Sunday, 15 February 2009

झरोखों से झांकता इतिहास




जैसलमेर एक ऐसा ऐतिहासिक शहर है, जिसका इतिहास और स्थापत्य सदा से ही रचनाकारों को आकर्षित करता आया है। यहां की रूठी रानी को लेकर मुंशी प्रेमचंद ने अपनी प्रसिद्ध कहानी लिखी। आचार्य चतुरसेन ने ‘राजकुमारी रत्नावली की कहानी’ लिखी तो हरिकृष्ण प्रेमी ने ‘मित्र’ नाटक लिखा। महान फिल्मकार-साहित्यकार सत्यजित राय ने जैसलमेर को केंद्र में रखकर ‘सोनार किला’ उपन्यास लिखा। इसी नगर के बाशिंदे और राजस्थान के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश भाटिया ने पांच वर्ष के गहन शोध एवं अनुसंधान के बाद सन् 2002 में ‘दीवान सालम सिंह’ उपन्यास लिखा, जो दुर्भाग्य से हिंदी साह्रित्य जगत में लगभग उपेक्षित और अलक्षित ही रहा। इतिहास को गल्प में ढालना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है और इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि लेखक अपने समय के परिप्रेक्ष्य में इतिहास को किस प्रकार देखता है। क्या इतिहास के एक विशेष कालखण्ड से पाठक को आज भी कुछ नया मिलता है? अथवा सिर्फ इतिहास की एक झलक ही देखने को मिलती है? कहना न होगा कि ओमप्रकाश भाटिया का उपन्यास इन सवालों के मुकम्मिल जवाब भी देता है और उनसे टकराते हुए आज के जालियों और झरोखों से इतिहास को एक युगीन दृष्टि से देखता है।
इतिहास में कई अवसरों पर देखा गया है कि राजा से महत्वपूर्ण उसके दरबारी या मंत्री अथवा कोई और सामान्य व्यक्ति भी हो जाते हैं। जैसलमेर के इतिहास में भी दीवान सालमसिंह अपने राजा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण चरित्र रहा है। वह राज्य का ऐसा दीवान था, जिसने राजा न होते हुए भी सत्ता का निरंकुश इस्तेमाल किया और अपने हाथ में सत्ता रखने के लिए आजीवन तमाम किस्म के षड़यंत्र रचे। लेकिन सालमसिंह ने ग्यारह बरस की उम्र में देखा था कि उसके पिता दीवान स्वरूप सिंह का दिन दहाड़े जैसलमेर के दरबार में युवराज रायसिंह ने सर कलम कर दिया था। बालक मन पर यह दृश्य इस तरह अंकित हो गया कि इसकी परिणति आगे चलकर हिंसक, विलासी और षड़यंत्रकारी दीवान सालमसिंह में हुई। दीवान सालमसिंह का काल सन् 1773 से 1824 के मध्य रहा और यह काल भारतीय इतिहास में राजाओं की आपसी लड़ाई और सामंतशाही के पतन का आरंभिक काल भी है। इसी काल में भारत के विभिन्न राजा ईस्ट इंडिया कंपनी से समझौते कर अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार कर रहे थे। उस समय के राजपूताना में मराठों के आक्रमण हो रहे थे और इन हमलों से बचने का एकमात्र उपाय अंग्रेजों से संधि करना ही रह गया था। ऐसे समय में ही दीवान सालमसिंह जैसे चरित्र राजा से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं और सत्ता पर अपनी पकड़ स्थापित कर लेते हैं।
