Monday, 12 September 2011

कुछ नई कविताएं

इधर मेरी कुछ कविताएं लखनऊ से प्रकाशित होने वाले जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित हुईं और फिर भाई प्रभात रंजन ने इन्‍हें जानकी पुल पर प्रकाशित किया। ये कविताएं अब आप सबके लिए यहां भी प्रस्‍तुत कर रहा हूं।

देह विमर्श

एक
परिचय सिर्फ इतना कि नाम-पता मालूम
मिलना शायद ही कभी हुआ
बात करना तो दूर का सपना
फिर भी बंध जाते दो प्राणी
एक पवित्र बंधन में

आनंद-उत्‍साह और ठिठोली भरे
कुछ रस्‍मी खेल-तमाशे
थोड़ी-थोड़ी खोलते
अपरिचय की गांठ
अंगुलियों के पोर
दूध भरे बर्तन में
जल्‍दी-जल्‍दी खोजते
कोई सिक्‍का या अंगूठी

हल्‍के-फुल्‍के स्‍पर्श
और मस्‍ती भरी चुहल से बनता एक पुल
जिस पर टहलने निकल पड़ते दो प्राणी
भय और आशंकाओं के साथ
एक लंबी यात्रा पर

गेह बसाने के लिए
मिली थी एक देह
ऐसा बंधा उससे नेह कि
देहयात्रा ही बन गई गेहयात्रा।

दो

कैसे तो कांपते थे हमारे अंग-प्रत्‍यंग
शुरु-शुरु में
एक दूसरे से छू जाने पर
एक बिजली-सी दौड़ जाती थी
जैसे आकाश से धरती के ओर-छोर तक

उन स्‍पर्शों का आदी हुआ
पहले यह शरीर
फिर इस देह की समूची चेतना

हम बेफिक्र हुए
एक दूसरे के आवागमन से
किंचित पराई देह भी
धीरे-धीरे लगने लगी
बिल्‍कुल अपनी जैसी

आंख फड़कना
खुजली चलना
और ऐसे ही ना जाने कितने संकेत
समझने लगी एक देह
पराई देह को लेकर।

तीन

नहीं उस देह में बसे प्राण से
कभी नहीं रहा कोई संबंध कोई नाता
फिर भी हमने गुजार दी
तमाम उम्र उसी के साथ

गोया दो दरख्‍त हों जंगल में
जिन्‍हें कुदरत ने उगा दिया हो साथ-साथ
और इतने पास कि
दूर होना सोचा भी ना जा सके।


फर्क

फर्क आंख का नहीं
फकत देखने का है

मछली की आंख से देखो
सारी दुनिया पानीदार है।

रंगों की कविता

इतना तो हरा कि
एक कैनवस भरा
नीली शस्‍य-श्‍यामला धरती जैसा

ठिठक जाती है नजर
रंगों के पारभासी संसार को देखते हुए
यह सफेद में से निकलता हुआ श्‍यामल है कि
श्‍याम से नमूदार होता उजला सफेद
जैसे जीवन में प्रेम

यह कच्‍चा हरा नई कोंपल-सा
फिर धीरे-धीरे पकता ठोस हरा-भरा
यह आदिम हरा है काई-सा
इस हरियल सतह के
कोमल खुरदुरेपन को छूकर देखो
वनस्‍पति की शिराओं-धमनियों में बहता
एक विरल-तरल संसार है यहां।

पक्षीगान

भोर में सुनता हूं
सांझ की गोधूलि बेला में सुनता हूं
परिंदों का संगीतमय गुंजनगान

सुबह उनकी आवाज में
नहीं होती प्रार्थना जैसी कोई लय
लगता है जैसे समवेत स्‍वर में गा रहे हों
चलो चलो काम पर चलो

संध्‍या समय उनके कलरव में
नहीं होता दिन भर का रोना-धोना
न आने वाले कल की चिंता

सूरज के डूबने से उगने तक
इतने मौन रहते हैं परिंदे
जैसे सूरज को जगाने और सुलाने का
जिम्‍मा उन्‍हीं के पास है।

सच और झूठ

सत की करणी
झूठ का हथौड़ा
चलते साथ थोड़ा-थोड़ा

झूठ की धमक से
हिलती सत की काया
डगमगाकर गिरती
कर्मों के मसाले में

झूठ का वेगवान अंधड़
तहस-नहस कर देता
सारे संतुलनों को
और कहीं सत्‍य पर प्रहार करते
झूठ का हथौड़ा जा गिरता
अनंत अंधकार की देग में

सत की करणी
फिर भी टिकी रहती
एक कारीगर के इंतजार में।

जामुन को देखकर

जामुन को देख खयाल आता है
जामुनी रंग से लबालब लोगों का

क्‍या उन्‍होंने कभी सोचा होगा
कितना जामुनी है उनका रंग
क्‍या जामुन को भी खयाल आता है
अपने जैसे रंग वाले शख्‍स को देखकर कि
अरे यह तो ठीक मेरे जैसा...

जामुन जैसा खास तिक्‍त स्‍वाद
और कहां है सृष्टि में
मेरे जेहन में कौंध जाते हैं
वो खूब गहरे गुलाबी होंठ
और याद आता है उनका जामुनी होना।

वोट

शुरुआती सालों में
मुझे लगता रहा कि
मेरे पास यही
सबसे शक्तिशाली चीज है
मैं चाहूं तो बदल सकता हूं
इस वोट से देश का भविष्‍य

धीरे-धीरे कागज के इस टुकड़े की
कीमत घटने लगी
जैसे घटती है करेंसी नोट की
और फिर मेरे लिए वोट रह गया
महज रद्दी कागज का पुरजा

बाद के बरसों में वह
हल्‍की लंबी बीप में बदलता चला गया
जैसे मैं इस महान गणतंत्र का
साधारण नागरिक
टेक्‍नोलोजी में चीख रहा हूं

ओह मैंने क्‍या किया
अपनी पूरी ताकत लगाकर चीखा भी तो
वह महज बीप निकली
आह जैसे
लोकतंत्र की चीख निकली।

पेंटिंग अर्पणा कौर की है।



Wednesday, 31 August 2011

इशरत के लिए

(एक असमाप्‍त लंबी कविता का पहला ड्राफ्ट )


इस जहां में हो कहां
इशरत जहां


तुम्‍हारा नाम सुन-सुन कर
पक ही गए हैं मेरे कान


आज फिर उस उजड़ी हुई
बगीची के पास से गुज़रा हूं तो
तुम्‍हारी याद के नश्‍तर गहरे चुभने लगे


तुम कैसे भूल सकती हो यह बगीची
यहीं मेरी पीठ पर चढ़कर
तुमने तोड़ी थीं कच्‍ची इमलियां
यहीं तुम्‍हारे साथ खाई थी
बचपन में जंगल जलेबी
माली काका की नज़रों से बचकर
हमने साथ-साथ चुराए थे
कच्‍चे अमरूद और करौंदों के साथ अनार


सुनो इशरत
इस बगिया में अब हमारे वक्‍त के
कुछ बूढ़े दरख्‍त ही बचे हैं
एक तो शायद वह नीम है
जिस पर चढ़ने की कोशिश में
तुम्‍हारे बांए पांव में मोच आ गई थी


लाख कोशिशों के बावजूद
नहीं नष्‍ट हुआ वह जटाजूट बरगद
जिसके विशाल चबूतरे पर जमी रहती थी
मोहल्‍ले भर के नौजवान-बुजुर्गों की महफिल


इसी बरगद की जटाओं पर झूलते हुए
हमने खेला था टार्जन-टार्जन
अब वह छोटा-सा शिवालय नहीं रहा
एक विशाल और भव्‍य मंदिर है यहां
नहीं रहे पुजारी काका
अब तो पीतांबर वर्दीधारी दर्जनों पुजारी हैं यहां
रात-दिन गाडि़यों की रेलपेल में
लगी रहती है भक्‍तों की भीड़
हमारे देखते-देखते वह छोटा-सा शिवालय
बदल गया प्राचीन चमत्‍कारी मंदिर में


