Sunday, 26 September 2010

दादी की खोज में

(आज बेटियों का दिन है यानी डॉटर्स डे, आज के दिन बेटियों को समर्पित है यह कविता। यह कविता मुझे बहुत प्रिय है, इसलिए इसे मैंने अपने संग्रह में सबसे पहली कविता के रूप में शामिल किया था। जब बरसों पहले यह कविता लिखी थी, तो लिखने के बाद कई दिनों तक बहुत रोया था और आज भी यह कविता मुझे रुला देती है।)

उस गुवाड़़ी में यूँ अचानक बिना सूचना दिये मेरा चले जाना
घर-भर की अफ़रा-तफ़री का बायस बना
नंग-धड़ंग बच्चों को लिये दो स्त्रियाँ झोंपड़ों में चली गईं
एक बूढ़ी स्त्री जो दूर के रिश्ते में
मेरी दादी की बहन थी
मुझे ग़ौर से देखने लगी
अपने जीवन का सारा अनुभव लगा कर उसने
बिना बताए ही पहचान लिया मुझे

‘तू गंगा को पोतो आ बेटा आ’

मेरे चरण-स्पर्श से आल्हादित हो उसने
अपने पीढे़ पर मेरे लिए जगह बनायी
बहुओं को मेरी शिनाख़्त की घोषणा की
और पूछने लगी मुझसे घर-भर के समाचार

थोड़ी देर में आयी एक स्त्री
पीतल के बड़े-से गिलास में मेरे लिए पानी लिये
मैं पानी पीता हुआ देखता रहा
उसके दूसरे हाथ में गुळी के लोटे को
एक पुरानी सभ्यता की तरह

थोड़ी देर बाद दूसरी स्त्री
टूटी डण्डी के कपों में चाय लिए आयी
उसके साथ आये
चार-बच्चे चड्डियाँ पहने
उनके पीछे एक लड़की और लड़का
स्कूल-यूनिफॉर्म में
कदाचित यह उनकी सर्वश्रेष्ठ पोशाक थी

मैं अपनी दादी की दूर के रिश्ते की बहन से मिला

मैंने तो क्या मेरे पिताजी ने भी
ठीक से नहीं देखी मेरी दादी
कहते हैं पिताजी
‘माँ सिर्फ़ सपने में ही दिखायी देती हैं वह भी कभी-कभी’

उस गुवाड़ी से निकलकर मैं जब बाहर आया
तो उस बूढ़ी स्त्री के चेहरे में
अपनी दादी को खोजते-खोजते
अपनी बेटी तक चला आया

जिन्होंने नहीं देखी हैं दादियाँ
उनके घर चली आती हैं दादियाँ
बेटियों की शक्ल में।

Sunday, 12 September 2010

भारतीय शासकीय मानसिकता और भाषा का सवाल

सितंबर का महीना मेरे लिए दो कारणों से महत्‍वपूर्ण है, जिसमें पहला कारण है इसे हिंदी माह के रूप में मनाना। कॉलेज की पढ़ाई तक कभी हिंदी माह के बारे में नहीं सुना था, क्‍योंकि एक तो मैं कॉमर्स का विद्यार्थी रहा और दूसरी तरफ साहित्‍य पढ़ने में ज्‍यादा मजा आता था, लिखना कम होता था और ऐसी कोई संगत नहीं थी जिसमें हिंदी माह के बारे में बातचीत या चर्चा हो। बैंक में नौकरी लगने के बाद इसकी जानकारी मिली। पूरे महीने ही नगर भर में हिंदी प्रतियोगिताओं की धूम मची रहती थी और हर जगह मुझे ही भेज दिया जाता था। पॉकेटबुक उपन्‍यासों से पीछा छूटने के बाद मैं कभी विमुख नहीं हुआ और ईमानदारी से कहता हूं कि शिवानी तक को मैं कभी नहीं पढ़ पाया। इसलिए गंभीर साहित्‍य की ओर ही मेरा झुकाव बना रहा। शुरुआत में इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने का जो किंचित उत्‍साह था वह निर्णायकों ने धूमिल कर दिया। दरअसल निर्णायकों के नाम पर हिंदी के खराब अध्‍यापक या छिटपुट मंचीय किस्‍म के कवि और विभागों के हिंदी अधिकारी आते थे, जिनकी साहित्‍य की समझ पर मुझे बाद में शक होने लगा था। मैं जबर्दस्‍ती भेजा जाता था, लेकिन जब कविमित्र ही निर्णायक के रूप में आने लगे तो मैंने प्रतियोगिताओं में भाग लेना बंद कर दिया। बहरहाल, उस दौर में मैं सोचता था कि जिस भाषा के हम लोग हैं, वे अगर कुछ करें तो लोगों को हिंदी में काम करने की ओर प्रवृत किया जा सकता है। इस बारे में कुछ समय तो मैंने बड़े उत्‍साह से काम किया, लेकिन जब देखा कि लोगों की रूचि ही नहीं है तो यह भी छोड़ दिया।

लेकिन मुझे लगता है कि बैंक हो या अन्‍य कोई संस्‍थान, लगभग सब जगह यही स्थिति है। और इसके पीछे लोगों की मानसिकता से कहीं अधिक व्‍यवस्‍था की मूलभूत खामियां हैं। दरअसल, हमने जो व्‍यवस्‍था का तंत्र अंग्रेजों से विरासत में पाया है, वह बना ही अंग्रेजी मानसिकता और संस्‍कृति से है, जिसमें हिंदी और भारतीय भाषाएं कहीं फिट नहीं होतीं। भाषा के साथ उसकी संस्‍कृति और परंपराएं जुड़ी होती हैं, और वे अविच्छिन्‍न होती हैं। भाषा और संस्‍कृति मनुष्‍य की मानसिकता का निर्माण करती हैं। हम लोग घरों में अपने माता-पिता से अगर अपनी आंचलिक बोली-बानी में बात करते हैं तो वह हमारी सांस्‍कृतिक परंपरा है। हमारे माता-पिता को भले ही हिंदी या अंग्रेजी आती हो, हम उनसे बात अपनी प्रिय बोली में ही करते हैं, क्‍योंकि उसकी जो अपनी मिठास है वह दूसरी भाषा में नहीं। (रामचंद्र गुहा ने इसे द्विभाषी मानसिकता कहा है। कुछ महीनों पहले ई.पी.डब्‍लू. में उनका भाषाचिंतन पर शानदार लेख पढ़ा था, उसे हर लेखक को पढना चाहिए।) खैर, आजादी के बाद जो व्‍यवस्‍था चली आ रही है, उसमें ले देकर अंग्रेजियत वाली श्रेष्‍ठताबोध की मानसिकता ही हावी है। यह मानसिकता हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं और बोलियों को ही नहीं उपेक्षित समुदायों और स्त्रियों को भी प्रताडि़त करती है और उन्‍हें उनका वाजिब हक मिलने देने से रोकती है। इसे भारतीय शासकीय मानसिकता कहा जा सकता है।

