टूट पड़ा। कहने लगीं कि बहन मैंने तो अपनी नियति से समझौता कर लिया है, लेकिन बच्चे बड़े हो गए हैं। इनकी उपेक्षा और डांटडपट बर्दाश्त नहीं होती। बेटा तो इनकी सुनता नहीं, पर बेटी क्या करे। सुबह बेटा कालेज जा रहा था कि इन्होंने अपने साथ आफिस चलने के लिए कहा। बेटे ने कहा दो पीरियड बाद आ जाउंगा तो बिफर गए, कहने लगे, कौनसी नौकरी करनी है। लड़का भी बिफर गया और बोला, अब तो सीधे घर आउंगा और कहीं नहीं। इस पर वे और बिगड़ गए और लड़के को घर से निकल जाने के लिए कह दिया। मैं दोनों के बीच आ गई और कह दिया कि अगर ये घर से जाएगा तो मैं भी इसके साथ जाउंगी। इस पर कहने लगे, तुम मेरे पीछे आई हो या इसके, और गुस्से में ये बिना कुछ खाए घर से निकल गए। उदासी उनके चेहरे पर मुर्दनी की तरह छा गई थी। कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने अपने दर्द की परतें एक-एक कर खोल दीं।
मिसेज मित्तल ने कहा कि मैं अपने मां-बाप की इकलौती संतान हूं। विवाह के बाद अकेले पड़ गए हैं दोनों। वे चाहते हैं कि बेटा उनके साथ रहे और पढाई के साथ उनके हीरे-जवाहरात के कारोबार को भी संभाल ले। अगर मैं इसे वहां भेज दूं तो मेरा मन कैसे लगे, कभी सोचती हूं कि भेज ही दूं, जिंदगी तो संवर जाएगी। मैंने पूछा कि भाई साहब ऐसा क्यों करते हैं। कहने लगीं कि वे खुद को मालिक समझते हैं और यह भी कि हम सब उन पर आश्रित हैं। मुझे तो शुरु के कुछ सालों के अलावा इनका यही व्यवहार लगा है। और किसी पर तो इनकी हुकूमत चलती नहीं इसलिए सारा गुस्सा घर वालों पर निकालते हैं। आप ही बताइये कहां तक सहन करें, मैं पूरब चलूं तो ये पश्चिम चलेंगे। घर में डबल बैड की बात करो तो कहेंगे, जमीन पर सोना अच्छा लगता है। फ्रिज आने से बासी सब्जियां खाने को मिलेंगी, ट्यूबलाइट की रोशनी नहीं सुहाती। घर की सामान्य सुविधा की चीजें भी इन्हें इसलिए बुरी लगती हैं कि कहीं इन्कम टैक्स वालों को पता नहीं चल जाए। मुझसे रहा नहीं गया, डरते-डरते पूछ ही लिया, ऐसे में आपके निजी संबंध मेरा मतलब दैहिक संबंध। कहने लगीं कि इनके साथ तो मुझे अपनी हालत बाजारू औरत से भी गई गुजरी लगती है। उसकी कम से कम पैसे के लिए ही सही अपनी मरजी तो शामिल रहती है। समृद्ध परिवार की मिसेज मित्तल की जिंदगी के अंदरूनी कलह, दुख, क्रोध और घृणा के साथ उनकी बेबसी से मेरा मन अवसाद से भर गया। कैसे उनका दुख बटाउं, सामने सड़क पर मेरे पति आते दिखे तो मैं उनसे इजाजत ले घर आ गई।
मैं मिसेज मित्तल के बारे में गहराई से सोचने लगी। क्या सिर्फ कुसूर मित्तल साहब का ही है, क्या इसमें मिसेज मित्तल का कोई दोष नहीं, क्या वो किसी भी प्रकार से इन सब चीजों से निजात नहीं पा सकती थीं, उनकी त्रासदी मेरे मन को मथती रही और कोई समाधान नजर नहीं आया। इस बीच मेरे पति का दिल्ली तबादला हो गया और हम दिल्ली चले गए। फिर पांच साल तक जयुपर आना ही नहीं हुआ।
पांच साल बाद जब हम गाड़ी से जयपुर आ रह थे तो मुझे मिसेज मित्तल की याद सताने लगी। पता नहीं वो अब किस हाल में होंगी, उस बिल्डिंग के पास से गुजरते हुए मैंने देखा कि बालकनी में कोई चेहरा नहीं नजर आया। दूसरे दिन पतिदेव को किसी काम से जाना था, तो मैंने कहा कि मुझे मिसेज मित्तल से मिलना है आप मुझे वहां छोड़ दीजिएगा और वापसी में ले लेना।