दीवान सालमसिंह को जैसलमेर की परंपरा के अनुसार विरासत में दीवानी मिली और उसने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेते हुए उसने पहले एक-एक कर पूरे राजपरिवार को खत्म किया और नाम मात्र के राजपरिवार के बहाने जैसलमेर की संपूर्ण राजसत्ता पर अपना दबदबा कायम किया। दीवान सालमसिंह एक ऐसा ऐतिहासिक चरित्र है, जिसमें तत्कालीन राजशाही और सामंती शासन के तमाम दुर्गुणों को एक साथ देखा जा सकता है। उसे सिर्फ अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध से ही शांति नहीं मिलती, बल्कि वह तो पूरी सत्ता अपने हाथ में लेकर अपनी मनमर्जी से राज चलाता है। उसे जहां कहीं कोई सुंदर स्त्री, युवती या बालिका भी दिख जाये तो वह हर कीमत पर उसे हासिल करना चाहता है। इसके लिए वह उस परंपरा को भी बदलवा देता है, जिसमें एक माहेश्वरी जाति का दीवान एक से अधिक विवाह नहीं कर सकता। ताकत और पैसे के जोर पर सब कुछ बदला जा सकता है और दीवान सालमसिंह यही करता है। ओम प्रकाश भाटिया के इस उपन्यास से ही हमें पहली बार एक कथा के रूप में यह जानकारी मिलती है कि कैसे जैलमेर का ऐतिहासिक कुलधरा नामक गांव एक ही रात में खाली हो गया था।
दरअसल हुआ यह था कि दीवान सालमसिंह को पालीवाल ब्राह्मणों की एक किशोरी बेहद भा गई थी और वह उससे शादी करने पर आमादा था। पालीवालों ने पचास बरस के दीवान से चौदह बरस की लड़की का विवाह करने से इन्कार कर दिया। इससे क्रुद्ध दीवान ने पूरी पालीवाल बिरादरी पर पांच सौ रूपये प्रति घर 'कर' लगा दिया। पालीवालों को जैसलमेर राज्य की तरफ से पांच सौ बरस से यह छूट मिली हुई थी कि उनसे कभी कर या लगान नहीं लिया जायेगा। दीवान के फैसले से नाराज पालीवालों ने दीवान के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया और एक सामूहिक फैसला लिया कि एक वे एक रात में गांव खाली कर देंगे और फिर कभी लौटकर जैसलमेर राज्य की सीमा में नहीं आयेंगे। ऐसे ही एक पालीवाल परिवार का एक वंशज सन् 2005 में मुझे कराची में मिला था, जिसने बताया था कि उनका परिवार कई पीढ़ियों पहले जैसलमेर के किसी गांव से यहां आ गया था और वापस जैसलमेर की तरफ लौटकर न जाने के प्रण के कारण विभाजन के बाद भी वहीं रह गया। ओम प्रकाश भाटिया का उपन्यास निश्चित रूप से इतिहास नहीं, इतिहास का साहित्यिक प्रतिफलन है। लेकिन इसमें ऐतिहासिक तथ्यों, किंवदंतियों और लोक गीतों के साथ लोक कथाओं का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है, जिससे उपन्यास की घटनाओं को एक किस्म की विश्वसनीयता मिलती है और तथ्यों की पुष्टि होती है। आज भी जैसलमेर में खड़ी सालमसिंह की हवेली उसकी चरम विलासिता का जीता जागता प्रमाण प्रस्तुत करती है। आजीवन दूसरों के लिए षड़यंत्र रचने वाले दीवान सालमसिंह का अंत उसी की कामुकता की शिकार सातवीं पत्नी के हाथों जहर दिये जाने से होता है।