इस मानसिकता का निर्माण आजादी के बाद नहीं बहुत पहले हो चुका था, जब देवभाषा संस्‍कृत को श्रेष्‍ठ माना जाता था। संस्‍कृत का पठन-पाठन एक खास जाति तक यानी स्‍वयं तक सीमित कर ब्राह्मणों ने जिस व्‍यवस्‍था को अपने बुद्धि-चातुर्य से स्‍थापित किया, उसने बाकी पूरे समाज को श्रेष्‍ठ भाषा से दूर रखा, कामगार-दस्‍तकार और दूसरी जातियों के साथ स्त्रियों को भी अपनी देवभाषा से बाहर रखा और उल्‍लंघन होने पर कानों में पिघलता शीशा डालने जैसी दण्‍ड व्‍यवस्‍था भी बनाई। अपने ईश्‍वरवादी कर्मकाण्‍डों के जरिए ब्राह्मणों ने पूरी शासन व्‍यवस्‍था को अपने चंगुल में जकड़ रखा था और क्षत्रिय-वैश्‍य जैसे कुछ समुदायों को कामगार-दस्‍तकार जातियों से बड़ा सिद्ध कर एक विषमतावादी समाज की रचना कर रखी थी। कर्मप्रधान समुदायों को अपने कामकाज से ही फुर्सत नहीं थी कि वे शासन व्‍यवस्‍था के दूसरे पहलुओं पर भी सोच सकें। इस तरह एक ऐसी शासकीय मानसिकता का निर्माण हुआ, जिसमें कुछ श्रेष्‍ठ जातियां सब पर हावी थीं और सारे अधिकार उन्‍हीं के पास थे। इसलिए जब अंग्रेज आए तो उनकी जी-हुजूरी में इसी शासकीय मानसिकता से ग्रस्‍त जातियों के लोग ही पहले गए और सारे ओहदे-मनसब अंग्रेजों की चाकरी में ले लिए। कामगार जातियों को तो शासकीय मानसिकता वालों ने लालच देकर मॉरीशस, सूरीनाम और ब्रिटिश गुयाना जैसे निर्जन द्वीपों पर जहाजों में लदवा कर भिजवा दिया था।

आजादी के बाद शासकीय मानसिकता वाली श्रेष्‍ठ जातियों के लोग ही प्रभावकारी स्थिति में थे। उन्‍होंने सबसे पहले हिंदी और भारतीय भाषाओं के मुकाबले में अंग्रेजी को सर्वोच्‍च स्‍थान देकर एक तरफ तो अपनी ब्रिटिश राजभक्ति को सिद्ध किया, दूसरी तरफ हिंदी और अन्‍य भाषाओं के प्रति अपनी हिकारत को सार्वजनिक कर सिद्ध किया कि वे ब्राह्मणों द्वारा पोषित व्‍यवस्‍था को ही आगे ले जाएंगे, जिसमें शासन की भाषा या तो अंग्रेजी रहेगी, अन्‍यथा दूसरी किसी भी भाषा को ऐसा बना दिया जाएगा कि वह आम आदमी से दूर रहे और शासन में आम आदमी के बजाय शासकीय मानसिकता वाले श्रेष्ठिवर्ग का ही बोलबाला रहे। इसलिए हिंदी को राजभाषा बनाने के साथ ही यह षड़यंत्र रचा जाने लगा था कि इसे जनविमुख सरकारी भाषा कैसे बनाया जाए। आजमाया हुआ प्राचीन नुस्‍खा देवभाषा संस्‍कृत के रूप में था ही। इसलिए पहले तो जानबूझकर हिंदी से हिंदुस्‍तानी और तत्‍सम शब्‍दों को अस्‍पृश्‍य और त्‍याज्‍य कह कर वैसे ही निकाला गया, जैसे संस्‍कृत से कामगार-दस्‍तकार जातियों और स्त्रियों को वंचित किया गया था। शब्‍दकोश और शब्‍दावली बनाने का जिम्‍मा भी शासकीय मानसिकता वाले श्रेष्ठिवर्ग के पास था, इसलिए उन्‍होंने देवभाषा से ऐसे-ऐसे शब्‍दों की सर्जना की कि आम आदमी उस हिंदी से भी दूर भाग जाए और उसके लिए यह हिंदी भी अंग्रेजी की तरह ही अत्‍यंत जटिल और दुर्बोध हो जाए, जो उसकी अपनी भाषा नहीं है। बोलचाल की हिंदी को अपदस्‍थ कर किताबी किस्‍म की हिंदी विकसित करने का श्रेय उसी समुदाय को दिया जा सकता है जो अंग्रेजी और अंग्रेजों की चाटुकारिता में कई पीढि़यों तक लगा रहा।

हमारी व्‍यवस्‍था में चूंकि अंग्रेजियत हावी रही इसलिए वहां हिंदी या भारतीय भाषाएं पूरी तरह स्‍थापित नहीं हो पातीं। जब तक समूची कार्यप्रणाली और कार्यसंस्‍कृति को भारतीयों के अनुकूल नहीं बनाया जाता, तब तक भारतीय भाषाएं व्‍यवस्‍था में आवेदन पत्रों तक ही सीमित रहेगी। इसलिए पूरी व्‍यवस्‍था इसी में लगी रहती है कि राजकाज में हिंदी का यथासंभव प्रयोग हो। हमारी व्‍यवस्‍था के तमाम दस्‍तावेज अंग्रेजों द्वारा बनाए गए हैं और उनका घटिया अनुवाद हिंदी और दूसरी भाषाओं में देखने को मिलता है। मौलिकता हमारी व्‍यवस्‍था में दुर्गुण माना जाता है, हर जगह अंग्रेजी में लिखे को ही प्रामाणिक माना जाता है। यही भारतीय शासकीय मानसिकता है, जिसका जातिगत श्रेष्‍ठता से गहरा संबंध उजागर हो चुका है।

