Tuesday, 17 February 2009

विदेशी स्वर में ‘जय भीम!’


भारतीय धर्म, संस्कृति, परंपरा, इतिहास और महापुरूषों का जीवन दुनिया भर के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं। भारत में रूचि रखने वाले विद्वान लेखक-बुद्धिजीवियों की एक समृद्ध परंपरा भी रही है। लेकिन इनके पीछे प्रायः कोई महान विभूति रही है, जिसके कारण विदेशी लोग दीवाने होकर भारतमय हो गये । ऐसे ही एक भारत प्रेमी हैं ब्रिटिश नागरिक टैरी पिलचिक। हम जानते ही हैं कि बौद्ध धर्म के प्रभाव में मुल्क के मुल्क महात्मा बुद्ध के अनुयायी हो गये। हालांकि भारत में बौद्ध मतावलंबियों की संख्या शताब्दियों में घटते-घटते 1950 के आसपास महज पचास हजार रह गई थी। अक्टूबर, 1956 में संविधान निर्माता डा. भीमराव अंबेडकर ने जब मुंबई में एक साथ लाखों लोगों के साथ हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाया तो लगा कि जैसे बौद्ध धर्म की घर वापसी हो रही है। डा. अंबेडकर के इस निर्णय से भारत में बौद्ध मतावलंबियों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा हुआ और देखते ही देखते भारत में बौद्धों की जनसंख्या साठ लाख से भी ज्यादा हो गई।
टैरी पिलचिक उस अद्भुत ऐतिहासिक घटना के गवाह थे, जब सदियों से हिंदू धर्म की नारकीय जाति व्यवस्था से पीड़ित दलित-शोषित जन एक समतावादी धर्म को अंगीकार करने जा रहे थे। बाबा साहेब अंबेडकर ने जिस भारतीय संविधान की रचना की थी, वह, शताब्दियों पुरानी व्यवस्था का कुचक्र धर्मांतरण की आजादी से लाखों लोगों को मुक्त करने जा रहा था। टैरी पिलचिक इस घटना से दस वर्ष पूर्व ही ईसाई से बौद्ध हो चुके थे। अब उनका नाम भी बदल चुका था और वे धम्माचारी नागबोधि के रूप में बौद्ध धर्म की षिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने में लगे थे। इस प्रक्रिया में उन्होंने दो बार भारत की यात्रा की, जिसका जीवंत दस्तावेज है ‘जय भीम! डिस्पेचेज फ्राम ए पीसफुल रिवोल्यूशन’। बीस साल पहले छपी यह किताब दुनिया भर के उन बौद्ध मतावलंबियों के बीच खासी चर्चित रही है, जो भारत में ही नहीं विदेशों में भी बौद्ध धर्म को वंचितों, शोषितों और पीडितों की एक अंतिम शरण स्थली के रूप में मानते हैं।
इस पुस्तक की खास बात यह है कि इसमें भारत के उन शहरी और ग्रामीण इलाकों की दुर्गम यात्राओं के अनुभवों का जिक्र है, जहां डा. अंबेडकर की प्रेरणा से बौद्ध बने दलित रहते हैं। उनके मुश्किल हालात और बाबा साहेब के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा ऐसी है कि उसमें बौद्ध धर्म से अधिक एक नया धर्म दिखाई देता है, जिसका मुख्य उद्घोष ‘नमो बुद्धाय’ के समानांतर ‘जय भीम!’ हो गया है। यहां लोग महात्मा बुद्ध और बाबा साहेब के बीच कोई फर्क नहीं करते, उनके लिए दोनों एक हैं, जिन्होंने उनके जीवन को बेहतरी की ओर ले जाने का मार्ग दिखाया है। टैरी यानी नागबोधि इन निर्धन-वंचित बौद्ध मतावलंबियों के बीच दस वर्ष तक रहकर देखते हैं कि किस प्रकार बौद्ध धर्म और बाबा साहेब की शिक्षाएं एक शांतिपूर्ण ढंग से क्रांतिकारी परिवर्तन को अंजाम दे रही हैं।
यह किताब बाबा साहेब अंबेडकर के उन स्वप्नों को भी दिखाती है, जो भारतीय संविधान ने देश के दलित-गरीब-अल्पसंख्यक समुदायों के उत्थान के लिए दिखाए हैं और लोकतंत्र के माध्यम से आज देश उन्हें पूरा करने को कृतसंकल्प है। बौद्ध धर्म, दलित और बाबा साहेब के कार्यों में रूचि रखने वाले लोगों के लिए एक अनिवार्य और पठनीय पुस्तक है धम्माचारी नागबोधि उर्फ टैरी पिलचिक की यह किताब ‘जय भीम!’।

