Sunday, 11 July 2010

ऐसे कैसे चलेगी पंचायत

आज देश के अनेक राज्यों में असमान विकास के कारण आम आदमी का जीना इस कदर दूभर हो गया है कि भोले-भाले ग्रामीण किसान और आदिवासियों से लेकर खेत मजदूर और दूसरे दस्तकार तक गहरे असंतोष से भर गए हैं। आबादी के बहुत बड़े हिस्से को लगता है कि सरकार और सरकारी अधिकारी का उनसे कोई जुड़ाव या सरोकार नहीं है और सारी व्यवस्था उन्हें तिल-तिल कर मारने के लिए बनी है। इसीलिए कई राज्यों में नक्सलवाद की जड़ें मजबूत होती जा रही हैं। लोगों के आक्रोश को एक हद तक दमन से दबाया जा सकता है, लेकिन इसके नतीजे बहुत अच्छे नहीं होंगे। आखिर एक देश की सरकार अपने ही लोगों को कैसे मार सकती है, जबकि हिंसा की राह पर लोगों को ले जाने वाले नक्सलियों के मुकाबले देश के पास जमीनी स्तर पर लोगों की जरूरत और क्षमताओं के लिहाज से पर्याप्त संसाधन ही नहीं विकास योजनाएं और उन्हें क्रियान्वित करने वाली एक पूरी व्यवस्था भी है। आवश्‍यकता इस बात की है कि उस व्यवस्था को जल्द से जल्द और ज्यादा से ज्यादा मजबूत किया जाए, ताकि त्रस्त और हताश लोगों को राहत मिले। महात्मा गांधी का सपना था कि ग्रामीण भारत का तेजी से और समुचित विकास करने के लिए ग्राम पंचायतों के माध्यम से एक प्रभावशाली व्यवस्था विकसित की जाए जो अपने स्तर पर ग्रामीण भारत के सर्वांगीण विकास का दायित्व वहन करे।

नए भारत का निर्माण करेंगी महिलाएं
हम जानते हैं कि आम आदमी सामान्य तौर पर हथियार तभी उठाता है जब उसके अस्तित्व पर ही संकट आ जाए, अन्यथा वह सहज भाव से अभावों की जिंदगी भी जी लेता है और शिकायत भी नहीं करता। इसीलिए संविधान के 73वें संशोधन के अंतर्गत पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए कम से कम तैंतीस और राजस्थान जैसे कई राज्यों में तो पचास फीसद आरक्षण की व्यवस्था ने इस देश के लोकतांत्रिक इतिहास में अनूठा अवसर प्रदान किया है कि वे इस महादेश को अपने ममत्व, वात्सल्य और पारिवारिक दायित्व की भावना के साथ विकास की उस राह पर ले जाएं जहां हर भारतीय के पास एक सहज जीवन जीने के संसाधन उपलब्ध हों। अकेले राजस्थान में 2010 के पंचायत चुनावों में कुल एक लाख बीस हजार पंचायत जनप्रतिनिधियों में साठ हजार से अधिक महिलाएं चुनाव जीत कर आई हैं। सरकार की मंशा इन जनप्रतिनिधियों के माध्यम से एक नए ग्रामीण भारत का निर्माण करने की है। लेकिन पिछला अनुभव बताता है कि सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली में भारी अंतर्विरोध होने के कारण वांछित परिणाम प्राप्त होने में अभी बहुत समय लगना है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है कि खुद भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ से लिखित में वादा किया है कि आने वाले पांच सालों में यानी सन् 2015 तक शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप न्यूनतम लक्ष्य प्राप्त कर लिए जाएंगे। ये लक्ष्य मूल रूप से गरीबी उन्मूलन और भुखमरी को समाप्त करने के लिए तय किए गए हैं और दुनिया के कई देशों ने भारत की तरह संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ ऐसे वायदा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। हम जानते हैं कि आंकड़ों के स्तर पर सरकारी लक्ष्य कैसे प्राप्त किए जाते हैं और वाहवाही लूटी जाती है। इसलिए उन रुकावटों की पहचान बहुत जरूरी है, जो हजारों करोड़ रुपये खर्च कर समग्र भारत के विकास का लक्ष्य हासिल करने के मकसद में दिक्कतें पैदा कर सकती हैं। इस मकसद को हासिल करने में महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका बहुत प्रभावी हो सकती है, बशर्ते सरकारें और स्वयं महिलाएं इस पर गंभीरतापूर्वक विचार कर इसे अमल में लाएं।

अबला को बनना होगा सबला
नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं का चुनाव में जीत कर आना ही प्रमुख नहीं है, बल्कि उनके लिए सबसे जरूरी यह है कि उनकी क्षमताओं को अधिकाधिक विकसित किया जाए, जिससे वे लोक कल्याण में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका सही ढंग से निभा सकें। फिलहाल स्थिति यह है कि महिला जनप्रतिनिधि अशिक्षा और पुरुषों पर निर्भरता की वजह से न तो अपनी क्षमताओं को पहचान पाती हैं और न ही विकसित कर पाती हैं। हाल ही में देखा गया कि राजस्थान के शिक्षा मंत्री भंवर लाल मेघवाल ने बस्सी तहसील की जिला परिषद सदस्य करमा देवी मीणा के साथ अभद्रता की। करमा देवी सिर्फ यही तो चाहती थी कि उनके गांव के स्कूल में अध्यापक की नियुक्ति की जाए। करमा देवी के साथ जो कुछ हुआ वह हमारे समाज की मर्दवादी मानसिकता का एक सबूत है। करमा देवी नहीं जानतीं कि एक महिला जनप्रतिनिधि के लिए इस लोकतंत्र में अभी कितने रास्ते हैं, जिनसे वे अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ सकती हैं, मसलन वे अगर अपने साथ गांव के स्त्री-पुरुषों को साथ लेकर सामूहिकता के साथ अपनी बात मनवाने की कोशिश करतीं तो नजारा ही कुछ और होता। लेकिन इसी के साथ सच्चाई यह भी है कि इस बार के पंचायत चुनावों में बड़ी संख्या में शिक्षित महिलाएं जीत कर आई हैं जो अपनी यथासंभव क्षमता के साथ अपने गांवों को बदलते भारत के साथ कदमताल करने की दिशा में ले जाने के लिए काम कर रही हैं।

सरकारी स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए किए जाने वाले कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण है, सभी स्तरों पर जन प्रतिनिधियों को सघन प्रशिक्षण प्रदान करना। लेकिन व्यवहार में देखा गया है कि सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण को मात्र खानापूर्ति के लिए किया जाता है। दूसरी तरफ जनप्रतिनिधि भी प्रशिक्षण के प्रति उदासीन होते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 90 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण दिया जाता है, लेकिन यह प्रतिशत उपस्थिति का है और वह भी अनिवार्यता के कारण। वास्तव में कितने जनप्रतिनिधि लाभान्वित होकर निकले और कितनों ने इसका व्यवहारिक जीवन में प्रयोग किया इसके कोई आंकड़े नहीं हैं। एक बार प्रशिक्षण के बाद सरकार अपना दायित्व पूर्ण मानती है और अगले चुनाव तक भूल जाती है। ग्रामीण जनप्रतिनिधियों के लिए एक बार के नहीं सतत प्रशिक्षण की आवश्‍यकता होती है, क्योंकि ऐसा करने से ही नेतृत्वकारी क्षमताओं और आत्मविश्‍वास का विकास होता है, पूरे तंत्र और व्यवस्था को समझने में सहायता मिलती है। महिला जनप्रतिनिधियों के साथ आरंभ से अंत तक काम करने और सहयोग करने के लिए द हंगर प्रोजेक्ट जैसी बहुत सी गैर सरकारी संस्थाएं हैं, जो पूरी गंभीरता के साथ ग्रामीण विकास में महिला नेतृत्व को प्रभावकारी बनाने में लगी हैं और इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आए हैं।