सितंबर का मेरे लिए एक और तरीके से महत्‍व है और उसका संबंध भारतीय स्‍वाधीनता संग्राम की एक ऐसी घटना से है जो मुझे कहीं ना कहीं भाषा के सवाल को जाति से जोड़कर देखने के लिए विवश करती है, क्‍योंकि उस घटना में भी शासकीय मानसिकता के दर्शन होते हैं। यह घटना है सितंबर, 1932 में पूना पैक्‍ट की। जब ब्रिटिश सरकार पूरी तरह तय कर चुकी थी कि 'कम्‍यूनल अवार्ड' के तहत अस्‍पृश्‍य जातियों को अल्‍पसंख्‍यकों और अन्‍य समुदायों की तरह अलग से संविधान में पृथक निर्वाचन की व्‍यवस्‍था की जाएगी तब महात्‍मा गांधी ने इसे भारत की एकता को खंडित करने वाला कदम बता कर यरवदा जेल में 20 सितंबर, 1932 को आमरण अनशन शुरु कर दिया था। गांधी जी की तबियत इस अनशन से बहुत तेजी से खराब होने लगी थी। डॉ. अंबेडकर जानते थे कि अगर इस अनशन से गांधी जी की मृत्‍यु हो जाती है तो देश भर के सवर्ण अछूतों का नरसंहार कर देंगे। इसलिए बेहद मानसिक दबाव और तनाव में डॉ. अंबेडकर ने गांधी जी के साथ 24 सितंबर, 1932 को यरवदा जेल में पूना पैक्‍ट किया था। इस समझौते के तहत पृथक निर्वाचन के बजाय दलितों के लिए अलग से सीटें आरक्षित करने और नौकरियों में भी आरक्षण का प्रावधान था। इस पैक्‍ट को लेकर बहुत विवाद हैं, दलितों के एक तबके का मानना है कि डॉ. अंबेडकर को गांधी जी के आगे नहीं झुकना चाहिए था। लेकिन भारतीय समाज के इतिहास में यह बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना है जो दर्शाती है कि बहुसंख्‍यक समाज को हर दौर में अपने ही हितों की कुर्बानी देनी पड़ती है फिर वो चाहे देश का मामला हो या भाषा का। कल्‍पना कीजिए कि अगर दलितों के आत्‍म निर्णय और पृथक निर्वाचन को कानूनी दर्जा मिल जाता तो क्‍या होता। एक और विभाजित भारत बनता, जिसमें दलितों की अपनी सत्‍ता होती और यह देश विभाजित सोवियत संघ के छोटे-छोटे देशों की तरह होता। लेकिन, भारतीय शासकीय मानसिकता कभी नहीं चाहती कि कोई उनकी बराबरी करे। इसीलिए गांधीजी चाहते थे कि हरिजन सबके साथ रहें, उसके लिए आरक्षण दिया जा सकता है, लेकिन विशेष दरजा नहीं। हिंदी और भारतीय भाषाओं को भी राजकाज में आरक्षण तो दे सकते हैं पूरी सत्‍ता नहीं दी जा सकती। भाषा के साथ भारतीय शासक मानसिकता का यही जातिवादी व्‍यवहार है। वह हिंदी को भी संस्‍कृतनिष्‍ठ बना देगा, लेकिन वंचितों की भाषा से हिंदी को अशुद्ध होने से बचाता रहेगा, बल्कि लगातार कोशिश करेगा कि हिंदी को संस्‍कृत कैसे बनाया जाए। इसके लिए अंग्रेजी से निसंकोच शब्‍द ले लेगा, लेकिन कामगारों और दस्‍तकारों की बोली-बानी को हिंदी के पवित्र सरकारी आंगन में नहीं आने देगा। जिन कामगारों को शासकीय मानसिकता वालों ने गिरमिटिया मजदूर बनाकर देश निकाला दे दिया था, उनकी हिंदी भी हिंदी है, लेकिन उसमें हिंदी की बोली-बानियों की मिठास अब भी बची हुई है, जबकि हमारी हिंदी से हमने कुजात बोलियों के शब्‍द वैसे ही बाहर निकाल दिए हैं जैसे सदियों से अछूतों को गांव के बाहर बसाते आए हैं।



