बहुत कुछ बदल गया है इशरत
इसी बगीची के दूसरे छोर पर
करीब एक मील आगे चलकर
शिरीष, गुलमोहर, नीम, पीपल और बबूल के
घने दरख्‍तों से घिरी थी ना
सैय्यद बाबा की निर्जन-सी मजार
जहां शाम के वक्‍त आने से डरते थे लोग
कहते थे यहां पहाडि़यों से आते हैं
हिंसक वन्‍य जीव पास के तालाब में पानी पीने
वह छोटी-सी उपेक्षित मजार
तब्‍दील हो गई है दरगाह में
दरख्‍तों की हरियाली वहां अब
हरी ध्‍वजाओं में सिमट गई है

इस तेज़ी से बदलती दुनिया में
हमारे बचपन और स्‍मृतियों के साथ
ना जाने क्‍या-क्‍या छूटता चला गया
मन के एक हरियल कोने में
तुम्‍हारे नाम की चंचल चिडि़या
कूकती रही लगातार


गुज़रे वक्‍त के लिए मेरे पास
कोई ठीक शब्‍द नहीं
पाश की भाषा में कहूं तो यह सब क्‍या
हमारे ही वक्‍तों में होना था?
मज़हब और जाति के नाम पर
राजनीति का एक अंतहीन खूनी खेल
जिससे घायल होती रही
मेरे मन में बैठी
तुम्‍हारे नाम की नन्‍हीं चिडि़या
उसकी मीठी कूक
धीरे-धीरे बदल गई रूदन में


फिर जो गूंजा तुम्‍हारा नाम खबरों में
तो हैरत में पड़ गया था मैं...








Saturday, 20 August 2011

आंदोलन से उठे सवाल


भ्रष्‍टाचार भारत सहित तीसरी दुनिया में खास तौर एशियाई देशों में एक विकराल समस्‍या है, जिससे आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा परेशान है। सभी देशों में इससे निपटने के कानून भी बने हुए हैं, बावजूद इसके भ्रष्‍टाचार रुकने का नाम नहीं ले रहा। भारत में ही देखा जाए तो बैंकिंग और बीमा सहित अनेक सेवा क्षेत्रों में तथा बहुत से राज्‍यों में लोकपाल और लोकायुक्‍त काम कर रहे हैं। इसके साथ ही विभिन्‍न विभागों में सतर्कता अधिकारी भी यही भूमिका निभा रहे हैं। बावजूद इसके आए दिन इन क्षेत्रों में भ्रष्‍टाचार की खबरें आती रहती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि लोकपाल, लोकायुक्‍त या सतर्कता अधिकारी कोई निष्क्रिय संस्‍था है। इन संस्‍थाओं के होने मात्र से आम जनता में यह विश्‍वास गहरा होता है कि इस व्‍यवस्‍था में कार्यपालिका और न्‍यायपालिका के बीच एक जगह है, जहां से न्‍याय मिलने की उम्‍मीद की जा सकती है। मोरारजी देसाई  की अध्‍यक्षता में 1966 में गठित प्रशासनिक सुधार आयोग ने केंद्रीय स्‍तर पर जनलोकपाल और राज्‍य स्‍तर पर लोकायुक्‍त की द्विस्‍तरीय व्‍यवस्‍था के लिए सिफारिश की थी। 1968 से लोकपाल और लोकायुक्‍त के लिए संसद और विधान सभाओं में कई विधेयक पारित हुए हैं। लेकिन केंद्रीय स्‍तर पर जनलोकपाल गठित करने की दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। वर्तमान में चल रहे अन्‍ना हजारे के आंदोलन में यही मांग है कि देश में केंद्रीय स्‍तर पर जनलोकपाल के रूप में एक ऐसी नियामक संस्‍था गठित कर दी जाए जो जनप्रतिनिधियों द्वारा किए जाने वाले भ्रष्‍टाचार पर भी अंकुश लगा सके। पिछले कुछ सालों से यह लगातार देखने में आया है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि बड़े पैमाने पर भ्रष्‍टाचार कर बच निकलते हैं। इसी तरह न्‍यायपालिका में भी व्‍यापक भ्रष्‍टाचार फैला हुआ है, जिसे काबू करना वर्तमान परिस्थितियों में बहुत मुश्किल नजर आता है। अगर जनलोकपाल जैसी एक नियामक संस्‍था हो तो जनप्रतिनिधियों और न्‍यायपालिका को कुछ हद तक दुरुस्‍त किया जा सकता है।



लेकिन पहला सवाल यहीं से उठता है कि क्‍या संसद और न्‍यायपालिका के भ्रष्‍टाचार से आम आदमी का कोई लेना देना है जो इतनी बड़ी संख्‍या में लोग अन्‍ना के समर्थन में सड़कों पर आ रहे हैं। दरअसल आम आदमी जिस भ्रष्‍टाचार से परेशान है वह जनलोकपाल से नहीं खत्‍म होने वाला। साधारण नागरिक को शायद ही कभी किसी जनप्रतिनिधि या न्‍यायपालिका के उच्‍च स्‍तर पर बैठे लोगों के भ्रष्‍टाचार का सामना करना पड़ता हो। जनता के पास उस भ्रष्‍ट मशीनरी से लड़ने के लिए पहले से ही बहुत से विकल्‍प लोकतंत्र में मौजूद हैं। लेकिन हमारा समाज बहुधा भीड़ की मानसिकता से चलता है। उसे लगता है कि अन्‍ना के आंदोलन में भाग लेने से राशन वाला भी ठीक किया जा सकता है, इसलिए वह उसके साथ हो लेता है। इसमें कोई शक नहीं कि भ्रष्‍टाचार चाहे जिस स्‍तर पर हो, उसका परिणाम अंतत: आमजन को भोगना होता है। इसलिए उसकी भागीदारी को निरुद्देश्‍य भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन जनता के इस व्‍यापक उभार को चलाने वाली शक्तियां और भी हैं, जिनकी तरफ इधर ध्‍यान नहीं दिया जा रहा। सोचिए कि जनलोकपाल के गठन से सर्वाधिक लाभ किसे होगा? देश की सर्वोच्‍च मशीनरी में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार से कौन सबसे ज्‍यादा परेशान है? और जब खुद अन्‍ना हजारे कह चुके हैं कि जनलोकपाल के गठन से भ्रष्‍टाचार शत प्रतिशत नहीं साठ प्रतिशत तक कम हो सकेगा। यानी चालीस प्रतिशत भ्रष्‍टाचार तो फिर भी मौजूद रहेगा। इसका सीधा अर्थ हुआ कि सर्वोच्‍च स्‍तर पर व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त लोगों को चालीस फीसदी का फायदा या नुकसान होगा। अब शायद उन लोगों की पहचान आसान हो जाएगी जिन्‍हें इस विधेयक के पारित होने से लाभ होगा।



हाल ही हुए टूजी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले में हम देख चुके हैं कि ए. राजा और उनके साथियों ने सैंकड़ों करोड़ का घोटाला किया। जा‍हिर है जनलोकपाल के गठन के बाद इस घोटाले में साठ फीसद कमी आएगी। यानी जनप्रतिनिधियों को चालीस प्रतिशत कम मिलेगा और यही न्‍यायपालिका के उच्‍च पदों पर पदस्‍थ लोगों के साथ होगा। इस प्रकार देश का एक वर्ग जो अब तक उच्‍च पदों पर व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार से दुखी है, उसे साठ प्रतिशत का मुनाफा होगा और यह ध्‍यान में रखिए कि ये आम आदमी नहीं हैं। ये लोग ही आम जनता को अपने लाभ के लिए अन्‍ना के आंदोलन के लिए तैयार कर रहे हैं, एसएमएस-ईमेल आदि किए जा रहे हैं।