वो पहला प्यार...



आधुनिक विश्व साहित्य में युवा मन के प्रेम को लेकर कथा-कहानी लिखने की परंपरा कम से कम ढाई सौ बरस पुरानी है। इस क्रम में सबसे पहली कृति सैम्युअल रिचर्ड्सन की ‘पामेला’ उर्फ ‘वर्च्यू रिवार्डेड’ है, जो 1740 में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद तो यूरोप में प्रेम और रोमांस को लेकर अफसाने लिखने की एक ऐसी परंपरा चल पड़ी कि आगे चलकर तो ऐसे किस्से-कहानियों के लिए ‘मिल्स एण्ड बून’ जैसे प्रकाशन गृह ही खुल गये। लेकिन यूरोप और दूसरे महाद्वीपों की अथाह प्रेमकथाओं के सागर में रूस के महान् कवि-कथाकार-उपन्यासकार इवान तुर्गनेव की सन् 1860 में prakaashit उपन्यासिका ‘प्रथम प्रेम’ अर्थात् ‘फर्स्ट लव’ एक ऐसी कृति है, जिसने दुनिया भर के नौजवानों के दिलों में जबर्दस्त उथल-पुथल मचाई है। सदा से माना जाता रहा है कि प्रत्येक प्रेमकथा अगर एक त्रासदी में खत्म होती है तो अमर होती है और शायद ही कोई प्रेमकथा हो जो सफल होने के कारण अमर हुई हो, यह तो सिर्फ हमारी भारतीय व्रत कथाओं में ही होता आया है, जहां एकनिष्ठ प्रेम और एकव्रती सफल दाम्पत्य जीवन को ही महानता का दर्जा प्राप्त है। लेकिन तुर्गनेव की उपन्यासिका एक ऐसी दर्दीली दास्तान है, जिसे पढ़ने के बाद उसके तमाम पात्रों से पाठक को गहरी सहानुभूति होती है, क्योंकि वे अपने समय के ऐसे पात्र हैं, जो प्रेम में दिलो-जान से डूबने के बाद भी कुछ हासिल नहीं कर पाते, उनका जीवन तो बस ’दुख ही जीवन की कथा रही’ में समाप्त हो जाता है।
यह कहानी सोलह साल के किशोर प्रेमी व्लादिमिर पेत्रोविच और इक्कीस बरस की जिनैदा अलेक्सान्द्रोव्ना के अद्भुत प्रेम की कथा है, जो अपनी राजकुमारी सदृश्य मां के साथ रूस के देहात में रहती है। व्लादिमिर अपने पिता के साथ रहता है। जिनैदा के परिवार को पुराने विरसे के कारण बस कहने भर के लिए इज्जत हासिल है, वरना उनकी हालत बिल्कुल गरीबों जैसी है। कच्ची उमर का व्लादिमिर अपने से थोड़ी पकी उमर की जिनैदा के प्यार में गिरफ्तार हो जाता है। व्लादिमिर के किशोर मन में जिनैदा की एक बहुत ही पवित्र और प्रेमिल छवि है, उसे जिनैदा के साथ बैठना, ढेर सारी बातें करना और उसे एकटक देखते रहना बहुत अच्छा लगता है। जिनैदा के व्लादिमिर जैसे और उससे भी बेहतर कई चाहने वाले खूबसूरत नौजवान पहले से ही मौजूद हैं। जिनैदा जाने-अनजाने व्लादिमिर से प्रेम का खेल उसी तरह खेलती है जैसे दूसरे लड़कों के साथ खेलती है। वह व्लादिमिर को प्रेम में छकाते हुए उसे अपने मोहजाल में फांस लेती है। बहुत दिनों बाद व्लादिमिर को पता चलता है कि जिनैदा उसे इसलिए चाहती है, क्योंकि असलियत में तो वह उसके पिता