Sunday, 5 September 2010

कोंकणी को गरिमा देने वाले केलकर

किसी भाषा में शायद ही रवींद्रबाब जैसे रचनाकार मिलते हैं, जो जिंदगी भर अपनी माटी की, अपनी जनता की और अपनी भाषा की सेवा करते रहें और उन्हें जनता का उतना ही प्यार और सम्मान मिले। आज यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि एक अकेला रचनाकार विशुद्ध गांधीवादी औजारों से एक तरफ तो उपनिवेशवादी सरकार से लोहा ले और दूसरी तरफ अपने ही देश में अपनी भाषा और प्रांतीय अस्मिता के लिए जीवन भर संघर्ष करता हुआ अपने जीवनकाल में विजय भी प्राप्त करे। लेकिन रवींद्रबाब ऐसे ही संघर्षशील और जुझारू कलम के योद्धा थे। गोवा और कोंकणी के इस महान सपूत ने अभी हाल ही में 85 वर्ष की आयु में 27 अगस्त, 2010 को अंतिम सांस ली। 25 मार्च, 1925 को दक्षिणी गोवा में प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. राजाराम केलकर के यहां उनका जन्म हुआ। राजाराम केलकर ने 'भगवद्गीता' का पुर्तगाली भाषा में पहला अनुवाद किया था। नाना लिंगुबाब दलवी ने कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर नाम रखा रवींद्र। उन दिनों गोवा पर पुर्तगाल का शासन था और पूरा गोवा मुक्ति के लिए छटपटा रहा था। पणजी में आरंभिक शिक्षा के दौरान ही 21 बरस की उम्र में रवींद्र केलकर गोवा मुक्ति संग्राम से जुड़ गए थे। कॉलेज में शिक्षाविद, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मण राव सरदेसाई ने उनके भीतर देशभक्ति और जनसेवा के पौधे को पल्लवित किया। उन्हीं दिनों स्वाधीनता सेनानी दोस्तों ने एक सरकारी स्कूल को जला डाला था और इसमें रवींद्र के पकड़े जाने की पूरी उम्मीद थी, इसलिए वो पुर्तगाली सरकार की निगाह से बचने के लिए भागकर मुंबई आ गए। यहां वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं और गांधीजी के संपर्क में आए। राम मनोहर लोहिया से उनकी पहली मुलाकात यहीं हुई और लोहिया से रवींद्र ने सीखा कि जनता को जगाने के लिए अपनी मातृभाषा को माध्यम बनाकर कैसे लड़ा जा सकता है। गांधीजी के दर्शन से प्रभावित होकर वे मुंबई से काका साहेब कालेलकर के साथ वर्धा चल दिए। यहां सेवाग्राम में रहते हुए युवा रवींद्र ने काका साहेब से बहुत कुछ सीखा। काका साहेब को वे मोबाइल यूनिवर्सिटी कहते थे, जाहिर है ऐसे महान व्यक्तित्व के सान्निध्य में रवींद्र के व्यक्तित्व में बहुत कुछ जुड़ना था। अध्ययन, मनन और जनसेवा के साथ एक पत्रिका का संपादन करते हुए रवींद्र केलकर ने छह साल वर्धा में गुजारे और 1949 में गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्‍ली में लाइब्रेरियन के रूप में काम करने लगे। देश आजाद हो चुका था, लेकिन गोवा पर अभी भी पुर्तगाली आधिपत्य था। रवींद्र केलकर ने एक साल में ही दिल्ली की नौकरी छोड़ दी, उन्हें गोवा का मुक्ति संग्राम पुकार रहा था।

गोवा पहुंचकर उन्होंने गांधीवादी अहिंसक रास्ते से गोवा की मुक्ति के लिए संघर्ष आरंभ किया। उन्होंने जन जागरण के लिए कलम को हथियार बना लिया और हिंदी, मराठी और कोंकणी में लेख लिखकर लोगों को गोवा की आजादी के लिए जगाने लगे। मुंबई से उन्होंने ‘गोमांतभारती’ साप्ताहिक पत्रिका निकाली, जो रोमन लिपि में कोंकणी में प्रकाशित होती थी। 1961 में जब भारतीय सेना ने गोवा को आजाद करा लिया तो रवींद्र केलकर का संघर्ष दूसरे रूप में आरंभ हुआ। कोंकणी भाषा और सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने के लिए गोवा को महाराष्ट्र से अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए। कोंकणी को मराठी की आंचलिक भाषा या बोली मानने का तर्क उन्हें स्वीकार नहीं था और इसी आधार पर वे गोवा को अलग राज्य का दर्जा दिलाना चाहते थे। उनके आंदोलन का ही परिणाम था कि भारत सरकार ने गोवा को महाराष्ट्र में शामिल करने के बजाय केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया। अब रवींद्र केलकर के लिए एक नया आंदोलन तैयार खड़ा था, कोंकणी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का और गोवा को पूर्ण राज्य बनाने का। कोंकणी भाषा के लिए उनका संघर्ष और योगदान अप्रतिम है। 1962 में प्रकाशित उनकी ‘आमची भास कोंकणिच’ अद्भुत पुस्तक है, जिसमें राह चलते लोगों से संवाद के माध्यम से वे कोंकणी भाषा की अस्मिता के लिए आह्वान करते हैं। ‘शालेंत कोंकणी कित्याक’ में उन्होंने कोंकणी का पूरा स्कूली पाठ्यक्रम बना दिया। ‘कोंकणी साहित्य की ग्रंथसूची’ को कोंकणी, हिंदी और कन्नड़ में प्रस्‍तुत कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि कोंकणी का महत्व अब हर हाल में स्वीकारा जाना चाहिए। उनकी संघर्षशीलता को गोवा के लोगों ने अपूर्व सम्मान दिया और स्नेह से उन्हें सब रवींद्रबाब पुकारने लगे। 1975 में साहित्य अकादमी ने कोंकणी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दी तो कोंकणी के आत्मसम्मान को राष्ट्रीय तौर पर स्वीकारा गया। दो साल बाद उनके यात्रा संस्मरणों की पुस्तक ‘हिमालयांत’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। 1987 में जब गोवा को पृथक राज्य घोषित किया गया तो राज्य विधानसभा ने कोंकणी को राज्य की अधिकारिक भाषा स्वीकार किया। 1990 में रवींद्रबाब को दूसरी बार साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, इस बार गुजराती निबंधकार झवेरचंद मेघानी की पुस्तक का कोंकणी में अनुवाद करने के लिए। केलकर का संघर्ष 1992 में फलीभूत हुआ जब कोंकणी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।

कोंकणी, हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में रवींद्र केलकर की तीन दर्जन से अधिक पुस्‍तकें प्रकाशित हुई हैं। महात्मा बुद्ध, काका साहेब कालेलकर और महात्मा गांधी की जीवनियां तो बहुत ही दिलचस्प और पठनीय हैं। लेकिन कोंकणी में उन्होंने दो खण्डों में ‘महाभारत’ का जो अनुवाद किया है वो अद्भुत है। एक तटस्थ वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने महाभारत के चमत्कारिक प्रसंगों से इतर महाभारत की जो ‘अनुरचना’ की है, उसके सामने शायद नरेंद्र कोहली की ‘महासमर’ कुछ भी नहीं है। 2007 में उन्हें जीवनपर्यंत साहित्य सेवा के लिए साहित्य अकादमी फेलोशिप प्रदान की गई। 2006 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार घोषित किया गया, जो उनकी अस्वस्थता के कारण उन्हें 2010 में दिया जा सका। इस अवसर पर उन्होंने अपने भाषण में बहुत सी महत्वपूर्ण बातें कही थीं, जिनमें से एक बात बहुत ध्यान देने की है। उन्होंने कहा था, ‘लोगों ने आजकल क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है। और दूसरी तरफ अंग्रेजी के माध्यम से हमने बोन्साई बुद्धिजीवी पैदा कर दिए हैं। बोन्साई लेखक और बोन्साई पाठक।‘ शोभा डे और चेतन भगत जैसे अंग्रेजीदां बोन्साई लेखक और बुद्धिजीवियों के लिए यह बात रवींद्र केलकर जैसा गांधीवादी, प्रखर योद्धा रचनाकार ही कह सकता था। ऐसे महान रचनाकार को शत शत नमन, जिसने एक प्रांत और एक भाषा को महान गरिमा और आत्मसम्मान दिया।