दोपहर के तीन बजे मैं मिसेज मित्तल के बारे में सोचती हुई उनके दरवाजे पर पहुंची और कालबेल बजाई। दरवाजा खुलने पर उदास और निढाल मिसेज मित्तल दिखाई दीं। मेरे नमस्कार पर जबरन मुस्कुराने की कोशिश करती हुईं बोलीं, अरे इतने साल बाद अचानक कहां से प्रकट हो गईं, फिर हमारी बातों का सिलसिला चल पड़ा। उनमें कोई बदलाव नहीं आया था। घर की हालत अब भी वैसी ही थी। मैंने पूछा कि आपकी यह हालत कैसे हुई, घर में कोई नहीं है क्या, कहने लगीं कि बेटा तंग आकर आखिरकार मुंबई चला गया, बेटी की शादी हो गई। मित्तल साहब दो साल से सर्वाइकल स्पोंडेलाइटिस से पीड़ित होकर घर में ही रहते हैं। बिजनेस खत्म हो गया, अब हुंडियों का कारोबार करते हैं। पूरे दिन बही खातों में घुसे रहते हैं। ना कोई दवा लेते हैं और ना ही एक्सरसाइज करते हैं। पहले से ज्यादा तुनकमिजाज हो गए हैं। अब इनके कारण घर छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकती। ये घर मेरी कैद बन गया है।
मैंने पूछा कि दिन कैसे कटता होगा। बोलीं, खाना बनाकर इन्हें खिलाने के बाद इस खिड़की पर आकर बैठ जाती हूं। राह चलते लोगों को देखना, किताब, पत्रिकाएं पढना या पुराने एलबमों में तस्वीरें देखना, बस यही रह गया है। वो चाय के लिए उठने लगी तो मैंने ही मना कर दिया। इतनी देर में भी मित्तल साहब की मौजूदगी का अहसास नहीं हुआ तो पूछा कि क्या वो सो रहे हैं। दिन में क्या हमे तो रात में भी सोने के लिए गोलियां लेनी पड़ती हैं। मैंने पूछा कि क्या आपस में एक दूसरे की तकलीफ को लेकर बात भी नहीं करते, कहने लगीं, जिस आदमी को मेरी मानसिक तकलीफ का कभी खयाल नहीं आता वो शारीरिक तकलीफ के बारे में क्या पूछेगा, उसी वक्त मुझे नीचे गाड़ी का हार्न सुनाई दिया, ये मुझे लेने आ गए थे।
जाते वक्त मेरी नजर मिसेज मित्तल की खिड़की पर ही टिकी रहीं। जाली के पीछे वह छाया सी दिख रही थीं। मेरा मन गहरी उदासी से भर गया। इस नारी की सजा यात्रा कहां खत्म होगी, पत्नीत्व, मातृत्व कोई सुख नहीं। एक ही छत के नीचे तलाकशुदा जैसा जीवन। आखिर इसका कसूर क्या है।
कहानी अंश
वे क्षुब्ध स्वर में बोलीं, जिस तरह की जिंदगी मैं जी रही हूं, उसमें किसी भी तरह के संबंध में मेरी भागीदारी की तो गुंजाइश ही कहां है, उस वक्त मुझे अपनी स्थिति बाजारू औरत से भी गई गुजरी लगती है। उसमें उसकी मरजी तो शामिल रहती है, चाहे पैसे के लिए ही हो। मगर मैं, मुझे तो हर वक्त इनके साथ दो ध्रुवों की सी मानसिकता में जीना पड़ता है, लेकिन रात में सोते समय जब मरजी हो पति नाम का यह जीव मुझे अपनी लपेट में ले लेता है।
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पुरुष द्वारा क्रिएट दर्दनाक परिस्थितियों को झेलती इस नारी की सजा यात्रा आखिर कहां जाकर खत्म होगी। उनकी दयनीय हालत और दर्दनाक परिस्थितियां मेरे संवेदनशील मन को यह सोवने पर विवश कर रही थीं कि क्या नारी जीवन इतनी बड़ी यातना भी हो सकता है, न पत्नीत्व का सुख है, ना मातृत्व की तुष्टि। उम्र के इस पड़ाव पर घर की रानी होने का गौरव महसूस करने की बजाय पति के साथ एक ही छत के नीचे तलाकशुदा-सा जीवन बिताने पर मजबूर इस स्त्री का आखिर कसूर क्या है।