प्योत्र वसील्येविच को प्रेम करती है। एक किशोर-नौजवान के लिए यह कितनी अजीब बात है कि उसकी प्रेमिका उसके पिता से ही प्रेम करती है। बेचारा व्लादिमिर इसी चिंता में खोखला हुआ जाता है, और एक दिन तो वह खुद अपनी आंखों से अपने पिता को जिनैदा से प्रेमवार्ता करते हुए देख लेता है। उसके पिता जिनैदा के घर की खिड़की के बाहर खड़े बतिया रहे हैं और एक नाजुक डाली से उसके हाथ को सहला रहे हैं। जिनैदा डाली का सिरा चूम लेती है और पिता खिड़की से घर के भीतर कूद जाते हैं। व्लादिमिर को एक झटका लगता है और वह निराश हो वहां से चला जाता है।
व्लादिमिर की मां को किसी तरह इस बात का पता चल जाता है और वह अपने पति को अपनी नाराजगी जताती है। प्योत्र वसील्येविच लगभग रोते-गिड़गिड़ाते हुए पत्नी से माफी मांगते हैं। कुछ समय बाद व्लादिमिर के पिता की ह्रदयाघात से मृत्यु हो जाती है और व्लादिमिर भी मास्को आ जाता है। तीन-चार साल बाद व्लादिमिर को पता चलता है कि जिनैदा ने डोल्स्की नामक एक नौजवान जागीरदार से शादी कर ली थी, लेकिन बच्चे को जन्म देने के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। व्लादिमिर बरसों बाद डाइनिंग टेबल पर अपने दोस्तों के साथ अपने प्रथम प्रेम की कहानी सुना रहा है और सारी कहानी फ्लैश बैक में चलती है।
तुर्गनेव की यह कृति रूसी साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में भी क्लासिक मानी जाती है, जिसमें किशोर मन की प्रेमिल भावनाओं और उन्नीसवीं शताब्दी के रूसी समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों का एक यथार्थवादी चित्रण देखने को मिलता है। व्लादिमिर के पिता उस दौर के विलासी और लम्पट पुरुषों का प्रतिनिधि चरित्र है, तो जिनैदा के रूप में सौंदर्य के बल पर मर्दों को छकाने वाली उस दौर की युवा नारी है, जो गरीब होते हुए भी महज खानदानी विरासती तमगे के कारण सबकी चहेती है। युवा और कैशोर्य दिलों को छू लेने वाली यह उपन्यासिका दुनिया की तमाम भाषाओं में अनूदित होकर अद्भुत लोकप्रियता हासिल कर चुकी है। रूसी स्कूलों में तो ‘प्रथम प्रेम’ वहां के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है। हम भारतीय शायद ही कभी यह कल्पना कर पायें कि हमारे यहां इस किस्म की प्रेमकथाएं कभी स्कूलों में पढ़ाई जाएंगी। हमारे यहां तो नैतिकता की दुहाई देने वालों और संस्कृति की रक्षा में लगे सिपाहियों की पूरी फौजें तैयार हैं, जो प्रेम के नाम से ही बिदकती हैं। ऐसे लोगों को भी कम से कम एक बार तुर्गनेव का ‘प्रथम प्रेम’ जरूर पढ़ना चाहिए।
(यह 'डेली न्यूज़' के रविवारी परिशिष्ट 'हम लोग' के ८ फरवरी, २००९ के 'प्रेम अंक' में प्रकाशित हुआ।)