यह आलेख डेली न्‍यूज़ के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' में 05 सितंबर, 2010 को प्रकाशित हुआ।

Thursday, 2 September 2010

मीरा की एक कविता

यह कविता मेरी नहीं है, यह मुझसे मीरा ने लिखवाई है।


क्‍यों कहा मां ने बचपन में कि
मेरा ब्‍याह तुमसे हो चुका है
मैं तुम्‍हारे ही सपने देखती बड़ी हुई मेरे श्‍याम
मेरी हर सांस तुम्‍हें ही पुकारती थी
हर ओर तुम्‍हारी ही मोहिनी मूरत दिखती थी

मैं नादान, मासूम बालिका थी श्‍याम
मुझे क्‍या मालूम था कि तुम्‍हारे नाम का पागलपन
कभी सचमुच ही पगली बना देगा

उन महलों में जहां औरतों का दम घुटता था
मैं तुम्‍हारे स्‍वप्‍नों की छांव में बड़ी हुई श्‍याम
तुम मेरे मुक्तिदाता बन गए थे
मैं सोचती थी इन महलों की कैद से निजात दिलाने
एक दिन जरुर आएगा मेरा श्‍याम
मैं नहीं जानती थी कि मेरा श्‍याम
मुझे अपनी ही कैद में एक दिन जकड़ लेगा
और सदियों तक मुझे बावली बना कर रख देगा

जब एक बार हो ही चुका था मेरा ब्‍याह तुम्‍हारे साथ
तो फिर क्‍यों ब्‍याहा मुझे राणाजी के साथ
क्षत्रियों में तो नहीं थी प्रथा दो पतियों की मेरे श्‍याम
मैं रोती कलपती रही पर किसी ने नहीं सुना मेरा रूदन
तुमने भी तो नहीं सुनी मेरी चीख पुकार मेरे श्‍याम

नहीं मैं कुछ नहीं कहूंगी राणाजी के लिए
वो भले मानस कैसे जानते कि मेरा पहले से ही एक पति है
वो संसारी आदमी कहां समझते तुम्‍हारा और मेरा संबंध
उन्‍हें कहां मालूम था कि
मेरा पति कहीं है
कि मैं उसी की सुहागन हूं

अगर मैं जानती होती कि
तुम्‍हारी हजारों रानियां हैं
असंख्‍य गोपियां तुम्‍हारी दीवानी हैं
तो मैं उनमें से ही एक हो जाती मेरे श्‍याम
वो जिनका कोई नहीं जानता नाम
तुम्‍हारी ही कृपा है मैं उनमें नहीं रही

पर तुम बड़े झूठे हो श्‍याम
मैं पुकारती रही अहोरात्र और तुम
बस अपनी मूरत में ही मुस्‍कुराते रहे
ढीठ कहीं के
तुमने कभी मुझे क्‍यों नहीं पुकारा
क्‍या राधा-रुक्मिणी ने रोक रखा था तुम्‍हें
या गोपियों के साथ रास रचा रहे थे कहीं
जब मैं मंदिर में सिर पीट-पीट कर चिल्‍ला रही थी
तुम्‍हारे ही गीत गा रही थी

सुनो मैं सच कहना चाहती हूं आज
कि मुझे तुमसे सच में गहरा प्रेम था
कि मैं तुम्‍हारी सुहागन बनकर भी खुश थी
और तुम्‍हारी विधवा के रूप में भी

पर सुनो श्‍याम
तुम्‍हारे कारण मेरी जग हंसाई तो हुई जो हुई
तुमने एक स्‍त्री का जीवन क्‍यों नष्‍ट किया श्‍याम
अरे तुमने मुझे एक सामान्‍य लड़की तो क्‍या
आम औरत का जीवन भी नहीं जीने दिया मेरे श्‍याम

सोचो अगर मेरे भी बच्‍चे होते तो क्‍या मैं इतनी पगली होती
तुम्‍हारे जैसा ही एक नटखट श्‍याम मेरे आंगन में भी खेलता
उस पर मैं अपना पूरा प्रेम लुटाती
उसके लिए हरपल चिंतित रहती
सुनो मेरे चंचल-वृत्ति श्‍याम
हर स्‍त्री की कामना होती है
तुम्‍हारे जैसी एक सुंदर संतान की
तुमने मुझे उससे वंचित कर दिया

खैर एक जनम तो तुमने मेरा छीन ही लिया
मुझे इस कदर बदनाम किया कि अब तो लोग
अपनी बेटियों का नाम मीरा रखने से डरते हैं
बस इतनी कृपा करना कि अगले जन्‍म में
मैं एक आम औरत की तरह रह सकूं

कुछ तुम्‍हारे गुण अवगुण भी आ जाएं मुझमें
मैं नहीं चाहती कि तुम्‍हारी तरह मेरे हजारों प्रेमी हों
पर प्रेम की कामना के बीज उगें तो उगने देना मेरे श्‍याम
जब तुम दो के साथ सहज स्‍वीकार्य हो
तो कोई स्‍त्री अन्‍य के प्रेम में ना मारी जाए श्‍याम
तुम्‍हारे जन्‍म दिन पर इतनी कामना तो कर ही सकती हूं
कि एक स्‍त्री को प्रेम का अधिकार दिला दो

तुम यदुवंशी मैं क्षत्राणी
फिर भी अपना प्रेम फला
इस भरतखण्‍ड में तुम्‍हारे युद्धक्षेत्र में
स्त्रियां प्रतिबंधित हैं प्रेम करने के लिए
वहां खाटों पर खांपें खाल खींच रही हैं प्रेमियों की
और तुम अपना जन्‍मदिन मना रहे हो
वाह मेरे श्‍याम वाह
मुबारक हो ऐसा जन्‍मदिन हजार बार।