गरीबी की मार महिला पर भार
इस हकीकत को सभी मानते हैं कि गरीबी की मार ग्रामीण भारत को ज्यादा झेलनी पड़ती है। इसी के साथ यह भी सच है कि निर्धनता का पहला शिकार महिलाओं को ही होना पड़ता है, सबसे पहले उन्हीं पर होने वाले खर्च कम किए जाते हैं और परिवार की आय बढ़ाने के लिए उन्हीं को सबसे ज्यादा श्रम करना पड़ता है। स्त्री को दोयम मानने की मानसिकता भी हमारे यहां व्यापक है। इस धारणा के साथ ग्रामीण महिलाओं के हालात बदलने में महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। पंचायत का बजट बनाते समय अगर वे महिलाओं की प्राथमिकता वाले पहलुओं की पैरवी करें, विकास कार्यों में महिला आधारित मुद्दों को शामिल करवाने में सफल हों और महिलाओं पर होने वाली हिंसा रोकने की कोशिश करें तो परिदृश्‍य बदलने में देर नहीं लगेगी। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि हमारे समाज में स्वयं महिला जनप्रतिनिधियों के साथ ही आए दिन यौन दुराचरण के मामले सामने आते रहते हैं। इसमें सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि महिला जनप्रतिनिधि को स्वयं पर होने वाली हिंसा या यौन दुराचरण के मामले में विशेष कानूनी संरक्षण नहीं है, उसके साथ सामान्य महिला जैसी ही स्थिति है।

बिना तालमेल कैसी पंचायत
पंचायती राज व्यवस्था का सांगठनिक ढांचा इस प्रकार का है कि वह ऊपर से नीचे एक दूसरे पर आश्रित है, लेकिन संकट यह है कि इस बहुस्तरीय प्रणाली को सहयोग करने वाली कोई व्यवस्था नहीं है। पंचायत स्तर पर पंच, सरपंच, उप सरपंच और ग्राम सेवक होते हैं, लेकिन इन सबमें कोई तालमेल नहीं होता। जाति, धर्म, लिंग, वर्ग और राजनैतिक दल जैसे भेद की वजह से आम तौर पर सामंजस्य नहीं हो पाता। जबकि पंचायती राज व्यवस्था एक किस्म की टीम भावना की मांग करती है, जो कहीं दिखाई नहीं देती। ग्राम सेवक और अन्य सरकारी कर्मचारी व अधिकारी अपनी नौकरी पक्की मान कर जनप्रतिनिधियों के साथ, खासकर महिलाओं के साथ मनमानी करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लोगों के काम नहीं हो पाते और व्यवस्था के प्रति असंतोष पनपता है। सरकारी मशीनरी और जनप्रतिनिधियों में जिस प्रकार के संबंध होने चाहिएं, उसकी गैर मौजूदगी जमीनी लोकतंत्र को विकसित नहीं होने देती। मानसिकता में बदलाव से ही ये हालात बदल सकते हैं। इस बदलाव में पंचायती राज व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई ग्रामसभा सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि ग्रामसभा प्रायः सब जगह बेहद कमजोर है। सन् 2010 को ग्रामसभा सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया गया है, लेकिन राजस्थान में छह महीने गुजरने के बाद भी इसकी कोई सुगबुगाहट तक सुनाई नहीं देती। पिछली बार जब सी.पी. जोशी राजस्थान के पंचायत राज मंत्री बने थे, तो ग्रामसभा को मजबूत करने के लिए लगातार अखबारों में विज्ञापन छपे थे। अब जोशी केंद्रीय मंत्री हैं, लेकिन ग्राम सभा की मजबूती की आवाज कहीं नहीं है।

नरेगा ही करेगा हर मर्ज की दवा
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून लागू होने के बाद ग्रामीण भारत में गरीब लोगों को जीने का एक नया संबल मिला है। पहले नरेगा और अब महानरेगा दोनों ही पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से क्रियान्वित हो रहे हैं। हर पंचायत के पास इसके तहत सालाना एक करोड़ का बजट है, जो न केवल गांव के विकास कार्यों में इस्तेमाल हो रहा है, बल्कि इसी में से गरीबों को रोजगार भी मिल रहा है। इसमें भ्रष्टाचार की शिकायतें भी आ रही हैं, लेकिन फिर भी यह अकेली योजना ग्रामीण भारत में उपजे असंतोष को कम करने में सक्षम है, जरूरत भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और अधिकाधिक लोगों तक पहुंचने की है। हमारे गृहमंत्री और कई दलों के नेता बारंबार नक्सलवाद से निपटने के लिए दमन की कार्यवाहियों की बात करते हैं, लेकिन एक छोटी सी बात समझ में नहीं आती कि लोगों को सही राह दिखाने के लिए जब हमारे पास पर्याप्त चीजें मौजूद हैं तो आप दवा की जगह बंदूक की गोली क्यों देना चाहते हैं? इस सवाल का जवाब किसी सरकार के पास नहीं है और सारी समस्याएं इसीलिए खड़ी हो रही हैं।

यह आलेख डेली न्‍यूज़ के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' में रविवार, 11 जुलाई, 2010 को कवर स्‍टोरी के रूप में प्रकाशित हुआ।

Sunday, 4 July 2010

जयपुर : अब दरख्तों की खैर नहीं...!

अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मार रहा है शहर

इस शहर में कुछ सडक़ें ऐसी हैं, जो विकास और सुविधाओं के नाम पर नग्न कर दी गई हैं। पहले कभी इन सडक़ों पर हरे-भरे पेड़ों की लंबी कतारें हुआ करती थीं, जिनकी शीतल छांव में थके हारे लोग पसीना सुखाते थे, परिन्दे आशियाना बसाते थे और जिनके पत्ते जानवरों का भोजन बनते थे। आज इन सडक़ों पर दूर-दूर तक पेड़-पौधों के नामोनिशान नजर नहीं आते।

बढ़ते ट्रैफिक दबाव से निपटने का आसान उपाय था, सडक़ों को ज्यादा से ज्यादा चौड़ा करना। इसके लिए राह में आने वाले तमाम पेड़-पौधों की निर्ममतापूर्वक बलि दे दी गई। सीकर रोड पर बी.आर.टी.एस. के लिए सडक़ क्या चौड़ी हुई, बेजुबान दरख्तों को समूल नष्ट कर दिया गया। आज हरमाड़ा से लेकर चौमूं पुलिया, झोटवाड़ा ओवरब्रिज से चांदपोल, पानीपेच से रेलवे स्टेशन, चिंकारा कैंटीन से ट्रांसपोर्ट नगर, सांगानेरी गेट से लेकर जोरावर सिंह गेट, चांदपोल से गलता गेट, नारायण सिंह सर्किल से ट्रांसपोर्ट नगर, अजमेरी गेट से सीतापुरा, गवर्नमेंट हॉस्टल से पुरानी चुंगी, अम्बेडकर सर्किल से सोडाला थाना, समूचा बी-टू बाइपास, इंदिरा मार्केट से घाटगेट तक और समूची चारदीवारी में सिर्फ गिनती के पेड़ बचे हैं। इन रास्तों पर अगर कहीं हरे दरख्त दिखते भी हैं तो अधिकांश सडक़ किनारे की इमारतों की बाउंड्री में हैं। मुख्य सडक़ों पर हरियाली के नाम पर सजावटी पौधे हैं।

हाल ही में हुए एक अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण में जयपुर सिर्फ इसलिए देश के श्रेष्ठ शहरों में पिछड़ गया, क्योंकि यहां बसावट की तुलना में हरियाली बेहद कम है। जहां दरख्त होने चाहिएं वहां अल्पायु सजावटी पौधे हैं। सार्वजनिक पार्कों में से अधिकांश में मंदिर बना दिए गए हैं, जो पूरी तरह गैर-कानूनी हैं। अखबारों में तस्वीरें छप रही हैं कि कैसे चोर दिन-दहाड़े ट्री-गार्ड उखाडक़र ले जा रहे हैं। हमारे शहर के पर्यावरण के साथ बरसों से यह खिलवाड़ हो रहा है और कोई कुछ नहीं बोलता। लोगों को याद होगा, कुछ ही बरस पहले बीसलपुर पाइप लाइन के लिए कैसे विशाल वृक्षों की बलि दी गई और जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए पाइप लाइन में फूंक दिए गए। हमने पहले रामगढ़ को बर्बाद किया और अब बीसलपुर को। कूकस के बांध में तो पानी आए पच्चीस साल हो गए। इस बांध में पानी आने का जो रास्ता था उस पर बड़े-बड़े स्टार क्लास होटल और रिसोर्ट बन गए हैं। मावठे को सूखे कई बरस बीत गए। तालकटोरा क्रिकेट का मैदान है। सरस्वती कुण्ड के नदी एरिया से लेकर पहाड़ के साथ-साथ जलमहल तक चलते जाइए, पहाड़ तक पर कॉलोनियां बस गई हैं। कभी यहां का बरसाती पानी तालकटोरा और जलमहल तक जाता था। नाहरी का नाका के बांध में तो अब बंधा बस्ती ही बस गई है। कहां तक गिनें, एक अंतहीन सिलसिला है इस शहर की बर्बादी का।