Monday, 16 February 2009

लैपटॉप को हिन्दी में क्या कहेंगे श्रीमान?



एक दिन जयपुर के जवाहर कला केन्द्र के कॉफी हॉउस में राजस्थान पत्रिका के पत्रकार मित्र भाई रामकुमार सिंह के साथ बैठे बैठे गप्पें हो रही थी। उन्होंने नया नया लैपटॉप खरीदा था, जिसे साथ लिए ही वे आए थे. बातों बातों में ख़याल आया कि लैपटॉप का कोई हिन्दी नामकरण किया जाना चाहिए. अब शुरू हुई हमारी मगजपच्ची और कई विकल्पों पर सोचते हुए आखिरकार हमें एक ऐसा नया नाम मिल गया जिसे, बाकायदा लैपटॉप का पूर्ण भारतीय अनुवाद या हिन्दी तर्जुमा कहा जा सकता है. तो दोस्तों हम दो भाइयों ने मिलकर हिन्दी में लैपटॉप को 'गोद गणक' नाम दिया है. इस पर हम दोनों का यानी भाई रामकुमार सिंह और प्रेम चंद गांधी का इतना ही मालिकाना हक है कि कोई इसका व्यावसायिक इस्तेमाल ना करे, और कहीं नीम-आंवले की तरह कोई बद-दिमाग व्यापारिक बुद्धि का व्यक्ति इसे पेटेंट ना करा ले। इसलिए सब भाइयों, मित्र, मित्राणियों से निवेदन है कि लैपटॉप को प्यार से 'गोद गणक' कहें और इस नाम को लोकप्रिय बनाएं। बोलो 'गोद गणक महाराज की जय...जुग जुग जिए हम सबका प्रिय गोद गणक... वायरसों से बचा रहे...हमारा प्यारा गोद गणक...

कल्हण की राजतरंगिणी



यूं तो सस्कृत साहित्य की विशद परंपरा में सैंकड़ों ऐसे ग्रंथ हैं, जिन पर किसी भी भारतीय को गर्व हो सकता है, लेकिन बारहवीं शताब्दी में कश्मीर के कवि कल्हण की लिखी ‘राजतरंगिणी’ एकमात्र ऐसी कृति है, जिसे आधुनिक दृष्टिकोण से निर्विवाद रूप से संस्कृत साहित्य में पहली और अंतिम लिखित इतिहास पुस्तक का दर्जा दिया जा सकता है। कहने को संस्कृत साहित्य में हजारों ग्रंथ हैं, जिनमें अपने समय का इतिहास झलकता है, किंतु उन सब कृतियों में इतिहास, मिथक और किंवदंतियों का इतना मिश्रण है कि उनमें से इतिहास को निकाल कर अलग करना बेहद मुश्किल है सिर्फ और सिर्फ कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ ही इतिहास को उसकी पूरी सच्चाइयों के साथ प्रस्तुत करती है।