लेकिन सरकार ने जनलोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया है वह जनप्रतिनिधियों और न्‍यायपालिका को इसके दायरे से बाहर रखता है। इस तरह सरकार ने जनलोकपाल के नाम पर एक सामान्‍य सी संस्‍था बनाने का इरादा किया है जो महज फोन-इंटरनेट के जरिये होने वाली बातचीत और संदेशों की निगरानी करेगी। जाहिर है सरकार का इरादा ही नहीं है कि न्‍यूजीलैंड और अन्‍य देशों की तरह कोई सर्वोच्‍च लोकपाल का गठन हो। सरकार के नुमाइंदे कतई नहीं चाहते कि कोई उन पर निगरानी करने वाली संस्‍था बने। इसके लिए उनके पास अपने तर्क हैं कि संविधान में संसद और न्‍यायपालिका के पास सर्वोच्‍च अधिकार सुरक्षित हैं और संसद से ऊपर कुछ नहीं हो सकता। लेकिन हमारे संविधाननिर्माताओं ने कभी स्‍वप्‍न में भी कल्‍पना नहीं की होगी कि इस देश में एक दिन ऐसा भी आएगा, जब चुने हुए जनप्रतिनिधियों पर भी लगाम कसने की जरूरत आन पड़ेगी। इसलिए जनता में जो चेतना जाग्रत हुई है वह हमारे देश के लोकतंत्र के लिए बहुत शुभ संकेत है कि वक्‍त आने पर वह उठ खड़ी हो सकती है।



लेकिन इस आंदोलन को सरकारी मशीनरी ने जिस ढंग से निपटाने की कोशिश की है, वह निरंतर सरकार को हास्‍यास्‍पद बनाती गई है। एक बहुमतों के वाली सरकार के पास इससे बेहतर विकल्‍प थे, जिनसे वह आराम से आंदोलन से निपट सकती थी। मसलन सरकार चाहती तो टीम अन्‍ना के साथ मिलकर उनकी भावनाओं के अनुरूप जनलोकपाल बिल का मसौदा तैयार कर सकती थी। जब विधेयक संसद में रखा जाता तो वह बहस के जरिए उसे खारिज या पारित करवा सकती थी, क्‍योंकि उनके पास बहुमत है। अगर विधेयक सरकार की मंशाओं के अनुरूप नहीं भी होता तो राष्‍ट्रपति से भी वापस करवाने का मौका तो सरकार के पास था ही। लेकिन सरकार ने ऐसे विकल्‍पों पर विचार करने के बजाय दमनकारी तरीकों से आंदोलन से निपटने का रास्‍ता अख्तियार किया जो जन आक्रोश का बायस बना। हमारे खबरिया चैनलों को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया और पंद्रह अगस्‍त के दिनों में मध्‍यवर्ग में जागने वाली देशभक्ति की भावना को व्‍यक्‍त करने का अवसर मिल गया।



अब जबकि सरकार और टीम अन्‍ना के बीच अनशन और आंदोलन को लेकर समझौता हो चुका है, यह साफ हो गया है कि जनलोकपाल के नाम पर सरकार अपनी पसंद का विधेयक ही लाएगी और भ्रष्‍टाचार मुक्ति के नाम पर महज लीपापोती की कार्यवाही होगी। जहां तक आंदोलन की बात है, वह भी अब अधिक चलने वाला नहीं है, क्‍योंकि मध्‍यवर्ग के दम पर आप कोई लंबा आंदोलन नहीं चला सकते। हालांकि मध्‍यवर्ग ही है जो इतिहास में क्रांतिकारी भूमिका निभाता आया है, लेकिन तभी जब वह अपने से नीचे के लोगों के आंदोलन में साथ दे। दुर्भाग्‍य से यह आंदोलन मध्‍यवर्ग के बीच ही सिमटा हुआ है, जिसमें वास्‍तविक जन कहीं नहीं है। इसलिए वह आधे दिन के अवकाश, बाजार बंद, रैली, प्रदर्शन, प्रभात फेरी, मोमबत्‍ती जलाना तो सुविधाजनक रूप से कर सकता है, लेकिन गरीब किसान और मजदूर की तरह बेमियादी आंदोलन नहीं कर सकता। बदली हुई परिस्थितियों में मध्‍यवर्ग सांकेतिक आंदोलन से अधिक कुछ भी करने में असमर्थ है, क्‍योंकि उसके पास ना तो समय है और न ही सब कुछ दांव पर लगाने की सामर्थ्‍य।



भ्रष्‍टाचार एक गंभीर चुनौती है लेकिन कानून बना कर इसे खत्‍म नहीं किया जा सकता। जब सड़क पर वाहन चलाने के नियमों का ही पालन नहीं होता तो जनलोकपाल या कोई भी नियामक संस्‍था कैसे भ्रष्‍टाचार खत्‍म करेगी? भ्रष्‍ट या अनैतिक होना अब इस देश में व्‍यक्तिगत तौर पर ही संभव रह गया है। हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र ही ऐसा है कि हमारे लिए किसी भी सीमा तक नैतिक पतन एक सामान्‍य बात हो गई है। इतने बड़े घोटाले हो चुके हैं और हो रहे हैं कि सब कुछ सामान्‍य लगता है। राजनीति ने भ्रष्‍टाचार को नैतिक बना दिया है। जो भ्रष्‍ट नहीं है, वही आज अनैतिक या कि मिसफिट है। चुनाव आयोग की तमाम कवायद के बावजूद चुनावों में सिर्फ धनबल या बाहुबल से ही जीतना संभव रह गया है। ऐसे में कोई लोकपाल भी क्‍या कर लेगा? क्‍योंकि जब सरकार ने साफ कर दिया है कि वह अपने से ऊपर कोई नियंत्रक नहीं चाहती तो यह भी साफ है कि भ्रष्‍टाचार के बारे में पूरी गंभीरता से चिंता व्‍यक्‍त करती सरकार को ग़म तो बहुत है मगर अफसोस के साथ। और अफसोस कि इस देश में मध्‍यवर्ग की कथित दूसरी आजादी का स्‍वप्‍न अधूरा है। मध्‍यवर्ग के लिए अफसोस व्‍यक्‍त करने का मुख्‍य कारण यह कि उसे राजधानी में गरीब, मजदूर, आदिवासियों, कर्मचारियों और किसानों के बुनियादी सवालों पर होने वाले धरने या प्रदर्शन से सिर्फ ट्रेफिक जाम की चिंता सताती है और जिस आंदोलन में संघी-भाजपाई कूद पड़ें वह देशभक्ति साबित करने का बायस बन जाता है।

Sunday, 24 July 2011

सतरंगी है सावन


तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ साथ
                           *परवीन शाकिर

क्‍या घर, क्‍या जंगल और क्‍या बादल, सावन में तो यूं लगता है जैसे पूरी कायनात भीग रही है। पत्‍ता-पत्‍ता, बूटा-बूटा, रेशा-रेशा, जर्रा-जर्रा जिस वक्‍त भीगता है और हवा में एक मदमस्‍त कर देने वाली खुश्‍बू बिखेर देता है तो धरती और आकाश के बीच अमृत सरीखी पानी की बूंदें नाचने लगती हैं। कुदरत की ताल पर नाचते इन नन्‍हे-नन्‍हे पानी के कतरों पर जब सूर्यदेव की किरणें अपना स्‍नेह लुटाने आती हैं तो इस कायनात के तमाम रंग एक साथ कतार बांधकर खड़े हो जाते हैं सावन के स्‍वागत में। कुदरती रंगों की यह कतार इंसानी आंखों में इंद्रधनुष बन जाती है और एक ऐसे पावन दृश्‍य की रचना करती है कि इंसानी जज्‍बातों का समंदर मचलने लगता है। ऐसे में एक बार फिर परवीन शाकिर का शेर याद आता है:

धनक उतरती नहीं मेरे खून में जब तक
मैं अपने जिस्‍म की नीली रगों से जंग में हूं

धनक माने इंद्रधनुष के सातों रंग जब तक इंसान की जज्‍बाती नसों में नहीं उतरते, वो अपनी नीली नसों से ही लड़ता रहता है। किसे नहीं भाती रंगों की यह अनुपम सौगात, जो हमें यूं तो बारह महीने देखने को मिलती है, लेकिन बारिश में और खासकर सावन में सबसे ज्‍यादा दिखाई देती है। इस कुदरती करिश्‍मे को हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति में इतना पवित्र माना गया है कि हमारे बचपन में इसकी ओर अंगुली उठाना भी पाप माना जाता था और बड़े बुजुर्ग कहते थे कि इंद्रधनुष की ओर अंगुली उठाने से तुम्‍हारी अंगुलियां गल जाएंगी। ऐसी पवित्रता और किन कुदरती चीजों को लेकर है जरा सोचिए।

यूं दुनिया भर में इंद्रधनुष को लेकर कई किस्‍म के धार्मिक विश्‍वास हैं, हम तो इसे वर्षा ऋतु के देवता इंद्र का धनुष मानते हैं, लेकिन बंगाल में इसे भगवान राम का धनुष माना जाता है और इसीलिए इसे रामधनु कहते हैं। अरबी और इस्‍लामिक संस्‍कृति में भी इसे बादल और बारिश के फरिश्‍ते कुज़ह का धनुष मानते हैं।  यूनानी मिथकों में इसे वो रास्‍ता माना जाता है जो देवदूत आइरिस ने धरती और स्‍वर्ग के बीच बनाया था। बारिश से बाढ़ जैसी त्रासदियां भी जुड़ी होती हैं, इसीलिए मेसोपोटामिया के गिलगमेश महाकाव्‍य में इंद्रधनुष को माता इश्‍तर के गले का वो हार कहा गया है जो माता ने इस वचन के साथ आकाश में उठा लिया कि वह उन दिनों को कभी माफ नहीं करेगी, जिन्‍होंने भयानक बाढ़ में उसके बच्‍चों को लील लिया। ईसाई मिथकों में भी इंद्रधनुष को ईश्‍वर का ऐसा ही वचन माना जाता है। एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि किसी भी सभ्‍यता और संस्‍कृति में इंद्रधनुष को बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं देखा गया और हो भी क्‍यों... कुदरत की इतनी नायाब और सुंदरतम कृति को कोई कैसे बुरा कह सकता है। सही बात तो यह है कि इंद्रधनुष सबसे ज्‍यादा युवा दिलों को सदियों से पसंद आता रहा है और नैसर्गिक प्रेम के प्रतीक के रूप में दुनिया भर की कविता में व्‍यक्‍त होता आया है। सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना ने एक प्रेम कविता में लिखा है-

मुझे चूमो / खुला आकाश बना दो
मुझे चूमो / जलभरा मेघ बना दो
मुझे चूमो / शीतल पवन बना दो
मुझे चूमो / दमकता सूर्य बना दो
फिर मेरे अनंत नील को इंद्रधनुष सा लपेट कर
मुझमें विलय हो जाओ।

विज्ञान में सबसे पहले अरस्‍तू ने इसकी व्‍याख्‍या की और उसके बाद पानी की बूंदों और सूरज की किरणों के इस अचरज भरे खेल को लेकर वैज्ञानिकों ने खूब दिमाग दौड़ाए और इसका पूरा खेल खेलकर रख दिया। लेकिन प्रकृति के इस चमत्‍कार को कवि, कलाकार और लेखकों ने रंगों और प्रकाश का खेल नहीं समझा, उनके लिए यह जादुई संसार विज्ञान की व्‍याख्‍याओं से टूटने वाला नहीं था। अंग्रेजी के महान कवि जॉन कीट्स ने महसूस किया कि न्‍यूटन ने इंद्रधनुष को लेकर रची गई तमाम कविताएं नष्‍ट कर डालीं, इसीलिए उन्‍होंने एक विता में लिखा, एक समय था जब स्‍वर्ग में एक दारुण इंद्रधनुष हुआ करता था। उन्‍होंने बड़े दुख के साथ आगे लिखा कि दर्शन और विज्ञान एक दिन तमाम मिथकों को जीत लेंगे और इंद्रधनुष को उधेड़ कर रख देंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और इंद्रधनुष का जादू साहित्‍य और कला में बरकरार रहा। इसीलिए इसकी शान में परवीन शाकिर ने लिखा,

धनक धनक मेरी पोरों के ख्‍वाब कर देगा
वो लम्‍स मेरे बदन को गुलाब कर देगा

कबा-ए-जिस्‍म के हर तार से गुजरता हुआ
किरन का प्‍यार मुझे आफताब कर देगा

रिचर्ड डॉकिंस ने कीट्स की मान्‍यता के उलट कहा था कि विज्ञान हमेशा ही अपनी प्रकृति से महान कविता को प्रेरित करता है। आप इस अवधारणा को परवीन के इन दो शेरों में बहुत गहराई से पहचान सकते हैं। कुदरत का एक बेमिसाल नजारा कैसे नायाब कविता को संभव बनाता है और कैसे विज्ञान के द्वारा खोले हुए रहस्‍य को एक कवयित्री अपनी कविता में बहुत प्‍यार से एक नई कल्‍पना का रूप देती है। कीट्स के बरक्‍स विलियम वर्ड्सवर्थ कहते हैं-

मेरा दिल उछलता है
जब मैं आकाश में एक इंद्रधनुष निहारता हूं
यही हुआ था जब मैं जन्‍मा था
अब जबकि मैं जवान हो गया हूं
तब भी यही होता है
जब मैं बूढा हो जाउंगा या मर जाउंगा
तब भी यही होगा
शिशु पिता है पुरुष का
और मैं कामना करता हूं कि
आने वाले मेरे तमाम दिन
नैसर्गि‍क पवित्रता से बंधे रहें।

दुनिया में जहां भी सामाजिक और सांस्‍कृतिक विविधता है, वहां उस वैविध्‍य को सुंदरतम रूप देने के लिए इंद्रधनुष की ही उपमा दी जाती है। हमारे देश में जो विराट सांस्‍कृतिक वैभव और विविधता है, उसे इंद्रधनुषी सांस्‍कृतिक छटा इसीलिए कहते हैं। दक्षिण अफ्रीका में हमारी तरह ही रंग-बिरंगा सांस्‍कृतिक संसार है, इसलिए वहां की पूरी संस्‍कृति को ही रेनबो कल्‍चर कहते हैं। इस तरह दुनिया में इंद्रधनुष एक ऐसे अकेले प्रतीक के रूप में सामने आता है जो विविधताओं के बावजूद एकता, सहअस्तित्‍व और सहजीवन को दर्शाता है। इस दुनिया में जितने धार्मिक विश्‍वास हैं, सांस्‍कृतिक मान्‍यताएं हैं और जितनी भी किस्‍म की विविधताएं हैं, वे सब हमें इंद्रधनुषी आभा में लिपटी इस प्रकृति की सबसे शानदार विरासत लगती हैं। यह विरासत हमें एक ऐसी दुनिया रचने-बसाने की प्रेरणा देती है जिसमें सारी असहमतियों और विभिन्‍नताओं के बावजूद हम एक साथ रह सकते हैं, क्‍योंकि इसी में वह कुदरती खूबसूरती है, जो धरती पर इंद्रधनुष रचती है। कितनी खूबसूरत कल्‍पना है कि इंद्रधनुष के सात रंगों में इस धरती के समस्‍त धर्म एक कतार में यूं झुककर धनुषबद्ध हो जाते हैं जैसे पृथ्‍वी को सिजदा कर रहे हों। इस जमीन पर ऐसे इंद्रधनुष रचने की जरूरत है, जो इंसान को इंसान से जोड़ें, जो भय से दुनिया को मुक्‍त करे। हमें वो इंद्रधनुष चाहिएं, जिनके रंगों में हम अपने आसपास की दुख और दारिद्र्य भरी दुनिया को खूबसूरत लिबासों में सजा सकें और उन्‍हें आसमानों की बुलंदियों पर इंद्रधनुष की तरह देख सकें। हमें विज्ञान की वह प्रकाशभरी दुनिया चाहिए जो कुदरत के इंद्रधनुषी रहस्‍यों को खोलती हुई इंसान को अज्ञान के सनातन अंधकार से बाहर निकाल कर इंद्रधनुष दिखाए। यूनानी मिथक में जो रास्‍ता देवदूत स्‍वर्ग से धरती के बीच बनाता है, वह रास्‍ता हमें जमीन पर स्‍वर्ग उतारने का बनाना है, जिसका प्रतीक है इंद्रधनुष। बादलों का जो फरिश्‍ता है, देवता है वह इस धरती पर हमारे खेत-खलिहानों को बारिश से इस कदर पूर दे कि कोई भूखा ना रहे और इंद्रधनुष को आधी रोटी का रंगीन टुकड़ा ना समझे। हमें इश्‍तर माता का वो हार जमीन पर लाना है जो देवी मां ने सैलाब में तबाह हुई संतानों के दुख में आकाश में उठा लिया। हमें बाढ़ में नहीं बारिश में इंद्रधनुष चाहिएं। मन को हर्षित करने वाली वह बारिश जो किसी का घर नहीं उजाड़े और देवताओं को किसी वचन की तरह अपनी संततियों को बचाने के लिए आसमान में इंद्रधनुष नहीं टांगना पड़े। हमें सिर्फ बारिश में नहीं हर मौसम में इंद्रधनुष चाहिएं। हम एक ऐसे बाग की कल्‍पना करते हैं जहां इस धरती के तमाम बाशिंदें बेखौफ तफरीह करने के लिए आएं और जब बारिश की फुहारें आसमानी अमृत बरसाने लगें तो हर कोई परवीन शाकिर की तरह गाता चले-