एक दिन मैंने चिंकारा कैंटीन से सांगानेरी गेट आते हुए सडक़ पर लगे दरख्ïतों को गिनने की कोशिश की तो गिनती बीस-तीस से आगे नहीं जा सकी। इसमें भी आश्चर्य की बात यह कि बाईं तरफ यानी जी.पी.ओ. की तरफ वाले हिस्से में तो शायद पांच-सात पेड़ ही बचे हैं। अभी एक दिन पांच बत्ती पर देखा कि नरसिंह बाबा के मंदिर के बाहर का विशाल दरख्त काटा जा रहा था। यानी अब इस सडक़ पर बचे-खुचे दरख्तों की भी खैर नहीं।

यह उस शहर में हो रहा है जहां तीन सौ बरस से बगीची और बागों की परंपरा रही है। पुरोहित जी का बाग, हाथी बाबू का बाग, मां जी का बाग, नाटाणियों का बाग, सेठानी का बाग और विद्याधर का बाग जैसे बाग शहर की चारदीवारी से बाहर थे तो चारदीवारी में बगीचियों की भरमार थी। मसलन कायस्थों की बगीची, अमरनाथ की बगीची, सवाई पाव की बगीची, सिद्धेश्वर की बगीची, पतासी वालों की बगीची और लगभग हर रास्ते में ऐसी बगीचियां हुआ करती थीं। आज बगीचियों और बागों के बस नाम रह गए हैं, हर तरफ रिहाइशी और व्यावसायिक इमारतें बन गई हैं। इसीलिए इस शहर में जहां कभी दस-बीस फीट पर कुओं में पानी निकल आता था, आज पूरा शहर डार्क जोन में चला गया है। शहर में अब पानी सिर्फ विद्याधर नगर जैसे गिने-चुने इलाकों में बचा है, जहां सैंकड़ों ट्यूबवेलों से चौबीसों घण्टे पानी निकाला जा रहा है। इरादा साफ है, इन इलाकों को भी डार्क जोन में भेज दो। फिर लोग मजबूर होकर कोका कोला वालों का पानी खरीदेंगे, जो कालाडेरा को रसातल में ले जा रहा है।


हटा दिया रास्ते से हरा पेड़... : पांच बत्ती पर नरसिंह बाबा के मंदिर के पास इस हरे पेड़ को रातों रात उड़ा दिया गया। कहते हैं कि कुछ होटल, दुकान वालों के लिए बाधा पैदा करता यह पेड़ आंख की किरकिरी बना हुआ था, इसलिए इसका सफाया कर दिया गया।
फोटो: अशोक शर्मा

Sunday, 27 June 2010

गल्प का विराट शिल्पी : सॉल बैलो

‘लोग अपनी जिंदगी पुस्तकालयों में खत्म कर सकते हैं। उन्हें सावधान करने की जरूरत है।’ ऐसी रोचक टिप्पणी विश्‍वसाहित्य में सॉल बैलो के सिवा और कौन कर सकता है। बेहद मामूली और सामान्य से दिखने वाले इंसानों के भीतर कितनी किस्मों के चरित्र हो सकते हैं, यह जानना हो तो सॉल बैलो को पढ़िये, जहां हंसते, खिलखिलाते, धीर-गंभीर, आवारा, हताश, उन्मुक्त, मस्त, पस्त और ना जाने कितने चरित्र अपने पूरे वजूद के साथ सिनेमा की तरह चलते-फिरते नजर आते हैं। इन चरित्रों के सर्जक सॉल बैलो के यहूदी माता-पिता 1913 में रूस से कनाडा पहुंचे। यहीं 10 जून, 1915 को सॉल बैलो का जन्म हुआ। एक पराए देश में संघर्षपूर्ण तरीके से जीवनयापन करते माता-पिता के साथ सॉल बैलो का बचपन गुजरा, जिसमें मां के वो पुराने किस्से शामिल थे, जब मां सुनाया करती थी कि रूस में वो कैसे नौकर-चाकरों से भरे घर में रहती थी। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं वाले अपने हमशहरी लोगों के बीच नौ बरस की उम्र तक सॉल बैलो कनाडा के मांट्रियल शहर में रहे। यहां पिता अब्राहम शराब का गैरकानूनी कारोबार करते थे। एक बार पिता को पीटा गया। इसके बाद परिवार अमेरिका के शिकागो शहर चला आया। यहां पिता ने नया आयात व्यापार शुरु किया। यहीं सॉल बैलो की शिक्षा हुई। धार्मिक विचारों वाली मां चाहती थी कि सॉल बैलो संगीत के क्षेत्र में जाए, लेकिन सॉल बैलो को यह पसंद नहीं था। किशोरावस्था में एच. बी. स्टो का विश्‍वप्रसिद्ध उपन्यास ‘अंकल टॉम’स कैबिन’ पढ़कर सॉल बैलो ने तय कर लिया कि लेखक बनना है।
सत्रह साल की उम्र में मां की मृत्यु से सॉल बैलो बेहद विचलित हो गए। स्कूली शिक्षा के बाद सॉल बैलो साहित्य में ही उच्च शिक्षा लेना चाहते थे, लेकिन उन दिनों यहूदियों के खिलाफ हर तरफ बेहद नफरत का माहौल था और विश्‍वविद्यालयों के मानविकी विभागों में तो बहुत ही खराब वातावरण था। लिहाजा सॉल बैलो ने साहित्य के बजाय नृतत्वशास्त्र और समाजविज्ञान में पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान साहित्य के एक प्रोफेसर ने उनसे कह दिया कि कोई यहूदी ऐसी अंग्रेजी नहीं सीख सकता, जिससे लेखक बना जाए। बात चुभने वाली थी, लेकिन सॉल बैलो ने तो बचपन में ही लेखक बनने की ठान ली थी। वे लिखते रहे, लेकिन प्रकाशन नहीं हुआ। उन्होंने अध्यापक की नौकरी की और एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के संपादन विभाग में भी कुछ समय काम किया। दो साल वे अमेरिकन मर्चेंट मैरीन में रहे। इस बीच उन्होंने अपना पहला उपन्यास लिखा, ‘डैंजलिंग मैन’। 1944 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ, जिसमें एक निराश बेरोजगार युवक की संघर्षगाथा, डायरी शैली में कही गई है। तीन साल बाद दूसरा उपन्यास आया ‘द विक्टिम’, जो एक अधेड़ यहूदी व्यक्ति की कथा है, जिसे भय है कि किसी बदकिस्मती के चलते उसके साथ सब कुछ बुरा हो रहा है। ये दोनों उपन्यास साहित्य की दुनिया में सॉल बैलो के सामान्य उपन्यास माने जाते हैं, खुद सॉल बैलो पहले उपन्यास को ‘एम.ए.’ और दूसरे को ‘पी.एच.डी.’ मानते थे।
1953 में जब उनका तीसरा उपन्यास ‘द एडवेंचर्स ऑफ ऑगी मार्च’ आया तो सॉल बैलो की धूम मच गई। आधुनिक आम अमेरिकी व्यक्ति के बचपन से लेकर बड़े होने तक की रोमांचक, हास्य और व्यंग्य से भरपूर गाथा सॉल बैलो ने ऐसी खूबसूरत किस्सागो शैली में प्रस्तुत की कि आलोचकों ने कहा कि अमेरिकी साहित्य का डॉन क्विक्जोट अब पैदा हुआ है। बेहद गरीबी का मारा ऑगी शहरी जीवन की विद्रूपताओं, झूठ, छल, प्रपंच और अजीब मानसिकताओं से भरे चरित्रों के बीच आम अमेरिकी की उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें जनता किसी भी तरह जल्दी अमीर बनने और आरामतलब जिंदगी जीने का स्वप्न देख कर जीती है। इस उपन्यास में सॉल बैलो भावातिरेक से बचते हुए विशुद्ध यथार्थ के साथ एक ऐसी कथा रचते हैं, जिसमें आगे आने वाली घटनाओं का कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। बेचारा नायक अचानक धनवान बनने के बाद तुरंत ही कंगाल हो जाता है और हर हाल में मस्त रहता है। इस उपन्यास की लोकप्रियता से विचलित हुए बिना सॉल बैलो ने अपने अगले उपन्यास में पूरी शैली बदल डाली और ‘सीज द डे’ में एक असफल अभिनेता की मार्मिक कथा लिखी, जो अपनी विफलता के चलते पत्नी, बच्चे और पिता सबसे अलग-थलग पड़ जाता है। द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद अमेरिकी समाज में उपजे हालात और पारस्परिक संबंधों में आए व्यापक बदलाव को इस उपन्यास ने जितना बेहतरीन ढंग से रूपायित किया उतना किसी ने नहीं। इसीलिए इसे बीसवीं सदी का श्रेष्ठतम अमेरिकी उपन्यास कहा जाता है। अपने पांचवें उपन्यास ‘हैंडरसन द रेन किंग’ में सॉल बैलो एक ऐसे धनी अधेड़ व्यक्ति की कथा कहते हैं जो कोई अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति और ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। इस अतृप्त प्यास को लेकर वह अफ्रीका के गांवों में पहुंच जाता है और कई रोमांचक घटनाओं के बीच नए अनुभव हासिल करता है। उसे महसूस होता है कि आत्मा, शरीर और बाहरी दुनिया के बीच कोई शत्रुता नहीं है और सौहार्द्रपूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
सॉल बैलो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे पुराकथाओं जैसा गल्प रचते हुए अपने समय और समाज को अनेक आयामों में देखते हैं, जहां तमाम भागमभाग और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मनुष्य को एक सहज, संतोषी और सौहार्द्रपूर्ण जीवन की ओर ले जाने का मार्ग दिखाई देता है। सॉल बैलो का अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास ‘हरजोग’ एक ऐसे अधेड़ यहूदी की कथा है जो पत्नी द्वरा त्याग दिया गया है और जिस स्त्री के साथ रहता है, वह उससे विवाह नहीं करना चाहती। गहरी अनास्था और हताशा के बीच वह अपने दोस्तों, परिजनों, महान विद्वानों, दार्शनिकों और भगवान के नाम पत्र लिखता रहता है, लेकिन इन पत्रों को किसी को नहीं भेजता। इन पत्रों के माध्यम से ही उसकी मानसिकता और उलझन भरी कहानी पता चलती है। इसी तरह मि. सैमलर’स प्लेनेट में एक ऐसे विद्वान प्रोफेसर की कहानी है जो खुद एक प्रलय से बच कर आया है, लेकिन अजीब पागलपन का शिकार होने की वजह से लोगों को भविष्य के विचित्र वायदे करता रहता है। उसका मानना है कि अधिकाधिक सुविधाभोगी जीवन से ही मनुष्य की तकलीफें बढ़ रही हैं।
अमेरिका के नेशनल बुक अवार्ड के लिए छह बार नामांकित होने और तीन बार पुरस्कृत होने वाले सॉल बैलो एकमात्र रचनाकार हैं। लेखन के लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। जब 1976 में उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया तो उन्हें इसका वाजिब हकदार माना गया। जन्म से कनाडाई होने के कारण, कनाडा के इतिहास में सिर्फ उन्हीं को साहित्य के लिए यह सम्मान मिला। सॉल बैलो के लेखन को लेकर बहुत से लोगों का मानना है कि उनके अधिकांश उपन्यासों में उनकी अपनी निजी जिंदगी से जुड़ी हुई चीजें हैं, जैसे उनका यहूदी होना, साहित्य के साथ समाजशास्त्र और नृतत्वशास्त्र पढ़ाना, एक के बाद एक पांच-पांच शादियां करना और घूम-घूम कर नई जगहें देखना। खुद सॉल बैलो भी मानते थे कि एक लेखक की रचनाओं में ऐसा होना सहज है। साहित्य की दुनिया में कहा जाता है कि सॉल बैलो बीसवीं शताब्दी के ऐसे महान रचनाकार थे, जिन्होंने रूसी, यूरोपीय, अंग्रेजी और अमेरिकी क्लासिक उपन्यास परंपरा को नया जीवन दिया और सरवांतीस, दोस्तोयेव्स्की, डिकेंस और टॉलस्टोय जैसे सर्वकालिक महान रचनाकारों की शैली को आत्मसात करते हुए आधुनिक उपन्यास को नई बुलंदियों पर पहुंचाया। 5 अप्रेल, 2005 को 90 वर्ष की उम्र में सॉल बैलो का ब्रुकलिन में निधन हुआ।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्‍ट में 'विश्‍व के साहित्‍यकार' स्‍तंभ में 27 जून, 2010 को प्रकाशित हुआ।