यह माना जाता है कि ‘राजतरंगिणी’ 1147 से 1149 ईस्वी के बीच लिखी गई। बारहवीं शताब्दी का यह काल कश्मीर के इतिहास का एक ऐसा काल है जिसे यूं भी कहा जा सकता है कि आज वही इतिहास अपने आपको फिर से दोहरा रहा है। कल्हण के समय कश्मीर राजनैतिक अस्थिरता और उठापटक के दौर से गुजर रहा था। इतिहास का मतलब सिर्फ यह नहीं होता कि किसने कब राज किया, बल्कि यह होता है कि काल विशेष में क्या राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियां थीं और आम जनता की क्या स्थिति थी। कल्हण ने कश्मीर के इतिहास की सबसे शक्तिशाली महिला शासक दिद्दा का उल्लेख किया है, जो 950-958 ईस्वी में राजा क्षेमगुप्त की पत्नी थी और शारीरिक रूप से कमजोर पति के कारण उसी ने सत्ता पूरी तरह उपयोग किया। वह पति की मृत्यु के बाद सिंहासन पर बैठी और उसने एक साफ सुथरा शासन देने की कोशिश करते हुए भ्रष्ट मंत्रियों और यहां तक कि अपने प्रधानमंत्री को भी बर्खास्त कर दिया। लेकिन दिद्दा को सत्ता और सेक्स की ऐसी भूख थी, जिसके चलते उसने अपने ही पुत्रों को मरवा दिया। वह पुंछ के एक ग्वाले तुंगा से प्रेम करती थी, जिसे उसने प्रधानमंत्री बना दिया। इतिहास का ऐसा वर्णन सिवा कल्हण के किसी और संस्कृत कवि ने नहीं किया।

कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ से ही हमें कश्मीर के वास्तविक इतिहास का पता मिलता है। कल्हण एक शिक्षित ब्राह्मण कवि थे और राजनीति के गलियारों में उनकी अच्छी पैठ थी। कारण यह कि उनके पिता चंपक, कश्मीर के राजा हर्ष के दरबार मे मंत्री थे। 120 छंदों में लिखित ‘राजतरंगिणी’ में यूं तो कश्मीर का आरम्भ से यानी ‘महाभारत’ काल से लेकर कल्हण के काल तक का इतिहास है, लेकिन मुख्य रूप से इसमें राजा अनंत देव के पुत्र राजा कैलाश के कुशासन का वर्णन है। कल्हण बताते हैं कि कश्मीर घाटी पहले एक विशाल झील थी जिसे कश्यप ऋषि ने बारामुला की पहाड़िया काटकर खाली किया। श्रीनगर शहर सम्राट अशोक महान ने बसाया था और यहीं से बौद्ध धर्म पहले कश्मीर घाटी में और फिर मध्य एशिया, तिब्बत और चीन पहुंचा।

कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ मुख्य रूप से इस इच्छा के साथ लिखी गई प्रतीत होती है कि किस प्रकार एक महान सभ्यता और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध विरासत का कश्मीर राजनैतिक रूप से दुष्चक्रों, कुचक्रों और साजिशों का शिकार होकर एक बर्बर समय में जा पहुंचता है, जिसके बाद उस पर हर तरफ से आक्रमण होते हैं और धरती का स्वर्ग नष्ट हो जाता है। आज भी ‘राजतरंगिणी’ को पढ़ते हुए कष्मीर की दुर्दशा को लेकर मन विचलित हो जाता है।