चित्र कोमल नाडकर्णी की पेंटिंग है।

Sunday, 29 August 2010

अपनी ही धुन का कवि पाब्लो नेरूदा

भारतीय कविता पर जिन विदेशी साहित्यकारों का सबसे ज्यादा असर रहा है उनमें पाब्लो नेरूदा का नाम सबसे उपर है। नेरूदा उन गिने-चुने विदेशी लेखकों में हैं जिनकी जन्म शताब्दी भारत में व्यापक पैमाने पर मनाई गई और इस अवसर पर उन पर कई भाषाओं में केंद्रित पत्रिकाओं के विशेषांक और कई पुस्तकाकार प्रकाशन हुए। 12 जुलाई, 1904 को रेल्वे कर्मचारी पिता और अध्यापिका माता के यहां चिली में जन्मे पाब्लो नेरूदा की मां का जन्म के दो महीने बाद ही निमोनिया से निधन हो गया। पिता ने दूसरी शादी की और दो सौतेले भाई-बहनों के साथ नेरूदा का लालन-पालन हुआ। पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा लेखक-कवि बने, इसलिए उन्होंने प्रारंभ में नेरूदा के इस रुझान का विरोध भी किया, क्योंकि वे चाहते थे कि बेटा दुनियादार आदमी बने और लेखक-कवि बनने का ख्वाब छोड़ दे। लेकिन चिली के जंगलों में बालसुलभ कौतूहल में घंटों घूमने वाले और कई किस्म के कीट-पतंगों और फूल-पत्तियों का संग्रह करने वाले नेरूदा अपनी धुन के पक्के थे। फिर आरंभिक शिक्षा के दौरान नेरूदा को गेब्रिएला मिस्त्राल जैसी कवयित्री शिक्षिका का सान्निध्य मिला, जिन्हें आगे चल कर नोबल पुरस्कार मिला। नेरूदा की पहली कविता अपनी दिवंगत मां की स्मृति में थी, जो कहीं विस्मृत हो गई। पहली रचना तेरह बरस की उम्र में ही एक स्थानीय अखबार में एक निबंध ‘उत्साह और उद्यमशीलता’ के रूप में प्रकाशित हुई। पाब्लो नेरूदा का मूल नाम रिकार्डो एलीज़र नेफ्टाली रीस वाय बेसाआल्टो था। लेकिन पिता के डर से उन्होंने अपना नाम पाब्लो नेरूदा रख लिया जो दो महान लेखकों जेन नेरूदा और पॉल वरलाइन के मिश्रण से बना था। सोलह साल की उम्र तक आते-आते उनके बदले हुए नाम से रचनाएं प्रचुर मात्रा में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। पढ़ने की नेरूदा को इतनी जबर्दस्त धुन थी कि कम उम्र में ही उन्होंने कस्बे की लाइब्रेरी की तमाम किताबें पढ़ डालीं।

सत्रह साल की आयु में वे चिली विश्‍वविद्यालय में फ्रेंच भाषा पढ़कर अध्यापक बनने का सपना लेकर गए। लेकिन जल्द ही यह सपना त्याग कर वे पूर्णकालिक कवि हो गए। उन्नीस की उम्र में पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ ‘बुक ऑफ ट्वाइलाइट्स’। अगले साल ‘ट्वेंटी लव पोएम्स एण्ड ए सोंग ऑफ डिस्पेयर’ ने पाब्लो की ख्याति रातों-रात बढ़ा दी। इतनी कम उम्र में ऐसी खूबसूरत प्रेम कविताओं की वजह से पाब्लो को जबर्दस्त आलोचना और प्रशंसा समान रूप से मिली। उन्‍मुक्‍त प्रेम की उद्दाम भावनाओं की कविताओं के इस संग्रह का कालांतर में विश्‍व की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और आज भी ये उनकी सर्वाधिक बिक्री वाला संग्रह है। इस संग्रह में एक कविता में उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ से उद्धृत करते हुए कविगुरू को सम्मान दिया था। भारत के साथ नेरूदा का रिश्‍ता कालांतर में और मजबूत होता गया। पाब्लों की प्रसिद्धि तो फैल रही थी, लेकिन गरीबी पिंड नहीं छोड़ रही थी। पैसा कमाने की कई योजनाएं बनाते और हर बार असफल हो जाते। इसलिए वे राजनयिक सेवा में एक नौकरी के लिए 1927 में नितांत अनजान जगह रंगून जा पहुंचे। इसके बाद वो कोलंबो, बटाविया और सिंगापुर भी रहे। बटाविया, जावा में पाब्लो की मुलाकात डच बैंककर्मी मैरिका से हुई, जिसके साथ उन्होंने पहला विवाह किया। राजनयिक सेवा के दौरान पाब्लो जहां भी रहे, वहां के साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं का अध्ययन कर अपनी कविताओं में निरंतर प्रयोग करते रहे और विभिन्न संस्कृतियों को अपने काव्य में रचते रहे।

चिली वापस लौटने के बाद उनकी नियुक्ति अर्जेंटीना और स्पेन में की गई। यहां उन्हें लोर्का और राफाएल जैसे कवि-साहित्यकारों से हुई। 1934 में पहली बेटी का जन्म हुआ, जो लगातार बीमारी के कारण जल्द ही चल बसी। इस बीच उनका पत्नी की तरफ से रुझान घटता गया और 1936 में तलाक हो गया। इसके बाद पाब्लो ने अर्जेंटाइन डेलिया से विवाह किया जो उनसे बीस साल छोटी थी। स्पेन में जब गृहयुद्ध छिड़ गया तो पाब्लो नेरूदा राजनैतिक तौर पर बेहद गंभीर हो गए और वामपंथी विचारों से प्रभावित हुए। स्पेन में जब लोर्का की हत्या की गई तो वे उग्र वामपंथी हो गए और परिणाम स्वरूप ‘स्पेन इन द हार्ट’ कविता संग्रह प्रकाश में आया। 1937 में स्वदेश वापसी के बाद पाब्लो नेरूदा की कविताएं पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग गईं, जिनमें आतताइयों का प्रखर विरोध और जनता का प्रबल समर्थन मुखरित हुआ।