Sunday, 20 June 2010

मेरे पिता... तेरा मान रहे... सम्मान रहे

प्राणी जगत में मनुष्य ही है जिसने रक्त संबंधों को सभ्यता के विभिन्न चरणों में नई गरिमा और नई पहचान दी है। एक आदर्श और मानवीय समाज की सतत परिकल्पना में पारिवारिक संबंधों के महानतम रूप में माता और पिता को सर्वोच्च स्थान दिया गया। मातृसत्तात्मक समाज से जब पितृसत्तात्मक व्यवस्था की नींव पड़ी तो सभ्यता, संस्कृति और समाज में परिवार के मुखिया पुरुष को राज्य के समान सत्ता मिली। जहां पहले राजा को संपूर्ण प्रजा के पालन का दायित्व था, वह परिवार में पालक पिता का हो गया। यहीं से परिवार में पिता और संतानों के बीच संबंधों का रोचक इतिहास आरंभ होता है। समाज में उत्पादन के साधनों के विकास के साथ जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ने लगा, परिवार की आय में वृद्धि होती गई, उसी परिमाण में पारिवारिक संबंधों का स्वरूप भी बदलता गया। इन संबंधों के बदलने में स्थानीय परिवेश और संस्कृति का भी उत्पादन के साधनों जितना ही महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों में हुए शोध, लेखन और समग्र विकास का विहगावलोकन करें तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाएगी कि लगभग हर दशक में कम से कम एक पीढ़ी का पिता अपनी परवर्ती पीढ़ी के पिता से अलग दिखाई देता है। समाज में सांस्कृतिक स्तर पर परिवर्तन बहुत धीमी गति से होते हैं, इसलिए पारिवारिक संबंधों पर पड़ने वाला इनका प्रभाव बहुत देर से दिखाई देता है, लेकिन उत्पादन के साधनों यानी आर्थिक जगत में परिवर्तन तेजी से होते हैं, इसलिए ऐसे परिवर्तनों से पड़ने वाले प्रभाव तुरंत दिखाई देते हैं।

पालक पिता को परिवार के सभी सदस्यों की सर्वांगीण सुरक्षा को लेकर चिंता रहती है, इसलिए पिता की आशंकाएं और आकांक्षाएं पत्नी से लेकर संतानों पर ही केंद्रित रहती हैं। कुछ समय पहल कहीं यह पढ़ने को मिला कि परिवार में पुरुष को आंधी, तूफान, बारिश, भूकंप, आग, किसी के आने या जाने की आहट, शोर-शराबा और ऐसे ही खतरों को लेकर तुरंत सजग होना पड़ता है, क्योंकि इनसे पूरे परिवार को खतरा हो सकता है, जबकि महिलाएं उन खतरों को जल्दी पकड़ती हैं, जिनसे सिर्फ बच्चों को खतरा हो। एक पिता जहां अपने पुत्रों की आर्थिक सुरक्षा और नैतिक व्यवहार को लेकर जीवन भर सशंकित रहता है, वहीं पुत्रियों को लेकर उनके भावी वैवाहिक जीवन और विवाहपूर्व सदाचारी जीवन के बारे में चिंतित रहता है। यह कमोबेश आज भी चली आ रही सनातन चिंताएं हैं। पिछली दो सदियों का साहित्य उठाकर देख लीजिए हर जगह पिता की यही चिंताएं देखने को मिलेंगी। रूसी, यूरोपियन और अमेरिकी ही नहीं भारतीय साहित्य में भी इसके असंख्य उदाहरण बिखरे पड़े हैं। प्रेमचंद के ‘गोदान’ का होरी अपने पुत्र गोबर के भविष्य और झुनिया के साथ उसके प्रेमसंबंध को लेकर आज के किसी भी पिता की तरह चिंतित दिखाई देता है। पश्चिमी साहित्य में तो लंपट पिता अपने पुत्रों के चरित्र को लेकर हद दर्जे तक सशंकित दिखाई देते हैं। खास तौर पर रूसी उपन्यासों के पिता अपने पुत्रों के प्रति खलनायक नजर आ जाते हैं। इसका मुख्य कारण है उस काल खण्ड में पनपा सामंती व्यवहार, जो भू दास प्रथा, जमींदारी, उन्नत कृषि तकनीक और कृषि के अतिरिक्त अन्य आयस्रोतों के पनपने से परिवार के मुखिया पिता में विकसित होता है।