Sunday, 15 February 2009

झरोखों से झांकता इतिहास




जैसलमेर एक ऐसा ऐतिहासिक शहर है, जिसका इतिहास और स्थापत्य सदा से ही रचनाकारों को आकर्षित करता आया है। यहां की रूठी रानी को लेकर मुंशी प्रेमचंद ने अपनी प्रसिद्ध कहानी लिखी। आचार्य चतुरसेन ने ‘राजकुमारी रत्नावली की कहानी’ लिखी तो हरिकृष्ण प्रेमी ने ‘मित्र’ नाटक लिखा। महान फिल्मकार-साहित्यकार सत्यजित राय ने जैसलमेर को केंद्र में रखकर ‘सोनार किला’ उपन्यास लिखा। इसी नगर के बाशिंदे और राजस्थान के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश भाटिया ने पांच वर्ष के गहन शोध एवं अनुसंधान के बाद सन् 2002 में ‘दीवान सालम सिंह’ उपन्यास लिखा, जो दुर्भाग्य से हिंदी साह्रित्य जगत में लगभग उपेक्षित और अलक्षित ही रहा। इतिहास को गल्प में ढालना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है और इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि लेखक अपने समय के परिप्रेक्ष्य में इतिहास को किस प्रकार देखता है। क्या इतिहास के एक विशेष कालखण्ड से पाठक को आज भी कुछ नया मिलता है? अथवा सिर्फ इतिहास की एक झलक ही देखने को मिलती है? कहना न होगा कि ओमप्रकाश भाटिया का उपन्यास इन सवालों के मुकम्मिल जवाब भी देता है और उनसे टकराते हुए आज के जालियों और झरोखों से इतिहास को एक युगीन दृष्टि से देखता है।
इतिहास में कई अवसरों पर देखा गया है कि राजा से महत्वपूर्ण उसके दरबारी या मंत्री अथवा कोई और सामान्य व्यक्ति भी हो जाते हैं। जैसलमेर के इतिहास में भी दीवान सालमसिंह अपने राजा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण चरित्र रहा है। वह राज्य का ऐसा दीवान था, जिसने राजा न होते हुए भी सत्ता का निरंकुश इस्तेमाल किया और अपने हाथ में सत्ता रखने के लिए आजीवन तमाम किस्म के षड़यंत्र रचे। लेकिन सालमसिंह ने ग्यारह बरस की उम्र में देखा था कि उसके पिता दीवान स्वरूप सिंह का दिन दहाड़े जैसलमेर के दरबार में युवराज रायसिंह ने सर कलम कर दिया था। बालक मन पर यह दृश्य इस तरह अंकित हो गया कि इसकी परिणति आगे चलकर हिंसक, विलासी और षड़यंत्रकारी दीवान सालमसिंह में हुई। दीवान सालमसिंह का काल सन् 1773 से 1824 के मध्य रहा और यह काल भारतीय इतिहास में राजाओं की आपसी लड़ाई और सामंतशाही के पतन का आरंभिक काल भी है। इसी काल में भारत के विभिन्न राजा ईस्ट इंडिया कंपनी से समझौते कर अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार कर रहे थे। उस समय के राजपूताना में मराठों के आक्रमण हो रहे थे और इन हमलों से बचने का एकमात्र उपाय अंग्रेजों से संधि करना ही रह गया था। ऐसे समय में ही दीवान सालमसिंह जैसे चरित्र राजा से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं और सत्ता पर अपनी पकड़ स्थापित कर लेते हैं।