चिडि़या पूरी भीग चुकी है
और दरख्‍त भी पत्‍ता पत्‍ता टपक रहा है
घोसला कब का बिखर चुका है
चिडिया फिर भी चहक रही है
अंग अंग से बोल रही है
इस मौसम में भीगते रहना
कितना अच्‍छा लगता है।

और ऐसे मौसम में इंद्रधनुष को देखना भी कितना अच्‍छा लगता है।

(यह आलेख डेली न्‍यूज, जयपुर के रविवारीय परिशिष्‍ट हम लोग की टॉप स्‍टोरी के रूप में 24 जुलाई, 2011 को प्रकाशित हुआ।)
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Thursday, 26 May 2011

सिक्कों की किस्मत

साप्ताहिक पत्रिका ‘शुक्रवार’ में मेरी तीन कविताएं प्रकाशित हुई हैं। आज से ब्लॉग का सिलसिला फिर शुरू करते हैं।

सिक्के तल में पड़े रह जाते हैं
नदियां समंदर तक पहुंच जाती हैं

आस्था नदियों में है कि जल में
मालूम नहीं
पर श्रद्धा में अर्पित किए गए सिक्के
नदी के तल में हैं


आस्था का मूल्य
अगर एक सिक्का है
तो तल में जाने के बाद
आस्था खो देती है अपनी मूल्यवत्ता

निष्प्राण पत्थर
जल प्रवाह में किसी किनारे पहुंचकर
बन जाते हैं
आस्था के शालिग्राम
और सिक्के नदी तल में पड़े रह जाते हैं।

Wednesday, 23 February 2011

ऑस्‍कर वाइल्‍ड की क्लासिक कहानी - बुलबुल और गुलाब

यह कहानी मेरी प्रिय प्रेम कहानियों में से एक है। पिछले दिनों प्रेम दिवस के पूर्व रविवार 13 फरवरी, 2011 को यह राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में प्रकाशित हुई। इस लंबी कहानी को अखबार के लिए कुछ संक्षिप्‍त किया गया है।

"उसने कहा है कि अगर मैं उसके लिए एक लाल गुलाब ले आऊँ तो वह मेरे साथ नृत्य करेगी! लेकिन मेरे बगीचे में तो एक भी लाल गुलाब नहीं है" अपने आप से बात करते हुए वह नौजवान रोने लगा।

बगल के दरख़्त पर घौसले में बैठी बुलबुल ने उसे रोते सुना और पत्तियों की तरफ देख वह आश्चर्यचकित हो उठी । वह रो रहा था और उसकी खूबसूरत आँखों के प्याले आँसुओं के मोतियों से भर गए! "ओह, जिंदगी में कभी-कभी खुशियाँ कितनी छोटी-छोटी चीजों पर टिकी होती हैं ! मेरा सारा ज्ञान और दर्शनशास्त्र का अध्ययन बेकार है। एक अदने से लाल गुलाब की चाहत ने मेरी जिंदगी नरक बना दी है।"

"कम से कम इस दुनिया में एक सच्चा प्रेमी तो है।" बुलबुल चहक उठी, "मैं रातों में जिस अनजान प्रेमी के लिए गाती थी, चांद-तारों को जिसकी कहानी सुनाती थी, वो आज मुझे मिल ही गया। इसके बाल लाल गुलाबी पारदर्शी फूल जैसे हैं, और होंठ जैसे सुर्ख गुलाब, ठीक वैसे ही जैसी उसकी चाहत है। लेकिन चेहरा कुम्हलाया हुआ, कांतिहीन, हाथी दांत जैसा पीला। दुःख और संताप की स्पष्ट छाप इसके माथे पर छपी है।"

नौजवान बुदबुदाया, ‘कल राजकुंवर ने नृत्य की शाम सजाई है। वो भी वहां होगी। काश अगर मैं उसे सुर्ख गुलाब ला दूं तो उसे अपनी बाँहों में भर सकूंगा , और वह मेरे काँधों पर अपना सर टिकाए रात भर मेरे साथ नाचेगी। लेकिन मेरे बगीचे में कोई सुर्ख गुलाब नहीं है, इसलिए मुझे अकेले ही बैठना होगा, और वह बाय कहती हुई मेरे करीब से गुज़र जायेगी।"

"यकीनन यह सच्चा प्रेमी है" , बुलबुल ने कहा। "इसके कष्ट पर मैं क्या गाऊँ ? क्या इसके दर्द में मेरा गाना वाजिब होगा? सच में प्रेम है ही ऐसी निराली चीज! यह मोती-माणिक से भी बड़ा है, ना तो इसे खरीद सकते और ना ही यह हाट-बाज़ारों में मिल सकता है।"

"साजिंदे गलियारे में अपनी जगहें लेते चले जायेंगे", नौजवान ने खुद से कहा, "वे अपने वाद्ययंत्रों के तंतुओं को छेड़ना शुरू करेंगे, और मेरी महबूबा उनकी धुनों पर तल्लीन होकर नाचने लगेगी। वह इस कदर नाचेगी कि उसके पांव जमीन को छुएंगे तक नहीं, और दरबार में मौजूद तमाम लोग अपनी चटकीली वेशभूषाओं में उसके चारों ओर मंडरा रहे होंगे। लेकिन वह मेरे साथ नहीं नाचेगी क्योंकि उसे देने के लिए लाल गुलाब जो नहीं है मेरे पास।" इतना कह कर वह निढाल हो घास पर गिर गया और अपना मायूस चेहरा हाथों में लेकर जार-जार रोने लगा।

हरे गिरगिट, सूर्य किरण के गिर्द मंडराती एक तितली और गुलबहार के फूल तक ने उस नौजवान से पूछा, ‘तुम क्यों रो रहे हो?’
"वह एक लाल गुलाब के लिए रो रहा है।" बुलबुल ने कहा।
"सिर्फ एक लाल गुलाब के लिए !!" सब चिल्लाये ! "कितना बेहूदा है यह रोना।" और नन्हा गिरगिट ठठा कर हँस पड़ा।

लेकिन बुलबुल उसके संताप का रहस्य जान चुकी थी। उसने अपना गीत बंद कर दिया और उस गूढ़ प्रेम के विषय में सोचने लगी। अचानक वह अपने साँवले बादामी परों को फैला कर आसमान में बहुत ऊँचे उड़ चली।

दरख्‍तों के पार एक घास के मैदान के बीचो-बीच एक खूबसूरत गुलाब का पौधा था। बुलबुल ने देखा और उसकी ओर उड़ गयी।

"मुझे एक लाल गुलाब दो" वह गिडगिडायी , "बदले में तुम्हारे लिए मैं अपना सबसे मीठा गीत दूंगी!"