खैर, अगर हम एक सदी के हिंदी सिनेमा को गौर से देखें तो पिता और संतानों के बीच बदलते हुए अंतर्संबंध हर दौर में नजर आएंगे। हिंदी सिनेमा में तो सैंकड़ों फिल्में पिता और संतान के बीच के अंतर्विरोधों को लेकर ही बनी हैं। फिर वह राजकपूर का सिनेमा हो या राजकुमार हीरानी का। और दोनों के बीच अंतर्द्वंद्व मुख्य रूप से अमीरी गरीबी के बीच चुनाव, नैतिक और अनैतिक में से एक का पक्ष लेना या समय और समझ के हिसाब से स्वतंत्र निर्णय और पारंपरिकता को निभाने के बहुआयामी दबावों को लेकर होते हैं। हर व्यक्ति की तरह सभी पिता और उनकी संतानें अपने समय और भविष्य को लेकर अपने मन से जीवन जीने का स्वप्न देखते हैं और व्यवहार में भी यही कोशिश करते हैं। लेकिन समय इतनी तेजी से आगे बढ़ता है कि कोई भी पीढ़ी उसे पूरी तरह पकड़ नहीं पाती। इसी वजह से हर व्यक्ति नॉस्टेल्जिक होता है, उसे अपना बचपन और पिता के साथ बिताए दिन याद आते हैं, जो एक समय बाद यथार्थ के पथरीले फर्श पर मिट्टी के खिलौनों की तरह चकनाचूर हो जाते हैं।

संतान को लगता है, मेरे पिता ऐसे तो नहीं थे, उन्हें क्या हो गया है? दूसरी तरफ पिता को महसूस होता है कि मेरी परवरिश में ऐसी कौनसी कमी रह गई जो औलाद ऐसी निकल गई। भारतीय समाज में जब तक संयुक्त परिवार की व्यवस्था मजबूत रही, पारिवारिक संबंधों में भी सुदृढ़ता बनी रही, कारण यह कि एक साथ रहने से परिवार के पुरुषों को बहुत से सुरक्षा संबंधी मामलों में पारस्परिक अंतर्निभरता की वजह से निश्चिंतता रहती थी। लेकिन समय के साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर जब संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार विकसित होने से असुरक्षा की भावना अधिक बलवती हुई तो घर टूटने लगे। जिन पिताओं ने अपने सुखद भविष्य की कामना में अपने पुत्र-पुत्रियों को उच्च शिक्षा दिलाई, कमाई के लिए विदेश भेजा, आज वे स्वयं एकाकी जीवन जी रहे हैं। बदले हुए समय में दूरियों ने संबंधों की मृदुलता कम कर दी है, पिता सांस्कृतिक रूप से आदरणीय और पूज्य हैं, लेकिन लाखों का नुकसान सह करना और लाखों रुपयों के साथ काम के कई दिन खर्च कर उनकी तीमारदारी करना आज की संतान के लिए अव्यावहारिक है, इसलिए हद से हद पैसे भेज देना और फोन पर चिंता करना जिम्मेदार संतान की निशानी रह गया है। पिता भी इस बात को जानते हैं कि एक समय उन्होंने खुद अपने पिता को सुनहरे स्वप्न दिखाकर लौटने के वादे के साथ कभी ना लौटने का संकल्प लिया था। इसीलिए आप देखेंगे कि पिछले कुछ बरसों में वृद्धाश्रमों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। कार्पोरेट स्तर पर इधर आलीशान ओल्ड एज या रिटायरमेंट होम भी बनने लगे हैं। यह सब पिता और संतानों के बीच हो रहे बदलावों के मुखर संकेत हैं और फिर यह बात स्‍पष्‍ट होती है कि उत्‍पादन के साधनों के साथ पारिवारिक संबंधों में भी परिवर्तन होते हैं।

लेकिन उन पिताओं की बात अलग है, जिन्होंने अपनी संतानों को अपनी अदम्य जिजीविषा से जीवनभर प्रेरित किए रखा। मुंशी प्रेमचंद के यशस्वी पुत्र अमृतराय ने प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ जीवन लिखी ‘कलम का सिपाही’, सज्जाद जहीर की रचनाकर पुत्री नूर जहीर ने पिता के साथ बिताए वर्षों के यादगार संस्मरण ‘मेरे हिस्से की रौशनाई’ में लिखे, जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा गांधी के नाम अविस्मरणीय पत्र लिखे, ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य में विशेष रूप से आजादी के बाद के साहित्य में पिता की बेहद मार्मिक छवियां मिलती हैं। आजादी के मोहभंग से उपजी पिताओं की निराशा, हताशा और कुंठाओं को अनेक लेखकों ने बहुत गहराई से रचा है। उदय प्रकाश की कहानी ‘तिरिछ’ में पिता की गैर मौजूदगी और उनकी ज्ञात-अज्ञात कारणों से हुई मौत हमारी पूरी व्यवस्था पर ही प्रश्‍नचिह्न लगा जाती है। पिछली सदी में पिता परिवार में संतानों के लिए भय का पर्याय हुआ करता था, जो अब थोड़ा बहुत मित्रवत हो गया है। विगत कुछ वर्षों में हुए वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि जिन परिवारों में पिता की पालन-पोषण में सक्रिय भूमिका रहती है, उनके बच्चे बहुत सी मानसिक और शारीरिक बीमारियों का शिकार होने से बच जाते हैं।

पिता और संतान के बीच का सारा द्वंद्व समय और समाज में चल रहे विचारों का होता है। ऐसा कभी कोई आदर्श समाज नहीं रहा, जिसमें सिर्फ श्रवण कुमार जैसी आदर्श और परम आज्ञाकारी संतानें हों, और ऐसी कोई कामना करना भी सिवा खामखयाली के कुछ नहीं है। हमारे कवि मित्र हरीश करमचंदाणी अपनी एक कविता में लिखते हैं, ‘क्या पिता की हर बात मानना संभव भी है?’ सच्चाई यह है कि बिना वैज्ञानिक ज्ञान या समझ के अपने पूर्ववर्तियों की बात को ठुकरा देना जितना नुकसानदेह होता है, उससे कहीं अधिक हानिकारक होता है अंधश्रद्धा से मान लेना। इस दुनिया को जितना आज्ञाकारी संतानों ने बनाया है उससे कहीं ज्यादा उन्होंने बनाया, जिन्होंने अपने पिता की इच्छाओं के विपरीत जाकर अपना मार्ग चुना और सफलता हासिल की। ईसाई धर्म में जिस धर्मगुरु को फादर कहते हैं, गैलीलियो ने उसी की सत्ता को चुनौती दी। चार्ल्स डार्विन ने अपने पिता की नाराजगी के बावजूद अपनी खोजें जारी रखीं। एक मशहूर शेर है कि ‘कुफ्र कुछ चाहिए, इस्लाम की रौनक के लिए’, तो कुछ हुक्म उदूलियां अनिवार्य हैं, मावनीय सभ्यता को आगे ले जाने के लिए। संतान का धर्म है पिता की व्यवस्था को आगे ले जाना और पिता का धर्म है कि बूढ़े दरख्तों की तरह घर-आंगन में अपने आशीर्वाद का साया फैलाते रहें। 

यह आलेख डेली न्‍यूज़ के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' में प्रकाशित हुआ। चित्र http://www.hoviscreations.com/ से साभार।

Sunday, 13 June 2010

विष्‍णु नागर होने का मतलब

नागर जी से मेरा पहला परिचय उनके असंख्य पाठकों की तरह नवभारत टाइम्स के जरिए ही हुआ। ये मेरे लेखकीय शैशवकाल के दिन थे, जब पढ़ने की भूख कुछ भी पढ़वा लेती थी और जिन लेखकों को पत्र-पत्रिकाओं में किसी ना किसी रूप में पढ़ता रहा, उनमें नागर जी अहम थे। उन दिनों मुझे लगता था कि विष्णु नागर नाम के तीन लोग हैं, जिनमें से एक कविताएं लिखता है, दूसरा व्यंग्य और तीसरा पत्रकारिता करता है। कई साल बाद जब असलियत मालूम हुई तो आश्‍चर्य हुआ कि एक व्यक्ति कैसे इन तीन विधाओं को साध सकता है। आश्‍चर्य इस बात का भी था कि एक पत्रकार इस कदर रचनात्मक हो सकता है कि वह कविता को व्यंग्य जैसी विधा के साथ साध लेता है। आज भी मुझे लगता है कि विष्णु नागर जैसी रचनात्मकता के लिए बहुत गहरे आंतरिक रचनात्मक अनुशासन और संवेदनशीलता की जरूरत है, जो हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है और पत्रकारिता में रहते हुए तो यह लगभग असंभव ही है। और यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हिंदी दैनिक पत्रकारिता में विष्णु नागर जैसा दूसरा कोई पत्रकार नहीं दिखाई देता, जो कविता, कहानी, व्यंग्य और समसामयिक विषयों पर एक साथ कलम चला सकता हो।