दीवान सालमसिंह को जैसलमेर की परंपरा के अनुसार विरासत में दीवानी मिली और उसने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेते हुए उसने पहले एक-एक कर पूरे राजपरिवार को खत्म किया और नाम मात्र के राजपरिवार के बहाने जैसलमेर की संपूर्ण राजसत्ता पर अपना दबदबा कायम किया। दीवान सालमसिंह एक ऐसा ऐतिहासिक चरित्र है, जिसमें तत्कालीन राजशाही और सामंती शासन के तमाम दुर्गुणों को एक साथ देखा जा सकता है। उसे सिर्फ अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध से ही शांति नहीं मिलती, बल्कि वह तो पूरी सत्ता अपने हाथ में लेकर अपनी मनमर्जी से राज चलाता है। उसे जहां कहीं कोई सुंदर स्त्री, युवती या बालिका भी दिख जाये तो वह हर कीमत पर उसे हासिल करना चाहता है। इसके लिए वह उस परंपरा को भी बदलवा देता है, जिसमें एक माहेश्वरी जाति का दीवान एक से अधिक विवाह नहीं कर सकता। ताकत और पैसे के जोर पर सब कुछ बदला जा सकता है और दीवान सालमसिंह यही करता है। ओम प्रकाश भाटिया के इस उपन्यास से ही हमें पहली बार एक कथा के रूप में यह जानकारी मिलती है कि कैसे जैलमेर का ऐतिहासिक कुलधरा नामक गांव एक ही रात में खाली हो गया था।
दरअसल हुआ यह था कि दीवान सालमसिंह को पालीवाल ब्राह्मणों की एक किशोरी बेहद भा गई थी और वह उससे शादी करने पर आमादा था। पालीवालों ने पचास बरस के दीवान से चौदह बरस की लड़की का विवाह करने से इन्कार कर दिया। इससे क्रुद्ध दीवान ने पूरी पालीवाल बिरादरी पर पांच सौ रूपये प्रति घर 'कर' लगा दिया। पालीवालों को जैसलमेर राज्य की तरफ से पांच सौ बरस से यह छूट मिली हुई थी कि उनसे कभी कर या लगान नहीं लिया जायेगा। दीवान के फैसले से नाराज पालीवालों ने दीवान के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया और एक सामूहिक फैसला लिया कि एक वे एक रात में गांव खाली कर देंगे और फिर कभी लौटकर जैसलमेर राज्य की सीमा में नहीं आयेंगे। ऐसे ही एक पालीवाल परिवार का एक वंशज सन् 2005 में मुझे कराची में मिला था, जिसने बताया था कि उनका परिवार कई पीढ़ियों पहले जैसलमेर के किसी गांव से यहां आ गया था और वापस जैसलमेर की तरफ लौटकर न जाने के प्रण के कारण विभाजन के बाद भी वहीं रह गया। ओम प्रकाश भाटिया का उपन्यास निश्चित रूप से इतिहास नहीं, इतिहास का साहित्यिक प्रतिफलन है। लेकिन इसमें ऐतिहासिक तथ्यों, किंवदंतियों और लोक गीतों के साथ लोक कथाओं का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है, जिससे उपन्यास की घटनाओं को एक किस्म की विश्वसनीयता मिलती है और तथ्यों की पुष्टि होती है। आज भी जैसलमेर में खड़ी सालमसिंह की हवेली उसकी चरम विलासिता का जीता जागता प्रमाण प्रस्तुत करती है। आजीवन दूसरों के लिए षड़यंत्र रचने वाले दीवान सालमसिंह का अंत उसी की कामुकता की शिकार सातवीं पत्नी के हाथों जहर दिये जाने से होता है।