लेकिन पौधे ने अपना सिर हिला दिया ! "मेरा गुलाब तो सफ़ेद हैं" उसने जवाब में कहा; "उतना ही सफ़ेद जितना समंदर का झाग होता है , और यह तो पहाड की चोटियों पर पड़ी बर्फ से भी ज्यादा सफ़ेद है ! लेकिन तुम धूपघड़ी के पास मेरे भाई के यहां जाओ, शायद वहां तुम्हारी चाहत पूरी हो जाए।"

जल्दी से उड़ती हुई बुलबुल उस गुलाब के पास गई और अपनी प्रार्थना दोहराई। गुलाब के इस पौधे ने कहा, ‘मेरे पास तो जलपरियों के बालों जैसे पीले फूल होते हैं। तुम्हें छात्रों की खिड़की के पास वाले मेरे भाई के यहां जाना होगा, शायद वह तुम्हारी मदद करे।’

बुलबुल ने उड़ान भरी और खिड़की के नीचे वाले गुलाब के पौधे के पास जाकर अपनी चाहत बताने लगी। पौधा बोला, ‘मेरे पास मूंगे से भी कई गुना लाल सुर्ख गुलाब हैं, लेकिन ठण्‍ड के मारे मेरी नसें जम गई हैं और पाले ने तो सर्दियों की शुरुआत में ही मेरी सारी कलियां नष्ट कर दी थीं। तूफान से मेरी सारी टहनियां टूट गई हैं। अब पूरे साल मुझ पर कोई फूल नहीं खिलेगा।’

दुखी बुलबुल दर्द से कराहती हुई चीखी, ‘मुझे सिर्फ एक लाल गुलाब चाहिए। क्यां किसी भी तरह से एक लाल गुलाब मिल सकता है?’ पौधे ने जवाब में कहा, ‘एक रास्ता है, लेकिन बहुत खतरनाक है। वो मैं तुम्हें नहीं बता सकता।’ बुलबुल बोली, ‘बताओ, मैं नहीं डरूंगी।’ गुलाब के पौधे ने कहा, ‘सुनो अगर तुम्हें लाल गुलाब चाहिए तो चांदनी रात में तुम्हें अपने संगीत और दिल के खून से मुझे सींचना होगा। रात भर तुम मेरे लिए गाओगी और तुम्हारे कलेजे में मेरा कांटा चुभा रहेगा। तुम्हारा लहू मेरी नसों में बहेगा और मेरा हो जाएगा।’ बुलबुल ने कहा, ‘एक लाल गुलाब के लिए जिंदगी का दांव बहुत बड़ा है।’... दुनिया की तमाम खूबसूरत चीजों की तरह जिंदगी सभी को प्यारी होती है, बावजूद इसके प्यार जिंदगी से बेहतर है, बड़ा है। बुलबुल उड़कर वापस अपने शाहबलूत के दरख्त वाले घोंसले के लिए उड़ चली।

वो नौजवान अभी भी घास पर लेटा हुआ था। बुलबुल बोली, ‘अब खुश हो जाओ, तुम्हें तुम्हांरा लाल गुलाब मिल जाएगा। मैं चांदनी रात में अपने गीत से उसे पैदा करूंगी और अपने कलेजे के लहू से उसे सींचूंगी। मैं यही कहने आई हूं कि तुम्ही सच्चे प्रेमी हो। प्रेम ही ईश्वर है।’

युवक ने देखा और सुना, लेकिन वह कुछ भी नहीं समझ सका। वह तो सिर्फ किताबों में पढ़ी बातें ही जानता था, बुलबुल की बात वह कैसे समझता। लेकिन शाहबलूत का वह बूढ़ा दरख्त़ समझ गया था, जिस पर बुलबुल का आशियाना था। उसने बुलबुल से कहा, ‘मेरी खातिर आखिरी बार गाओ मेरी प्यारी बुलबुल... तुम्हारे जाने के बाद मुझे बहुत अकेलापन महसूस होगा।’ और बूढ़े दरख्त की बातें सुन कर बुलबुल उसके लिए गाने लगी। जैसे ही उसने गाना बंद किया, वो नौजवान उठा और चल दिया। रास्ते में चलते हुए भी वह अपनी महबूबा के बारे में सोचता रहा। इसी सोच में वह अपने कमरे में गया और बिस्त‍र पर लेट गया। सोचते सोचते वह सपनों की मीठी नींद में चला गया।

आकाश में चांद दिखते ही बुलबुल उड़कर गुलाब के पौधे के पास पहुंच गई। बिना वक्त गंवाए उसने गुलाब की टहनी का लंबा सा कांटा अपने सीने में पैबस्त कर लिया और गाने लगी। सबसे पहले उसने युवा प्रेमियों के दिलों में पनपने वाले प्रेम का गीत गाया। पौधे के माथे पर एक खूबसूरत गुलाब खिल उठा। बुलबुल जैसे-जैसे गाती रही, गुलाब की पंखुडि़यां खुलती चली गईं। अभी गुलाब के फूल का रंग कोहरे की मानिंद था, रंगहीन सफेद सरीखा। उधर पौधा बुलबुल से बार-बार कह रहा था, ‘प्यारी बुलबुल, कांटे को अपने दिल में कस कर दबाओ, कहीं ऐसा ना हो कि फूल पूरा होने से पहले ही दिन निकल आए।’ बुलबुल ने पूरी ताकत से कांटे को कस लिया और गाना तेज कर दिया। अब वह दो आत्माओं में पनपने वाले अमर प्रेम के गीत गा रही थी।

फूल पर अब गुलाबी रंग छाने लगा था। हालांकि उसका अंदरूनी हिस्सा अभी भी सफेद ही था। अब तो सिर्फ बुलबुल के दिल का लहू ही उसे सुर्ख रंग दे सकता था। इसलिए पौधे ने फिर बुलबुल से जोर लगाने के लिए कहा। बुलबुल ने अपना पूरा दम लगा दिया और आखिरकार कांटा उसके दिल तक पहुंच गया। बुलबुल को भयानक दर्द हुआ और वह दर्द के मारे जोरों से गाने लगी। अब वह उस प्रेम के गीत गा रही थी जो मृत्यु पर जाकर खत्म होता है। बुलबुल की कोशिशें रंग लाईं और आखिरकार गुलाब पूरी तरह पूरब के आसमान जैसा सुर्ख लाल हो गया। बुलबुल की आवाज धीमी पड़ती जा रही थी। उसके पंख तेजी से फड़फड़ा रहे थे-आंखें बंद होती जा रही थीं। बुलबुल ने अब आखिरी तान छेड़ी। इसे सुनकर चांद बादलों में छिपना भूलकर एक जगह स्थिर हो गया। लाल गुलाब इसे सुनकर खुशी के मारे कांप उठा। उसने अपनी तमाम पंखुडियां खोल दीं। पूरे इलाके में एक चीख गूंज गई, जिसे सुनकर सपने देखते गडरिए जाग उठे।

पौधा मारे खुशी के चिल्लाया, ‘देखो, गुलाब पूरा हो गया, देखो।’ बुलबुल कुछ नहीं बोली। कांटा उसके कलेजे में गहरे धंसा हुआ था और वह घास पर मौत की गहरी नींद सो रही थी।