मुझे यह याद नहीं आ रहा कि पहली बार मेरा उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलना कब हुआ। लेकिन स्मृति पर जोर डालता हूं तो लगता है जैसे हम सदियों से एक-दूसरे को जानते हों। कुछ व्यक्ति ऐसे ही होते हैं, जिनसे आप कितनी ही बार मिले हों, लगता है, जैसे उनसे आपका बहुत पुराना रिश्‍ता है। विष्णु जी की सहज, सरल मृदुल मुस्कान आपको पहली नजर में अपनत्व से भर देती है और उनकी मिलनसारिता अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ लेती है कि आप बरसों बाद मिलेंगे तो भी आपको वे कुछ नहीं कहेंगे और अपनी निर्मल मुस्कान से फिर अपना बना लेंगे। मेरे जैसे बेहद आलसी व्यक्ति से भी वे कभी निराश नहीं होते और कभी उलाहना भी नहीं देते। अगर प्रभाष जोशी होते तो इसे मालवा की मिट्टी की खासियत के तौर पर रेखांकित करते। लेकिन उसी मालवा की धरती से निकले कई रचनाकार मिल जाएंगे जिनके व्यक्तित्व में नागर जी जैसी सहजता नहीं है।

पिछले करीब बीस वर्षों में नागर जी से बीसियों मुलाकातें और गप्प गोष्ठियां हुई हैं, और मैंने कभी भी किसी मसले पर उत्तेजित होते नहीं देखा, एक सहज सौम्य मृदुल उपस्थिति से वे पूरे माहौल को गरिमामय बनाए रखते हैं। सायंकालीन रसरंजन गोष्ठियों में जब भाई लोग किसी विषय पर विचारोत्तेजक होते हुए वीरोचित मुद्रा अख्तियार कर लेते हैं, नागर जी शांत और सौम्य बने रहते हैं और अक्सर वातावरण को सामान्य बनाने में उन्हीं की मुख्य भूमिका होती है। नागर जी स्वाद के बहुत शौकीन हैं और उत्तेजनापूर्ण माहौल को सहज करने में उनकी यह रूचि प्रायः काम कर जाती है, जब वे बहस में संलग्न मित्रों से कहते हैं, छोड़िए इन बातों को, ये जो नमकीन है वो लाजवाब है, आपके यहां के नमकीन व्यंजनों की तो बात ही निराली है। और फिर बहस व्यंजनों की ओर मुड़ जाती है, जिसमें हर भोजनभट्ट अपनी तरफ से नई जानकारियां जोड़ते हुए नागर जी की जीभ का जायका बढ़ाने लगता है और उन्हें दावत देने लगता है। एक बार बातचीत में नागर जी ने बताया था कि उनकी मां बहुत अच्छा खाना बनाती थीं, जहां से उन्हें अच्छे खाने का चस्का लगा। और प्रमिला भाभी भी बहुत स्वादिष्ट भोजन बनाती हैं और इसमें भी कमाल की बात यह कि दोनों पति-पत्नी ही जायकेदार भोजन के गुणग्राहक हैं। लेकिन बहुत से लोग शायद यह नहीं जानते कि प्रमिला भाभी का कण्ठ बहुत सुरीला है। उनके स्वर में कबीर को सुनना एक अद्भुत अनुभव होता है। उन्हें सुनते हुए आपको कुमार गंधर्व और प्रहलाद टिपनिया का कबीर गायन याद आता है। मालवी लोकगीत भी प्रमिला भाभी को खूब याद हैं और मन करता है तो खुलकर गाती हैं। मुझे नहीं मालूम कितने सौभाग्यशाली मित्रों को प्रमिला भाभी को सुनने का अवसर मिला है, लेकिन मैं उन खुशकिस्मत लोगों में हूं।

नागर जी कविता में जितने सहज हैं, व्यंग्य में उतने ही तीखे और पत्रकारिता में वैसे ही प्रखर और गंभीर। मेरे खयाल से पत्रकारिता जो सबसे बड़ी चीज सिखाती है, वो है पठनीयता। और नागर जी ने इसे इस कदर साध लिया है कि वे सामान्य पाठक के दिल में सीधे उतर जाते हैं, फिर वो रचना किसी भी विधा की हो। इसीलिए हिंदी आउटलुक ने एक बार जब हिंदी के दस लोकप्रिय लेखकों का सर्वेक्षण किया तो उसमें विष्णु नागर भी एक रहे। ऐसी लोकप्रियता सहज बोधगम्य लेखन से ही हासिल होती है। उनकी कविताओं में मुझे लगता है कई बार उनका व्यंग्यकार बहुत सहजता से दाखिल होकर कविता को बहुआयामी और बेहद तीक्ष्ण बना देता है। ‘हंसने की तरह रोना’ संग्रह में ऐसी ही एक अद्भुत कविता है, जिसमें नरेंद्र मोदी और जॉर्ज बुश एकमेक होकर नई अर्थछवियां रचते हैं।
 
ग्‍लोबलाइजेशन के इस जमाने में
हत्‍यारे का नाम कुछ भी हो सकता है
जॉर्ज मोदी भी और नरेंद्र बुश भी

नागर जी अपनी कविता में कहीं भी, एक क्षण के लिए भी वैयक्तिक नहीं होते। आत्म से अगर उनकी कविता शुरु भी होती है तो एकाध पंक्ति के बाद ही उसमें पूरा मानव समाज किसी ना किसी रूप में आ जाता है और वैयक्तिक को निर्वैयक्तिक में बदलते हुए समूची मानवता को अपने संवेदना संसार में शामिल कर लेती है। उनका आधुनिकता बोध इतना गहरा है कि वे अत्यंत साधारण विषय को भी रोचकता के साथ बहुआयामी अर्थ दे देते हैं। ‘घर के बाहर घर’ संग्रह में एक कविता है ‘स्वर्ग में कुछ भी नहीं है’। इस कविता में नागर जी स्वर्ग में आधुनिक सुख सुविधाओं के अभाव की बात करते हुए कहते हैं,

स्वर्ग में बाज़ार नहीं है, भूमण्डलीकरण नहीं है
नहीं है, नहीं है, मैंने कहा न स्वर्ग में कुछ भी नहीं है

इसलिए मैं नरक तो फिर भी जा सकता हूं
लेकिन स्वर्ग-बिल्कुल नहीं!

विष्णु नागर का गद्य बहुआयामी है। वे इतिहास में जाकर पुराण कथाओं का ग़जब पुनराविष्कार करते हैं। कछुए और खरगोश की कहानी का जो नवीनीकरण नागर जी ने किया है, वह हमारे समय में पुराने आख्यानों को देखने की एक नई दृष्टि देता है। नागर जी ने इस क्रम में बहुत सारी पुराकथाओं का नवीकरण किया है। लेकिन मेरे विचार से उनका सबसे महत्वपूर्ण काम है, ‘ईश्‍वर की कहानियां’। ईश्‍वर का ऐसा दयनीय और मार्मिक रूप नागर जी ने रचा है कि आज के घोर आस्थावान और अंधभक्ति के माहौल में इन कथाओं को पढ़कर किसी भी पाठक को ईश्‍वर पर दया आ सकती है। नागर जी के लेखन की एक और जो बड़ी विशेषता है वो यह है कि वे हमारे समय में घट रहे यथार्थ को अतीत के आख्यानों से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भों में व्याख्यायित करते हुए पाठक को एक नये किस्म का आस्वाद देते हैं और अपने समय व समाज के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाते हैं। उनकी एक कविता है ‘लगते तो नहीं’:

कई बार लोग मुझी से पूछते हैं
कि क्या आप
विष्णु नागर हो

जब मैं कहता हूं कि हां हूं
तो वे कहते हैं कि लेकिन लगते तो नहीं

और वे भीड़ में
विष्णु नागर को ढूंढने आगे बढ़ जाते हैं।

यह जो नहीं लगना है वह बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि विष्णु नागर को देखकर सचमुच आपको नहीं लगता कि यह शाश्‍वत मुस्कुराने वाला मृदुलता से ओतप्रोत व्यक्तित्व इतना बहुआयामी लेखक-रचनाकार हो सकता है। और लोग अगर भीड़ में विष्णु नागर को ढूंढने निकल पड़ते हैं तो इसका यही अर्थ है कि विष्णु नागर जनता का रचनाकार है, वह व्यक्ति में नहीं समष्टि में मिलेगा। जहां भी जनता के सवाल होंगे, जनता होगी, आप विष्णु नागर को वहीं पाएंगे। हम खुशकिस्मत लोग हैं कि हमारे समय में एक ऐसा लेखक-रचनाकार मौजूद है, जो हमारे समय और समाज को विविध रूपों में रचते हुए न केवल साहित्य को समृद्ध कर रहा है, बल्कि अपनी जनता को, उसकी संवेदना को, उसकी सोच-समझ और संस्कारों को भी नए आयाम दे रहा है। विष्णु नागर शतायु हों, सहस्रायु हों, और निरंतर हमें अपनी रचनाशीलता से लाभान्वित करते रहें, यही कामना है।