वो पहला प्यार...



आधुनिक विश्व साहित्य में युवा मन के प्रेम को लेकर कथा-कहानी लिखने की परंपरा कम से कम ढाई सौ बरस पुरानी है। इस क्रम में सबसे पहली कृति सैम्युअल रिचर्ड्सन की ‘पामेला’ उर्फ ‘वर्च्यू रिवार्डेड’ है, जो 1740 में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद तो यूरोप में प्रेम और रोमांस को लेकर अफसाने लिखने की एक ऐसी परंपरा चल पड़ी कि आगे चलकर तो ऐसे किस्से-कहानियों के लिए ‘मिल्स एण्ड बून’ जैसे प्रकाशन गृह ही खुल गये। लेकिन यूरोप और दूसरे महाद्वीपों की अथाह प्रेमकथाओं के सागर में रूस के महान् कवि-कथाकार-उपन्यासकार इवान तुर्गनेव की सन् 1860 में prakaashit उपन्यासिका ‘प्रथम प्रेम’ अर्थात् ‘फर्स्ट लव’ एक ऐसी कृति है, जिसने दुनिया भर के नौजवानों के दिलों में जबर्दस्त उथल-पुथल मचाई है। सदा से माना जाता रहा है कि प्रत्येक प्रेमकथा अगर एक त्रासदी में खत्म होती है तो अमर होती है और शायद ही कोई प्रेमकथा हो जो सफल होने के कारण अमर हुई हो, यह तो सिर्फ हमारी भारतीय व्रत कथाओं में ही होता आया है, जहां एकनिष्ठ प्रेम और एकव्रती सफल दाम्पत्य जीवन को ही महानता का दर्जा प्राप्त है। लेकिन तुर्गनेव की उपन्यासिका एक ऐसी दर्दीली दास्तान है, जिसे पढ़ने के बाद उसके तमाम पात्रों से पाठक को गहरी सहानुभूति होती है, क्योंकि वे अपने समय के ऐसे पात्र हैं, जो प्रेम में दिलो-जान से डूबने के बाद भी कुछ हासिल नहीं कर पाते, उनका जीवन तो बस ’दुख ही जीवन की कथा रही’ में समाप्त हो जाता है।
यह कहानी सोलह साल के किशोर प्रेमी व्लादिमिर पेत्रोविच और इक्कीस बरस की जिनैदा अलेक्सान्द्रोव्ना के अद्भुत प्रेम की कथा है, जो अपनी राजकुमारी सदृश्य मां के साथ रूस के देहात में रहती है। व्लादिमिर अपने पिता के साथ रहता है। जिनैदा के परिवार को पुराने विरसे के कारण बस कहने भर के लिए इज्जत हासिल है, वरना उनकी हालत बिल्कुल गरीबों जैसी है। कच्ची उमर का व्लादिमिर अपने से थोड़ी पकी उमर की जिनैदा के प्यार में गिरफ्तार हो जाता है। व्लादिमिर के किशोर मन में जिनैदा की एक बहुत ही पवित्र और प्रेमिल छवि है, उसे जिनैदा के साथ बैठना, ढेर सारी बातें करना और उसे एकटक देखते रहना बहुत अच्छा लगता है। जिनैदा के व्लादिमिर जैसे और उससे भी बेहतर कई चाहने वाले खूबसूरत नौजवान पहले से ही मौजूद हैं। जिनैदा जाने-अनजाने व्लादिमिर से प्रेम का खेल उसी तरह खेलती है जैसे दूसरे लड़कों के साथ खेलती है। वह व्लादिमिर को प्रेम में छकाते हुए उसे अपने मोहजाल में फांस लेती है। बहुत दिनों बाद व्लादिमिर को पता चलता है कि जिनैदा उसे इसलिए चाहती है, क्योंकि असलियत में तो वह उसके पिता