कमलेश्वर की आंखों से देखो पाकिस्तान



नवंबर में मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के बाद भारत-पाक संबंध एक अजीब तनाव और रस्साकशी के दौर से गुजर रहे हैं। इस माहौल में जब सब तरफ पाकिस्तान को लेकर गुस्सा है, एक लेखक-कलाकार समुदाय ही ऐसा है, जो मुश्किल हालात में भी अपना धैर्य नहीं खोता और ऐसे वक्त में हमें हिंदी के महान लेखक कमलेश्वर की किताब ‘आंखों देखा पाकिस्तान’ की याद आती है। यह किताब कमलेश्वर की पाकिस्तान यात्राओं के संस्मरणों और पाकिस्तान को लेकर लिखे गये विभिन्न पत्रकारी आलेखों का एक शानदार संकलन है, जिसके भीतर से गुजरते हुए एक अलग तरह का भावनात्मक और सांझी सांस्कृतिक विरासत के वारिस होने का अहसास होता है। इस किताब को पढ़ना एक प्रकार से अपने अड़ोस-पड़ोस को नितांत नये ढंग से देखना भी है। और इस देखने की प्रक्रिया में आप पायेंगे कि हम भारतीय हों या पाकिस्तानी, अंततः हम सदियों पुरानी एक दक्षिण एशियाई कौम हैं, जिसकी एक जैसी आबो-हवा है, जहां के मौसम एक हैं, जहां सागर, पहाड़ या जमीन से हमारी सरहदें मिलती हैं और एक होने का अहसास जगाती है।
दरअसल कमलेश्वर की इस किताब से पाकिस्तान को लेकर आम भारतीय में गहरे बैठी वो सारी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं, जिसमें पाकिस्तान देश और पाकिस्तानी जनता को पूरी तरह एक मुस्लिम कट्टरपंथी और बंद समाज के तौर पर देखा जाता है। मशहूर लेखक अहमद नदीम कासमी से हुई एक मुलाकात में कमलेश्वर को पाकिस्तानी अवाम की आवाज सुनाई पड़ती है, जब कासमी साहब उनसे कहते हैं, ‘मजहब जो कर सकता था, उसने कर दिखाया, अब मजहबी पहचान से ज्यादा इंसानी पहचान की जरूरत है, जो अदब हमेशा से पैदा करता रहा है।... हमारे यहां तो बस छावनी कल्चर बची है और फौजी ब्यूराक्रेसी। यह अंग्रेजों की देन है। पाकिस्तानी फौज चार बार पाकिस्तान को जीत चुकी है... पर वो बुल्लेशाह, वारिसशाह और नानक के खानदानों को नहीं जीत पाई है... अपने सियासी हिंदू हुक्मरानों से कहिएगा कि वे यह गलती न करें। वे तुलसीदास, मीराबाई, रसखान और अमीर खुसरो के खानदान को नहीं जीत पायेंगे।’
ये बसंत के दिन हैं और पूरे दक्षिण एशिया में इसके अलग-अलग रंग और त्यौहार हैं, लेकिन पाकिस्तानी पंजाब में इसकी अलग ही छटा है। वहां इन दिनों पतंगें उड़ाई जाती हैं, जिसे लेकर कई सालों से कट्टरपंथी हंगामा मचाते रहे हैं लेकिन आम जनता उनकी परवाह किये बिना बसंत का त्यौहार मनाती है और तमाम फतवों के बावजूद लाहौर-मुल्तान में अवाम की इच्छाओं की प्रतीक पतंगें आसमानों में परवाज करती रहती हैं। बकौल कमलेश्वर, ‘आज के पाकिस्तान में बसंतोत्सव एक प्रगतिशील विचार का ही नहीं बल्कि आम जनता के विद्रोह और कट्टरपंथ के प्रतिकार का भी उत्सव बन गया है।... पंजाब का किसान इस्लामी तिथियों और तारीखों के कैलेण्डर के हिसाब से नहीं चलता, वह आज भी भारतीय मौसमों के आधार पर चलता है। पाकिस्तानी किसान आज भी मौसमों को चैत, बैसाख, जेठ, अषाढ़ आदि नामों से जानता और याद करता है।’
इस पुस्तक में पाकिस्तान के यात्रा संस्मरणों के अलावा एक खण्ड में भारत-पाक के बीच फैली कट्टरपंथियों की जमात को लेकर कुछ आलेख हैं, जो हर वक्त माहौल बिगाड़ने का खेल खेलते रहते हैं और कभी संबंधों को सामान्य नहीं होने देना चाहते। किताब में उन हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी कैदियों के पत्र भी हैं, जो भारतीय और पाकिस्तानी जेलों में बंद रहे और कमलेश्वर को रिहाई की उम्मीद में खत लिखते रहे। कमलेश्वर ने उन कैदियों की आवाज सुनी और उनकी रिहाई के लिए काफी प्रयास भी किये। किताब के इस खंड से पता चलता है कि सरहद के दोनों तरफ किस प्रकार अफसर शाही हावी है, जो बेगुनाह लोगों को अमानवीयता की हद तक जाकर एक आजाद जिंदगी जीने में बाधक बनती है। भारत-पाक संबंधों को एक वृहद सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में जानने के लिए एक बार पाकिस्तान को कमलेश्वर की आंखों से जरूर देखना चाहिए।