दोपहर में नौजवान ने खिड़की खोल कर देखा तो वह लगभग चीख ही पड़ा, ‘यह रहा मेरा लाल गुलाब, किस्मत का शानदार करिश्मा। मैंने जिंदगी में आज तक ऐसा खूबसूरत लाल गुलाब नहीं देखा।’ उसने झुक कर फूल तोड़ लिया।

हाथ में गुलाब लिए वह माशूका के घर की तरफ दौड़ चला। वहां दरवाजे पर बैठी महबूबा धागे की रील लपेट रही थी। वह चिल्लाया, ‘तुमने कहा था, अगर मैं लाल गुलाब ले आउं तो तुम मेरे साथ नाचोगी। यह दुनिया का सबसे खूबसूरत लाल गुलाब है। आज की रात तुम इसे छाती से लगाओगी। हमारे नाच के वक्ता गुलाब का यह फूल तुम्हें अहसास कराएगा कि मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूं।’

लेकिन लड़की ने चंचला स्त्री की तरह मुंह बनाते हुए कहा, ‘हुंह.. मुझे लगता है यह मेरे कपड़ों के रंग से मेल नहीं खाता। यूं भी बड़े सरदार के भतीजे ने मेरे लिए असली माणिक और मोतियों के गहने भेजे हैं। और सब जानते हैं कि गहने और माणिक-मोती फूलों से ज्यादा कीमती होते हैं।’

नौजवान क्रोध में चीखा, ‘तुम बेवफा हो।’ कह कर उसने गुलाब का वह फूल गली में फेंक दिया, जहां वह एक नाली में जाकर गिरा। एक घोड़ागाड़ी आई और फूल को कुचलते हुए निकल गई।

लड़की ने कहा, ‘बेवफा?... हुंह... वैसे भी तुम हो क्या? एक स्टूडेंट ही ना? मैं क्यों वफा करूं? तुम्हारे जूतों में तो सरदार के भतीजे की तरह चांदी के बक्कल भी नहीं होंगे।’ कहकर वह उठी और घर के भीतर चली गई।

नौजवान अपने कमरे में लौटते हुए बुदबुदाया, ‘यह इश्क भी क्यां वाहियात चीज है? तर्कशास्त्र के मुकाबले में तो यह आधी भी उपयोगी चीज नहीं है, क्यों कि इससे कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकता। जो चीजें नहीं होने वाली, उन्हीं को तो बताता है यह और क्या? इश्क हमें इस यकीन के लिए मजबूर करता है कि यह सच नहीं है, अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और मेरी उम्र में तो व्यावहारिकता ही सब कुछ है। अब मैं वापस दर्शनशास्त्र की तरफ लौटूंगा और तत्व मीमांसा पढूंगा।

वह कमरे पर लौटा और धूल से अटी हुई एक पुस्तक उठाई और पढ़ने लग गया।





Sunday, 20 February 2011

पहले-पहले प्‍यार की पावन स्‍मृति में

भोर की पहली किरण की तरह आता है जिंदगी में पहला प्रेम और पूरे वजूद को इस तरह जकड़ लेता है जैसे आकाश में परिंदों का एक अंतहीन काफिला हमें उड़ाता लिए चला जा रहा हो। कोई नहीं जानता कि यह कब, क्यों और कैसे होता है, लेकिन जिसके जीवन में पहला प्रेम आता है उसके लिए ही नहीं दुनिया के किसी भी कवि-साहित्यकार के लिए इसे शब्दों में बांधना और उसका वर्णन करना बेहद मुश्किल होता है। बावजूद इसके अनेक रचनाकारों ने अपने प्रथम प्रेम को कविता, कहानी और उपन्यासों में बहुत सुंदर ढंग से बयान किया है। पहले प्यार को लेकर दुनिया की तमाम भाषाओं में लिखा भी गया है और हजारों की तादाद में फिल्में भी बनी हैं और आज भी ये पहले जितनी ही लोकप्रिय हैं। लेकिन हेलन केलर की यह बात अपनी जगह आज भी कायम है कि पहले प्रेम जैसी दुनिया की सबसे खूबसूरत चीजों को देख-सुन कर नहीं, दिल की अतल गहराइयों से ही महसूस किया जा सकता है। आस्थावान लोग इसे खुदा की सबसे अनूठी ईजाद कहते हैं और इसीलिए दुनिया के महानतम सूफी कवियों ने खुदा को ही अपने महबूब के रूप में मानकर अपनी शायरी में उसके रूप-सौंदर्य और महत्व को सिरजा है। जैसे बुल्ले शाह ने कहा है ‘अरे लोगों तुम्हारा क्या्, मैं जानूं मेरा खुदा जाने।’ पहला प्यार उस जादू का नाम है, जिसे बहुत-से लोग पता नहीं क्यों जीवन में महसूस करने से वंचित रह जाते हैं। इस जादू की माया ऐसी है कि जब यह पैदा होता है तो दिल, दिमाग और समूची चेतना यह मानने को तैयार नहीं होते कि एक दिन इसका अंत भी आएगा। प्रथम प्रेम के बारे में महान उपन्यासकार ऑस्कर वाइल्‍ड ने एक अद्भुत और सटीक बात कही है कि पुरुष हमेशा किसी स्त्री का पहला प्यार बनने के सपने देखता है और स्त्रियां पहले प्रेम को अंतिम मानकर चलती हैं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि स्त्रियों के लिए पहला प्रेम ही अंतिम होता है, इसमें उनको खुशी मिलती है वो अनिर्वचनीय होती है और पहले प्रेम के साथ ही प्रेम में उनकी खुशियां समाप्त हो जाती हैं। इसके बाद वाले सारे प्रेम स्त्रियों के लिए एक हद तक निरर्थक होते हैं।

जिंदगी में कुछ चीजें कभी लौटकर वापस नहीं आतीं, जैसे किशोरावस्था या जवानी में कदम रखते ही पहले प्रेम का अनुभव। उसकी स्मृति बार-बार पलट कर आती है और एक मीठे-से दर्द की लहर हमारे वजूद को हिलाकर रख देती है। नब्बे फीसदी से अधिक मामलों में पहला प्रेम नाकाम होता है और यह नाकामयाबी जिंदगी के मायने बदलकर रख देती है। तभी जाकर समझ में आता है कि क्यों फैज अहमद फैज ने लिखा था, ‘हैं और भी गम जमाने में मुहब्बत के सिवा।’ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने इसीलिए पहले प्रेम के लिए कहा है कि ‘पहला प्यांर एक ऐसी मूर्खता है जिसमें जिज्ञासाओं का एक अनंत सिलसिला होता है और कोई भी सच्चीम स्वाभिमानी स्त्री इस चक्कर में नहीं पड़ती।’ जिंदगी की राह में आगे चलने पर वो सारी मूर्खताएं याद आती हैं, जिसमें एक नजर दीदार के लिए बेकरारी बेपनाह होती है, किसी ना किसी बहाने से प्रिय को खुश रखने के जतन पर जतन किए जाते हैं, भूख-प्यास, दिन रात किसी का खयाल नहीं रहता और जमाने भर को अपनी प्यारी-सी बेवकूफियों के लिए भुला दिया जाता है। कितना पछतावा होता है, जब उन अजीब हरकतों को जिंदगी के कठोर अनुभवों के बाद याद करते हुए खुद पर हंसी भी आती है और रोना भी।

असल में पहला प्यार एक खास उम्र में शारीरिक बदलावों के कारण विपरीत यौनाकर्षण से पैदा होता है। कहने में यह जितना आसान है, दरअसल है नहीं, क्योंकि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन तक ने कहा है, ‘नहीं नहीं, यह तरीका नहीं चलेगा... पृथ्वी पर पहले प्यार जैसे जैवविज्ञानी पहलू को रसायन और भौतिकशास्त्र की शब्दांवली में तुम क्यों समझाने जा रहे हो।’ चलिए हम नहीं मानते कि इसे विज्ञान से सिद्ध किया जाए, लेकिन पहले प्रेम के कारण बहुत सी ऐसी चीजें जिंदगी में घटती हैं, जिनका इलाज आगे चलकर मनोविज्ञान को करना पड़ता है, क्योंकि पहले प्रेम की अतिशय स्मृति युवा दिलो-दिमाग को बहुत व्यथित करती है और वो इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं होता कि इसका अवसान होगा। इसीलिए सर्बियाई लेखक ब्रेनिस्लाव न्यूजिक कहते हैं कि पहला प्यार तभी खतरनाक होता है जब वो आखिरी भी हो जाए।