प्योत्र वसील्येविच को प्रेम करती है। एक किशोर-नौजवान के लिए यह कितनी अजीब बात है कि उसकी प्रेमिका उसके पिता से ही प्रेम करती है। बेचारा व्लादिमिर इसी चिंता में खोखला हुआ जाता है, और एक दिन तो वह खुद अपनी आंखों से अपने पिता को जिनैदा से प्रेमवार्ता करते हुए देख लेता है। उसके पिता जिनैदा के घर की खिड़की के बाहर खड़े बतिया रहे हैं और एक नाजुक डाली से उसके हाथ को सहला रहे हैं। जिनैदा डाली का सिरा चूम लेती है और पिता खिड़की से घर के भीतर कूद जाते हैं। व्लादिमिर को एक झटका लगता है और वह निराश हो वहां से चला जाता है।
व्लादिमिर की मां को किसी तरह इस बात का पता चल जाता है और वह अपने पति को अपनी नाराजगी जताती है। प्योत्र वसील्येविच लगभग रोते-गिड़गिड़ाते हुए पत्नी से माफी मांगते हैं। कुछ समय बाद व्लादिमिर के पिता की ह्रदयाघात से मृत्यु हो जाती है और व्लादिमिर भी मास्को आ जाता है। तीन-चार साल बाद व्लादिमिर को पता चलता है कि जिनैदा ने डोल्स्की नामक एक नौजवान जागीरदार से शादी कर ली थी, लेकिन बच्चे को जन्म देने के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। व्लादिमिर बरसों बाद डाइनिंग टेबल पर अपने दोस्तों के साथ अपने प्रथम प्रेम की कहानी सुना रहा है और सारी कहानी फ्लैश बैक में चलती है।
तुर्गनेव की यह कृति रूसी साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में भी क्लासिक मानी जाती है, जिसमें किशोर मन की प्रेमिल भावनाओं और उन्नीसवीं शताब्दी के रूसी समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों का एक यथार्थवादी चित्रण देखने को मिलता है। व्लादिमिर के पिता उस दौर के विलासी और लम्पट पुरुषों का प्रतिनिधि चरित्र है, तो जिनैदा के रूप में सौंदर्य के बल पर मर्दों को छकाने वाली उस दौर की युवा नारी है, जो गरीब होते हुए भी महज खानदानी विरासती तमगे के कारण सबकी चहेती है। युवा और कैशोर्य दिलों को छू लेने वाली यह उपन्यासिका दुनिया की तमाम भाषाओं में अनूदित होकर अद्भुत लोकप्रियता हासिल कर चुकी है। रूसी स्कूलों में तो ‘प्रथम प्रेम’ वहां के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है। हम भारतीय शायद ही कभी यह कल्पना कर पायें कि हमारे यहां इस किस्म की प्रेमकथाएं कभी स्कूलों में पढ़ाई जाएंगी। हमारे यहां तो नैतिकता की दुहाई देने वालों और संस्कृति की रक्षा में लगे सिपाहियों की पूरी फौजें तैयार हैं, जो प्रेम के नाम से ही बिदकती हैं। ऐसे लोगों को भी कम से कम एक बार तुर्गनेव का ‘प्रथम प्रेम’ जरूर पढ़ना चाहिए।
(यह 'डेली न्यूज़' के रविवारी परिशिष्ट 'हम लोग' के ८ फरवरी, २००९ के 'प्रेम अंक' में प्रकाशित हुआ।)