यह आलेख 'संबोधन' पत्रिका के 'विष्‍णु नागर' पर केंद्रित अंक, अप्रेल-जून 2010 में प्रकाशित हुआ।

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Monday, 7 June 2010

विवादास्पद और वर्जित विषयों की रचनाकार : एलफ्रीडे जेलीनेक

यूरोप के छोटे-से देश ऑस्ट्रिया के साहित्य की तरफ दुनिया का ध्यान पहली बार तब आकर्षित हुआ जब नोबल पुरस्कार के 110 साल के इतिहास में पहली बार 2004 में, यहां की चर्चित नाटककार और उपन्यासकार ऐलफ्रीडे जेलेनीक को दुनिया के सबसे बड़े साहित्य सम्मान से नवाजा गया। इस पर खासा विवाद भी हुआ, क्योंकि यूरोप के स्वतंत्र समाज में भी जेलीनेक के लेखन को कई लोग अश्‍लीलता की श्रेणी में मानते हैं, लेकिन ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि जेलीनेक अपनी विवादास्पद लेखन शैली में कितनी चिंता और गहराई के साथ सामाजिक विद्रूपताओं को बेनकाब कर रही हैं। उनकी लेखनशैली और विवादित विषयों पर लिखने के मूल में जाएं तो कारण आसानी से समझ में आता है।

जेलीनेक का जन्म 20 अक्टूबर, 1946 को स्तीरिया प्रांत में हुआ। पिता चेक-यहूदी मूल के थे और मां विएना के प्रतिष्ठित परिवार से थीं। दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान पैतृक परिवार के बहुत से लोग नाजियों की बर्बरता के चलते मारे गए और जेलीनेक के पिता जिंदा बचने वालों में से एक थे। जेलीनेक की मां की इच्छा थी कि जेलीनेक कम उम्र में ही संगीत की दुनिया में नाम कमाए और यही सोचकर वे बेटी को लेकर विएना चली आईं जहां एक छोटे-से घर में मां-बेटी रहने लगे। मां के कठोर अनुशासन और जिद के आगे चार साल की उम्र में ही जेलीनेक को संगीत का कड़ा अभ्यास शुरु करना पड़ा। सामान्य शिक्षा के साथ संगीत का गहन अभ्यास करते हुए जेलीनेक ने 14 साल की उम्र में पियानो के लिए विशेष शिक्षा के लिए एक मशहूर संस्था में प्रवेश लिया। 4 साल बाद हाई स्कूल पास कर उन्होंने विएना विश्‍वविद्यालय में रंगमंच, कला और इतिहास विषयों के अध्ययन के लिए दाखिला लिया। इस बीच जेलीनेक कविताएं लिखने लगीं थीं और सत्रह साल की उम्र में पहली कविता प्रकाशित हुई। विश्‍वविद्यालय की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वो साहित्य की दुनिया में आ गई। पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और गद्य रचनाओं का नियमित प्रकाशन होने लगा और 1967 में पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। कविता के साथ जेलीनेक ने महिलाओं की समस्याओं को लेकर नाटक लिखना शुरु किया तो खासी शोहरत मिलने लगी। नारी की यौन प्रश्‍नाकुलता को जेलीनेक ने बड़ी शिद्दत से उठाया और पुरुष वर्चस्व को चुनौती दी। इस बीच छात्र संगठनों से जुड़ाव के कारण उनके लेखन में नारी समस्याओं के साथ दूसरी सामाजिक समस्याएं भी समाहित होने लगीं। 1970 में उनका एक उपन्यास बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसे हिंदी में ‘हम बच्चे नहीं चारा हैं’ कहा जा सकता है। इस उपन्यास में एक तरफ तो खुद जेलेनीक के बचपन का प्रभाव है और दूसरी तरफ छात्रों के साथ रहने के अनुभवों से उपजी संवेदनशीलता। किस प्रकार मां-बाप बच्चों पर अपने सपने लाद देते हैं और उनके स्वप्न छीन लेते हैं, इसे व्यंग्यात्मक शैली में जेलीनेक ने बहुत खूबसूरती से दर्शाया है। जेलीनेक की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें 1973 में ऑस्ट्रिया की राष्ट्रीय छात्रवृति प्रदान की गई।

1972 में दूसरा उपन्यास आया, जिसमें जेलीनेक ने ऑस्ट्रियाई समाज की आमबोलचाल की भाषा और संस्कृति को लेकर विद्रोही तेवर में कड़ी आलोचना करते हुए बताया कि बेहतर जीवन का दावा बिल्कुल झूठा है और वो समाज में कहीं दिखाई नहीं देता। महिलाओं के लिए वर्जित विषयों पर लिखते हुए जेलीनेक ने सारी परंपराएं तोड़ दीं और देश की चर्चित महिलाओं में शुमार हो गईं। 1974 में वे कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गईं और लेखन के साथ राजनीति में भी सक्रिय हो गईं। अगले ही साल उनका उपन्यास ‘वूमन एज लवर्स’ बहुत लोकप्रिय हुआ, इसे जर्मन भाषा पढ़ने वाले तमाम देश में प्रशंसा मिली। जेलीनेक के लेखन की खासियत यह है कि वो जो कथानक बुनती हैं, उसमें परिस्थितियां बहुत उलझी हुईं और जटिल होती हैं। पाठक हतप्रभ रह जाता है कि इस समाज में हिंसा और दमन इतने रूपों में व्याप्त है कि सहसा हमारा ध्यान ही नहीं जाता। दमन के शिकार लोगों को किस प्रकार बेबसी के साथ घुटने टेकने पड़ते हैं? मनोरंजन उद्योग किस तरह लोगों की चेतना को कुंद कर देता है और लोग वर्ग एवं लिंग के आधार पर होने वाले अन्याय के किसी भी प्रकार के प्रतिरोध के काबिल नहीं रह जाते? ऑस्ट्रियाई साहित्य में जेलीनेक जैसा स्वर पहली बार देखा गया है, इससे पहले के साहित्य में समाज की आलोचना तो होती थी, लेकिन बहुत संभ्रांत ढंग से।

जेलीनेक का उपन्यास ‘लस्ट’ दुनिया की कई कई भाषाओं में अनूदित होने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। इस उपन्यास में उन्होंने बुनियादी तौर पर सभ्यता और संस्कृति को लेकर ही कई सवाल उठाए हैं। जेलीनेक का मानना है कि जब तक समाज में महिलाओं पर होने वाली हर स्तर की हिंसा खत्म नहीं होगी, इस कथित सभ्यता पर सवाल उठते रहेंगे। उनकी लेखनी को किसी खास तरह से व्याख्यायित करना संभव नहीं है, क्योंकि उनके लेखन का दायरा बहुत विस्तृत है। गहरी काव्यात्मकता और व्यंग्य के साथ जेलीनेक अपने कथानक के साथ चलने वाली आवाजों को भी पूरा महत्व देते हुए एक अजीब किस्म का रसायन बनाती हैं कि पहले पाठ में सामान्य पाठक के पल्ले कुछ नहीं पड़ता, लेकिन धीरे-धीरे रहस्य खुलने लगते हैं, साथ होने वाली घटनाएं आवाजों के माध्यम से एक पूरे संसार की रचना करती हैं, जिसमें लेखिका का दर्द पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रकट होता है। हिंदी में एक प्रकाशक ने ‘लस्ट’ को मूल जर्मन से अनुवाद करवा कर छापा तो है, लेकिन अनुवादक ने देशज अनुवाद करने के प्रयास में जो कुछ किया वह भारतीय माहौल में अश्‍लीलता ही माना जाएगा। इसलिए प्रकाशक ने इसे जारी नहीं किया है।