राजनयिक सेवा के दौरान उनकी नियुक्ति मेक्सिको में हुई जहां वे ऑक्टोविया पाज जैसे महान कवि से मिले। अपने राजनैतिक विचारों के कारण नेरूदा को देश और नौकरी दोनों को छोड़ना पड़ा। लेकिन वे कभी भी अपने राजनैतिक विचारों से विमुख नहीं हुए और इसका आगे चलकर उन्हें फायदा भी मिला। उनके लिए कविता हमेशा मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज रही। 1950 में उनका विराट कविता संग्रह ‘केंटो जनरल’ प्रकाशित हुआ, जिसमें उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता ‘माचू पिच्चू के शिखर’ भी शामिल थी। इस कविता का हिंदी में कई कवियों ने अनुवाद किया है और भारतीय साहित्य में नेरूदा की यह सबसे लोकप्रिय कविताओं में से है। इंका सभ्यता के एक उजड़े हुए नगर के बहाने यह कविता सभ्यता और संस्कृति का विहंगम विमर्श प्रस्तुत करती है, जिसमें मनुष्य के प्रयत्नों की गंध और उसके स्वप्नों की बहुत सुंदर छवियां देखने को मिलती हैं। जब चिली में उनके विचारों की सरकार की स्थापना हुई तो वे स्वदेश लौट आए और 1958 में ‘एक्सट्रावैगारियो’ काव्य संग्रह प्रकाश में आया। उनकी ख्याति बतौर कवि और राजनेता चिली में चरम पर थी और उनके अनुवाद निरंतर प्रकाशित होते जा रहे थे। बतौर राजनेता वे सीनेटर चुने गए।

1971 में जब उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया तो वे स्वाभाविक तौर पर इसके हकदार माने गए। क्‍योंकि करीब दस साल से हर बार उनका नाम संभावितों की सूची में होता था और अंत में किसी अन्‍य लेखक को नोबल घोषित हो जाता था। बहरहाल, उन्होंने आपने नोबल भाषण में नोबल पुरस्कार उन तमाम लोगों को समर्पित किया जो उनकी कविता में किसी भी रूप में आए। पाब्लो नेरूदा के लिए कहा जाता है कि दुनिया की तमाम भाषाओं में वे बीसवीं सदी के महानतम कवि हैं। नेरूदा ने चार बार भारत की यात्रा की। पहली बार नवंबर, 1927 में वे मद्रास आए, जहां उन्होंने भारतीय महिलाओं पर बेहतरीन कविताएं लिखीं। इसके बाद दिसंबर, 1928 में वे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में शामिल हुए, जहां मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी आदि राष्ट्रीय नेताओं से मिले। भारतीय स्वाधीनता संग्राम से नेरूदा ने प्रभावित होकर लिखा कि यह पूरे एशिया का जागरण था। 1951 में वे विश्‍व शांति परिषद के प्रतिनिधि के तौर पर प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से मिलने आए। यहीं उन्होंने ‘इंडिया 1951’ कविता लिखी, ‘धरती का गर्भ/एक बंद गलियारा जहां इतिहास के अंगूर पकते हैं/पुराने ग्रह-नक्षत्रों की प्राचीन बहन है भारत की धरती।’ अंतिम बार नेरूदा 1957 में बांग्ला कवि विष्णु डे के निमंत्रण पर भारत आए। 23 सितंबर 1973 को उनका निधन हुआ।
यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 29 अगस्‍त, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।









Tuesday, 24 August 2010

बहन

बहन

मां की कोख से
पैदा हुई लड़की का ही नाम नहीं है
उस रिश्‍ते का भी नाम है
जो पुरुष को मां के बाद
पहली बार
नारी का सामीप्‍य और स्‍नेह देता है

बहन
कलाई पर राखी बांधने वाली
लड़की का ही नाम नहीं है
उस रिश्‍ते का भी नाम है
जो पीले धागे को पावन बनाता है
एक नया अर्थ देता है

मां
पुरुष की जननी है
और पत्‍नी जीवन-संगिनी
             पुरुष के नारी-संबंधों के
                इन दो छोरों के बीच
पावन गंगा की तरह बहती
नदी का नाम है
बहन

Sunday, 22 August 2010

महंगाई ने किया बेहाल

अब सिर्फ साढ़े चार साल बचे हैं और इतने कम समय में संपूर्ण भारत को शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, लैंगिक समानता, रोजगार, भोजन, स्वच्छ पेयजल, शिशु और मातृ मृत्यु दर में कमी जैसे क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र संघ से किए गए वायदे के अनुसार बड़े लक्ष्य हासिल करने हैं। जी हां, सन 2000 में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ जिस मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे, उसके अनुसार सन् 2015 तक आठ विभिन्न क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लक्ष्य प्राप्त किए जाने हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है आधी आबादी की गरीबी दूर करना और भूख मिटाना। हालात ये हैं कि 23 जून, 2010 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की 70 प्रतिशत से भी अधिक जनता गरीबी की रेखा से नीचे रह रही है। क्या आगामी चार सालों में बीस प्रतिशत जनता को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सकेगा? यह सवाल इसलिए भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि माध्यमिक स्तर तक शिक्षा में लिंग भेद समाप्त करने और शत प्रतिशत लड़कियों को शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य 2205 तक निर्धारित किया गया था, लेकिन हासिल नहीं किया जा सका। 2015 तक गरीबी की दर को 24 प्रतिशत पर लाना है, जो अभी संभव नहीं दिख रहा है। पिछले दो सालों में हुई आर्थिक मंदी ने भुखमरी को 21 प्रतिशत तक बढ़ दिया है। यह स्थिति सिर्फ भारत की नहीं समूचे दक्षिण एशिया की है। उक्त रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो सालों में खाद्यान्न और अन्य खाद्य वस्तुओं के दाम 80 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं, जिसकी वजह से निर्धनतम लोगों के सामने भयानक भुखमरी का संकट खड़ा हो गया है। हाल ही पेट्रोलियम पदार्थों में की गई बढ़ोतरी इस संकट को और बढ़ाएगी। भुखमरी के लिहाज से मध्यप्रदेश और गुजरात की हालत दक्षिण अफ्रीका के सामालिया और कांगो जैसे देशों सी है। राजस्थान भी बहुत अच्छी दशा में नहीं है, लेकिन हालात तो यहां भी चिंताजनक ही हैं।