कमलेश्वर की आंखों से देखो पाकिस्तान



नवंबर में मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के बाद भारत-पाक संबंध एक अजीब तनाव और रस्साकशी के दौर से गुजर रहे हैं। इस माहौल में जब सब तरफ पाकिस्तान को लेकर गुस्सा है, एक लेखक-कलाकार समुदाय ही ऐसा है, जो मुश्किल हालात में भी अपना धैर्य नहीं खोता और ऐसे वक्त में हमें हिंदी के महान लेखक कमलेश्वर की किताब ‘आंखों देखा पाकिस्तान’ की याद आती है। यह किताब कमलेश्वर की पाकिस्तान यात्राओं के संस्मरणों और पाकिस्तान को लेकर लिखे गये विभिन्न पत्रकारी आलेखों का एक शानदार संकलन है, जिसके भीतर से गुजरते हुए एक अलग तरह का भावनात्मक और सांझी सांस्कृतिक विरासत के वारिस होने का अहसास होता है। इस किताब को पढ़ना एक प्रकार से अपने अड़ोस-पड़ोस को नितांत नये ढंग से देखना भी है। और इस देखने की प्रक्रिया में आप पायेंगे कि हम भारतीय हों या पाकिस्तानी, अंततः हम सदियों पुरानी एक दक्षिण एशियाई कौम हैं, जिसकी एक जैसी आबो-हवा है, जहां के मौसम एक हैं, जहां सागर, पहाड़ या जमीन से हमारी सरहदें मिलती हैं और एक होने का अहसास जगाती है।
दरअसल कमलेश्वर की इस किताब से पाकिस्तान को लेकर आम भारतीय में गहरे बैठी वो सारी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं, जिसमें पाकिस्तान देश और पाकिस्तानी जनता को पूरी तरह एक मुस्लिम कट्टरपंथी और बंद समाज के तौर पर देखा जाता है। मशहूर लेखक अहमद नदीम कासमी से हुई एक मुलाकात में कमलेश्वर को पाकिस्तानी अवाम की आवाज सुनाई पड़ती है, जब कासमी साहब उनसे कहते हैं, ‘मजहब जो कर सकता था, उसने कर दिखाया, अब मजहबी पहचान से ज्यादा इंसानी पहचान की जरूरत है, जो अदब हमेशा से पैदा करता रहा है।... हमारे यहां तो बस छावनी कल्चर बची है और फौजी ब्यूराक्रेसी। यह अंग्रेजों की देन है। पाकिस्तानी फौज चार बार पाकिस्तान को जीत चुकी है... पर वो बुल्लेशाह, वारिसशाह और नानक के खानदानों को नहीं जीत पाई है... अपने सियासी हिंदू हुक्मरानों से कहिएगा कि वे यह गलती न करें। वे तुलसीदास, मीराबाई, रसखान और अमीर खुसरो के खानदान को नहीं जीत पायेंगे।’
ये बसंत के दिन हैं और पूरे दक्षिण एशिया में इसके अलग-अलग रंग और त्यौहार हैं, लेकिन पाकिस्तानी पंजाब में इसकी अलग ही छटा है। वहां इन दिनों पतंगें उड़ाई जाती हैं, जिसे लेकर कई सालों से कट्टरपंथी हंगामा मचाते रहे हैं लेकिन आम जनता उनकी परवाह किये बिना बसंत का त्यौहार मनाती है और तमाम फतवों के बावजूद लाहौर-मुल्तान में अवाम की इच्छाओं की प्रतीक पतंगें आसमानों में परवाज करती रहती हैं। बकौल कमलेश्वर, ‘आज के पाकिस्तान में बसंतोत्सव एक प्रगतिशील विचार का ही नहीं बल्कि आम जनता के विद्रोह और कट्टरपंथ के प्रतिकार का भी उत्सव बन गया है।... पंजाब का किसान इस्लामी तिथियों और तारीखों के कैलेण्डर के हिसाब से नहीं चलता, वह आज भी भारतीय मौसमों के आधार पर चलता है। पाकिस्तानी किसान आज भी मौसमों को चैत, बैसाख, जेठ, अषाढ़ आदि नामों से जानता और याद करता है।’
इस पुस्तक में पाकिस्तान के यात्रा संस्मरणों के अलावा एक खण्ड में भारत-पाक के बीच फैली कट्टरपंथियों की जमात को लेकर कुछ आलेख हैं, जो हर वक्त माहौल बिगाड़ने का खेल खेलते रहते हैं और कभी संबंधों को सामान्य नहीं होने देना चाहते। किताब में उन हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी कैदियों के पत्र भी हैं, जो भारतीय और पाकिस्तानी जेलों में बंद रहे और कमलेश्वर को रिहाई की उम्मीद में खत लिखते रहे। कमलेश्वर ने उन कैदियों की आवाज सुनी और उनकी रिहाई के लिए काफी प्रयास भी किये। किताब के इस खंड से पता चलता है कि सरहद के दोनों तरफ किस प्रकार अफसर शाही हावी है, जो बेगुनाह लोगों को अमानवीयता की हद तक जाकर एक आजाद जिंदगी जीने में बाधक बनती है। भारत-पाक संबंधों को एक वृहद सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में जानने के लिए एक बार पाकिस्तान को कमलेश्वर की आंखों से जरूर देखना चाहिए।

(यह आलेख १ फरवरी, २००९ को प्रकाशित हुआ।)

'पोथीखाना' शीर्षक से नया स्तम्भ

इस नए बरस में मैंने जयपुर से प्रकाशित होने वाले हिन्दी अखबार "डेली न्यूज़" में 'पोथीखाना' शीर्षक से एक नया स्तम्भ शुरू किया है। इस स्तम्भ में किताबों की चर्चा होती है, हर रविवार के दिन। दोस्त-पाठकों के लिए यह चीज़ें ब्लॉग पर भी पोस्ट कर रहा हूँ।