एलफ्रीडे जेलीनेक बहुत मुखर लेखिका हैं। उन्होंने अपने देश की दक्षिणपंथी पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का खुलकर विरोध किया तो सरकार ने उन पर देशद्रोही होने का आरोप लगा दिया। लेकिन जेलीनेक की मुखरता का कोई अंत नहीं है। उन्हें लेखन के लिए उपन्यास और नाटकों पर कई पुरस्कार और सम्मान मिले। 2004 में जब नोबल पुरस्कार की घोषणा हुई तो वे लेने नहीं गई। उन्होंने कहा कि इतना बड़ा सम्मान मिलना प्रसन्नता की बात है, लेकिन मुझसे कई बड़े रचनाकार हैं, जो इसके हकदार हैं। करीब दो दशकों से वे अपने घर में ही रहती हैं और कहीं आती जाती नहीं। उन्हें सामाजिक जीवन से और प्रशंसकों की भीड़ से बड़ा डर लगता है। कठोर अनुशासन में बीते बचपन का असर ही है यह शायद कि जेलीनेक हवाई जहाज में बैठने से और बाजार जाकर खरीदारी करने से भी डरती हैं। उनके लेखन में व्याप्त भय और हिंसा का वातावरण वैश्विक है, लेकिन कितनी बड़ी विडंबना है कि दुनिया को भय से मुक्ति का मार्ग दिखाने वाली कलमकार अपने ही डर की वजह से विएना के अपने ही घर में खुद कैद होकर बैठी है।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 6 जून, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।













Sunday, 30 May 2010

सर्बिया का चमकीला नक्षत्र - ईवो आंद्रिक

दो साल की उम्र में जिस बालक को पिता अनाथ छोड़ जाएं, उस के भविष्य की कल्पना ही भयावह होती है। लेकिन जीवट हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता? ऐसा ही हुआ, 1961 के नोबल पुरस्कार विजेता कथाकार-उपन्यासकार ईवो आंद्रिक के साथ। 9 अक्टूबर, 1892 को जन्मे ईवो को पिता की मृत्यु के बाद मां के साथ ननिहाल आना पड़ा और आरंभिक वर्ष वहीं गुजारने पड़े। ईवो का जन्म आस्ट्रिया-हंगरी के अधीन प्राचीन ऑटोमान साम्राज्य में हुआ, जो पहले यूगोस्लाविया का भाग था और आज बोस्निया और हर्जेगोविना देश का हिस्सा है। शुरुआत में ईवो ने जिम्नास्टिक की शिक्षा ली और कालांतर में उच्च अध्ययन के लिए कई विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाई की। 19 साल की उम्र में ईवो की पहली कविता एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुई। युवावस्था में ही आंद्रिक क्रांतिकारी छात्र संगठनों से जुड़ गए थे, इसलिए उनके लेखन और व्यवहार में भी क्रांति के स्वर उभरने लगे थे। ईवो वैचारिक रूप से साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और यूगोस्लाविया के समर्थक थे, इसलिए उपनिवेशवादी सरकार ने प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान ईवो आंद्रिक को जेल में डाल दिया। जेल में रहने के दौरान आंद्रिक ने क्रांतिकारी साहित्य का भरपूर अध्ययन किया। लेकिन रूस की सफल क्रांति के बाद बने यूगोस्लाविया गणराज्य में ईवो आंद्रिक को जेल से रिहाई मिली।

प्रथम विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद ईवो आंद्रिक ने चार विश्‍वविद्यालयों में स्लाविक भाषा और साहित्य का अध्ययन किया और ‘तुर्की शासनकाल में बोस्नियाई संस्कृति का इतिहास’ विषय पर शोध किया। 1920 में उन्हें यूगोस्लावियाई प्रशासनिक सेवा में ले लिया गया, जहां बीस वर्ष तक उन्होंने कई महत्वपूर्ण राजनयिक पदों पर काम करते हुए अपनी लेखन यात्रा जारी रखी। ईवो की कविताएं अब तमाम महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं और उन्होंने लेखन के साथ विश्‍व साहित्य से अनुवाद का काम भी शुरु कर दिया था। 1920 में पहली कहानी के प्रकाशन के साथ ही ईवो आंद्रिक ने कविता से किनारा कर लिया और पूरी तरह गद्य के लिए समर्पित हो गए। कहानी लेखन में ईवो ने सदियों पुरानी यूगोस्लावियाई लोक संस्कृति को रूपायित करते हुए वहां की कैथोलिक, यहूदी और मुस्लिम समुदाय की समृद्ध विरासत और संघर्षशील जनता के दुख दर्द को शानदार अभिव्यक्ति दी।

दस साल में उनकी कहानियों के कई संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें सबका शीर्षक ‘कहानियां’ था। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान यूगोस्लाविया पर नाजी आक्रमण के बाद ईवो अपनी राजनयिक सेवा छोड़कर स्वदेश वापस लौट आए। लौटते ही नाजियों ने ईवो को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया। इस अवधि में ईवो ने अपना सर्वश्रेष्ठ लेखन किया जो 1945 में उपन्यास त्रयी के रूप में प्रकाशित हुआ। इस त्रयी में ‘द ब्रिज ऑन द्रीना’, ‘बोस्नियन क्रॉनिकल’ और ‘द वूमन फ्राम सरायेवो’ को जबर्दस्त लोकप्रियता हासिल हुई। पूर्वी बोस्निया में द्रीना नदी पर एक प्राचीन पुल के माध्यम से ईवो ने बोस्नियाई ग्रामीण समुदाय के चार सदियों के संघर्षमय जीवन को पहली बार विश्‍व के समक्ष रखा। यहां पुल और नदी जीवंत चरित्र के रूप में सामने आते हैं। यह पुल पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाले घटक के तौर पर उभरता है, जिसे प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है। ‘बोस्नियन क्रॉनिकल’ में संस्कृतियों के संघर्ष को ईवो ने अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। नेपोलियन के विश्‍वविजयी अभियान के बाद फ्रांसिसी शासन के दौरान किस तरह तुर्की और यूरोपीय संस्कृतियों में जबरदस्त टकराव होता है, इसे महज सात साल के दौरान एक कथासूत्र में पिरोकर ईवो आंद्रिक ने दर्शाया। ‘द वूमन फ्राम सरायेवो’ में एक नौकरानी की धनलोलुपता को ईवो ने एक नीतिकथा की शैली में औपन्यासिकता प्रदान की। यह नौकरानी अच्छी खासी खाती पीती महिला है, लेकिन पैसों को लेकर उसके लालच का कोई अंत नहीं है।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद ईवो आंद्रिक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और कई वर्षों तक वे यूगोस्लावियाई लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। इस अवधि में ईवो ने सैंकडों कहानियां, यात्रा संस्मरण, सामयिक विषयों पर लेख और कुछ लघु उपन्यास लिखे। पांचवे दशक में यूगोस्लाविया में सामाजिक यथार्थवाद और आधुनिकता को लेकर लंबी बहस चली, जिसमें ईवो आधुनिकता के पक्ष में खड़े थे और अंततः उनके पक्ष की ही जीत हुई। 1960 तक आते-आते ईवो आंद्रिक की रचनाओं का दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद होने लगा था और वे सर्वाधिक अनूदित सर्बियाई लेखक हो चुके थे। यूगोस्लाविया के वे सबसे सम्मानित, चर्चित और महत्वपूर्ण व्यक्तियों में थे। 1959 में जाकर ईवो ने चित्रकार मिलिका बेबिक से विवाह किया। 1961 में उन्हें नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। सर्बियाई भाषा के वे पहले साहित्यकार थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित होने का गौरव मिला। उनकी नोबल प्रशस्ति में कहा गया कि ईवो आंद्रिक के लेखन में आधुनिक मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के साथ पुराकथाओं जैसी मानव नियति के दर्शन होते हैं। मानवता के प्रति ईवो गहरा अनुराग और प्रेम महसूस करते हैं लेकिन सबसे बड़ी बुराई के तौर पर दुनिया में मौजूद भय और हिंसा से मुंह नहीं मोड़ते। ईवो आंद्रिक ने अपने देश के इतिहास से मानव की नियति कथाओं को लेकर महाकाव्यात्मक शक्ति से अभिव्यक्त किया है। हिंदी में उनकी कुछ कहानियों का अनुवाद हुआ है। करीब तीन दशक पहले ईवो की उपन्यास त्रयी के पहले उपन्यास को साहित्य अकादमी ने ‘द्रीना नदी का पुल’ शीर्षक से प्रकाशित किया था, जो अब अनुपलब्ध है। ईवो आंद्रिक के लेखन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक निजी और देशज कथा को वैश्विक आयाम देते हैं और इसीलिए सुदूर बोस्निया के बाशिंदों की कहानी भी अपनी-सी लगने लगती है। 13 मार्च, 1975 को 83 बरस की उम्र में ईवो आंद्रिक का निधन हुआ। उनकी मृत्यु के बाद बोस्निया में उनका स्मारक और संग्रहालय बनाया गया। ईवो आंद्रिक आज भी दुनिया में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले सर्बियाई लेखक हैं।