बहरहाल इस दुनिया में बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिनके जीवन में पहला प्रेम विवाह के बाद ही पैदा होता है और भारतीय समाज में तो यह एक बहुत बड़ा सच है। हमारे यहां तो कम उम्र में शादी का रिवाज आज भी जारी है। इस रिवाज की बदौलत ही शायद हमारे यहां विवाह जैसी संस्था इतनी कामयाब है, क्योंकि जिस उम्र में यौनाकर्षण जागृत होता है, उसी समय मां-बाप शादियां तय कर देते हैं और इस वजह से संभवत: पहले प्रेम का स्वाभाविक आकर्षण भावी जीवन साथी के प्रति पनप जाता है और यही विवाह के बाद दांपत्य् को मजबूती देता है। पहले प्रेम और भावी पति-पत्नी के लिए हमारे लोक जीवन में बहुत से लोकगीत, कहावतें और खेल बने हुए हैं। मुझे याद आता है कि बचपन में जब सावन के झूले लगते थे तो भाभियां अपनी नणदों से उनके भावी पति का नाम लेने के लिए खूब चुहल किया करती थीं और जब तक नाम नहीं बता दिया जाता था, तब तक झोटे देते हुए संटियां मारी जाती थी। नणदें भी भाभियों से अपने भैय्या का नाम पूछती थीं और इस तरह खूब मजे लिए जाते थे। अब वो पुराने रीति रिवाज खत्म होने के बाद परिदृश्य बदल गया है और प्राय: प्रथम प्रेम अब स्कूल और कॉलेज या घर, परिवार और रिश्तेदारियों में पनपने लगा है। बहरहाल हमारे लोक मानस में पहले प्रेम की अनेकों लोक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें ढोला-मरवण, जेठवा-ऊजळी, मूमल-महेंद्र, हीर-रांझा, सोहणी-महिवाल, ससी-पुन्‍नू, जसमा ओड़न आदि प्रमुख हैं।

पहले प्रेम की शुरुआत आजकल टेलीविजन, सिनेमा, क्रिकेट आदि लोकप्रिय माध्यमों के सितारों के जरिये होती है। एक जमाना था, जब हिंदी सिनेमा के नायक-नायिका ही हिंदी क्षेत्र में पहले प्रेम के पात्र हुआ करते थे। लड़कियां राजेश खन्ना के पोस्टरों से गंधर्व विवाह कर लिया करती थीं और नौजवान हेमा मालिनी, रेखा और मधुबाला आदि की तस्वी‍रें तकिए के नीचे दबाकर उनके सपनों में जीते थे। आजकल ज्यादातर किशोर और युवा अपना पहला प्रेम इन सेलिब्रिटी सितारों से करते हैं, लेकिन वास्तखविक पहला प्रेम दूसरी जगहों पर संभव होता है। पहला प्रेम प्राय: चेहरे की खूबसूरती, बातचीत, रहन-सहन के स्तर और अतिरिक्त प्रतिभा या मेधा के कारण पैदा होने वाले आकर्षण से पनपता है। वस्तुत: पहला प्रेम किसी भी इंसान के जीवन की पहली सबसे बड़ी परिघटना है, क्योंकि यह व्यक्ति को एक ऐसा अलौकिक और अवर्णनीय अहसास देकर जाता है, जिससे उसके बचपन और कैशोर्य का लगभग समापन होता है और अजीब उमंग व उत्साह से जीवन भरा-भरा लगने लगता है। आंखें बोलने लगती हैं और देह का अंग-अंग कुछ कहने लगता है, प्रकृति के सारे रंग एक नया अर्थ लेकर सामने आते हैं। मन काव्यमय हो जाता है और कुछ ना कुछ गुनगुनाने लगता है। चांद, सितारे, पेड़-पौधे, परिंदे, सुबह-शाम, दिन-रात सब कुछ इशारे करते नजर आते हैं और इंसान हरेक में अपने प्रिय को खोजने लगता है। जैसा कि कवयित्री एलिजाबेथ कहती हैं, ‘जब आप किसी से प्रेम करने लगते हैं तो आपकी तमाम इच्छाएं और हसरतें उसके लिए बाहर आने लगती हैं, आप सारी दुआओं में अपने प्रिय को याद करते हैं।’ बाकी दुनिया की नजरों में भले ही आपका प्रिय प्रेमपात्र अत्यंत साधारण और तुच्छ क्यों ना हो, आपके लिए संसार में उससे सुंदर कोई नहीं होता, क्यों कि आपका प्रेम ही उसे सौंदर्य देता है। इसीलिए किसी कवि ने कहा है कि आप उस स्त्री से इसलिए प्रेम नहीं करते हैं कि वह बेहद सुंदर है, बल्कि वह इसलिए खूबसूरत है कि आप उससे प्रेम करते हैं।

पहला प्रेम एक प्रकार से व्यक्ति को पूरी तरह बदल देता है। कुछ बदलाव सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक भी होते हैं। जीवन में पहली बार परिवार से इतर किसी के प्रति आकर्षण व्यंक्ति को समाज के प्रति प्रेमिल बनाता है और प्रेम के रूप में एक ऐसा उपहार मिलता है, जिससे उसके भाव जगत में संवेदनाओं को विस्फोट होता है। कायनात की बहुत-सी चीजों को लेकर भावनात्मक रिश्ता विकसित होता है, जो आगे चलकर कई किस्म की कलात्मंक अभिरूचियों में तब्दील होता है और व्यक्ति को संवेदनशील कलाकार जैसे संस्कार मिलते हैं। पहले प्रेम की सबसे खराब बात यह होती है कि यह अत्यंत क्षणिक आवेग की तरह आता है और इसमें मूर्खता और मासूमियत का इस कदर घालमेल होता है कि कम उम्र में यह चिड़चिड़ा बना देता है और एक अजीब-सी दीवानगी पैदा कर देता है, जो परिवार के लिए चिंताजनक हो जाता है। इसीलिए नीत्शे की बात सही लगती है कि प्रेम में हमेशा कुछ हद तक पागलपन होता है, लेकिन दूसरी तरफ देखें तो हर पागलपन के भी कुछ कारण होते हैं। इस पागलपन ने हमें उच्च कोटि के कलाकार और रचनाकार दिए हैं। बहुत-से लेखकों का कहना है कि उन्होंने आरंभ में अपने प्रिय प्रेमपात्र को प्रभावित करने के लिए ही लिखना शुरु किया था।

पहले प्यार और पहले आकर्षण के बारे में चाहे कुछ भी कहा जाए, यह मनुष्य जीवन का सबसे अनमोल उपहार है, जो जिसको नसीब होता है, वो भी रोता है और जिसे नहीं मिलता वह भी। जिंदगी के किसी ना किसी मोड़ पर प्रथम प्रेम की स्नेहिल और मासूम स्मृति हमेशा एक नया अहसास देकर जाती है और यूं लगता है जैसे खुश्बुओं का एक जबर्दस्त‍ झोंका दिलो-दिमाग को तरोताजा कर गया हो। अपनी ही एक कविता याद आती है:

पहला चुंबन और पहला आलिंगन
कभी नहीं भूलता कोई
भूलने के लिए और भी बहुत-सी चीजें हैं
मसलन बहुत सारे सुख
जो हमने साथ-साथ भोगे
उन दु:खों को नहीं भूलना प्रिय
जो हमने साथ-साथ काटे।

यह आलेख डेली न्‍यूज़, जयपुर के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' की आवरण कथा के रूप में 13 फरवरी, 2011 को प्रकाशित हुआ।