सहस्राब्दी विकास लक्ष्य यानी मिलेनियम डवलपमेंट गोल्स में युवाओं को अच्छा रोजगार उपलब्ध कराना भी शामिल है। इसीलिए नरेगा के बाद महानरेगा जैसी योजनाएं लाई गई हैं और सरकारी नौकरियों में जोरदार भर्ती के अभियान चल रहे हैं। इस दिशा में अगर दस साल पहले काम शुरु किया गया होता तो सोचिए कितने करोड़ बेरोजगारों को अब तक रोजगार मिल गया होता और उन हजारों नौजवानों की जान बच गई होती, जिन्होंने बेरोजगारी के कारण आत्महत्या का रास्ता चुना। दरअसल हमारी आदत ही हो गई है कि हम बिल्कुल आखिरी समय पर जाकर चेतते हैं, इसीलिए समय पर वांछित परिणाम हासिल नहीं हो पाते।

2015 तक देश के प्रत्येक बालक को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराई जानी है, लेकिन हालत यह है कि आज भी देश के हजारों गांवों में स्कूल तक नहीं हैं। ऐसे में इस लक्ष्य को हासिल करना खासा मुश्किल काम है। इसी तरह पंद्रह से चौबीस साल की आयु के सभी स्त्री-पुरुषों को साक्षर किया जाना है। इसके लिए साक्षर भारत योजना युद्धस्तर पर चल रही है। तमाम ग्राम पंचायतों को इसके लिए बैंकों के माध्यम से विशेष रूप से फण्ड उपलब्ध करवाया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक असमानता को समाप्त करने का लक्ष्य भी हासिल होता नहीं दिख रहा है। अभी भी देश की अधिकांश बालिकाएं शिक्षा से वंचित हैं और सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार होता नहीं दिख रहा है।

समाज में विभिन्न स्तरों पर व्याप्त लैंगिक भेद को समाप्त करने और महिला सशक्तिकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही संसद में महिलाओं के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई। अब इसे समाज के अन्य हिस्सों में भी लागू करने की कवायद चल रही है। इसी तरह खेती के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं को पुरुषों के समान रोजगार दिया जाना है। इतना ही नहीं रोजगार में महिलाओं को प्रबंधकीय तंत्र में भी शामिल करना है, जिससे उच्च प्रशासनिक स्तर पर महिला और पुरुष का अनुपात कम किया जा सके। अगर ऐसा होता है तो आने वाले समय में समाज में कई स्तरों पर व्यापक बदलाव देखने को मिलेंगे। सहस्राब्दी विकास के आठ लक्ष्यों में से तीन लक्ष्य पूरी तरह महिलाओं से संबंधित हैं। लिंग भेद समाप्त करने के अलावा शिशु और मातृ मृत्यु दर को कम करने के लक्ष्य प्राप्त करने में महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका अहम साबित हो सकती है। देश के अनेक गांवों में प्राथमिक चिकित्सा सेवाएं सुलभ नहीं हैं और करोड़ों बच्चे बेमौत मारे जाते हैं। राजस्थान के पंचायत चुनावों में इस बार साठ हजार से ज्यादा महिलाएं जीत कर आई हैं। ये महिला पंच, सरपंच, उप सरपंच और प्रधान चाहें तो हर गांव में एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खुलवा कर अपने गांव में होने वाली शिशुओं की ही नहीं गर्भवती माताओं की भी अकाल मृत्यु रोक सकती हैं। शिशु और माता की मृत्यु का सीधा संबंध माता के स्वास्थ्य से है, इसलिए अगर माता को सही पोषण मिले और नियमित स्वास्थ्य जांच हो और समय पर दवाइयां आदि मिले तो इस लक्ष्य को हासिल करना असंभव नहीं है। महिला जनप्रतिनिधि अपने गांव की महिलाओं को परिवार नियोजन और स्वास्थ्य के बारे में जागरूक करें तो नेता होने के कारण महिलाएं उनकी बात आसानी से मानेंगी और इसके बहुत सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। महिलाओं पर आए दिन होने वाली हिंसा रोकने में भी महिला जनप्रतिनिधि बेहद कारगर सिद्ध हो सकती हैं। सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों में एड्स, मलेरिया और अन्य बीमारियों से बचाव और चिकित्सा भी एक अहम मुद्दा है। इसे हासिल करने में पूरे समाज को ही योगदान करना होगा, फिर वो चाहे शिक्षक हों, स्वास्थ्यकर्मी हों या जनप्रतिनिधि।
पर्यावरण संरक्षण को लेकर अभी भी समाज में वैसी चेतना नहीं है, जिससे दिनोंदन बिगड़ते पर्यावरण को सुधारा जा सके। इसके लिए एक तरीका यह भी हो सकता है कि नरेगा के अंतर्गत होने वाले विभिन्न विकास कार्यों में पर्यावरण संरक्षण के कार्यों का दायरा बढ़ाया जाए। मसलन गांव में होने वाले विकास कार्यों में तीस प्रतिशत काम सिर्फ पर्यावरण संरक्षण के ही होना अनिवार्य कर दिया जाए तो कायापलट संभव है। इस काम में भी महिला जनप्रतिनिधियों की पहल प्रभावी हो सकती है। अगर प्रत्येक गांव में वाटरशेड डवलपमेंट योजना चलाई जाए तो जलसंकट से भी निजात मिल सकती है और पर्यावरण को भी संरक्षित किया जा सकता है। इससे गांव के पशुओं के लिए चारा भी उपलब्ध हो सकता है और गांवों में जलस्तर भी बढ़ाया जा सकता है।

सहस्राब्दी विकास लक्ष्य हासिल करना देखने में मुश्किल जरूर लगते हैं, लेकिन ये असंभव बिल्कुल नहीं हैं। यह जरूर हो सकता है कि हम 2015 तक इन लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएं, लेकिन 2020 या 2025 तक तो कर ही सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि प्रशासनिक मशीनरी और सभी स्तरों के जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल हो और सब मिलकर गंभीरतापूर्वक प्रयास करें।