(यह आलेख १ फरवरी, २००९ को प्रकाशित हुआ।)

'पोथीखाना' शीर्षक से नया स्तम्भ

इस नए बरस में मैंने जयपुर से प्रकाशित होने वाले हिन्दी अखबार "डेली न्यूज़" में 'पोथीखाना' शीर्षक से एक नया स्तम्भ शुरू किया है। इस स्तम्भ में किताबों की चर्चा होती है, हर रविवार के दिन। दोस्त-पाठकों के लिए यह चीज़ें ब्लॉग पर भी पोस्ट कर रहा हूँ।

Thursday, 29 January 2009

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल: सबको सबक सिखाता उत्सव

पिछले चार साल से जयपुर में चला आ रहा ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ एशिया में जापान के बाद संभवतः सबसे बड़ा साहित्यिक उत्सव है। इस उत्सव की सबसे अहम बात यह है कि यह लगभग पूरी तरह निजी और कार्पोरेट प्रयासों प्रयासों से आयोजित होता है और इसमें दुनिया भर के लेखक और प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े लोग शिरकत करते हैं। हर साल इसमें भाग लेने वाले लेखकों, कलाकारों और प्रकाशकों की संख्या बढ़ती जा रही है। प्रारंभ में विभिन्न साहित्यिक हलकों से इस उत्सव की इस बात के लिए आलोचना होती थी कि इसमें सिर्फ अंग्रेजीदां विशिष्टजनों और प्रभुवर्गीय लेखकों का ही वर्चस्व रहता है। किंतु साल दर साल आयोजकों ने अपनी आलोचनाओं से जो कुछ सीखा है, उससे इसकी गुणवत्ता में ही नहीं, प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई है। यही वजह है कि भारतीय भाषाओं के साथ-साथ, अब इसमें राजस्थानी और उर्दू के साथ हमारी देवभाषा संस्कृत के लेखकों का भी प्रतिनिधित्व होने लगा है और अगर आयोजकों के किये गये वादों पर विश्वासकरें तो अगले साल से भारतीय भाषाई लेखकों के साथ-साथ राजस्थान की समृद्ध समकालीन रचनाशीलता को भी पहले से कहीं अधिक सम्मानजनक प्रतिनिधित्व मिलेगा। दरअसल इस संभावना के पीछे स्थानीय लेखकों की नाराजगी के समानांतर अंतर्राष्ट्रीय लेखकों का भी आग्रह है, जिसमें वे चाहते हैं कि अधिक से अधिक स्थानीय और भारतीय भाषाई लेखकों के साथ उनका रचनात्मक और आत्मीय संवाद कायम हो सके। अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों की भांति अन्य भाषाई लेखकों की भी अनुवाद के माध्यम से दुनिया भर में ख्याति है। इस उत्सव में आने वाले विदेशी लेखक और प्रकाशक जानते हैं कि अभी भी बहुत से ऐसे लेखक-रचनाकार मौजूद हैं, जिनकी रचनात्मकता अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है और उसे व्यापक रूप से प्रतिष्ठित किया जा सकता है। विदेशी लेखकों के लिए इस प्रकार का संवाद भारतीय जनमानस को और अधिक नजदीकी से देखने का अवसर प्रदान करेगा।


जयपुर विरासत फाउंडेशन द्वारा आयोजित किये जाने वाले इस साहित्य उत्सव में इस बार पांच दिन में तकरीबन सौ के आसपास कार्यक्रम हुए, जिनमें साहित्य, समाज, प्रकाशन जगत, अनुवाद से लेकर कला, संगीत, धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद जैसे ज्वलंत विषयों पर भी खुलकर चर्चा हुई। हर शाम देश-विदेश के लोकप्रिय और लोक कलाकारों के संगीत कार्यक्रम खास आकर्षण का केंद्र रहे, तो आॅस्कर के लिए नामांकित ‘स्लमडाॅग मिलियनेयर’ का विशेष प्रदर्शन और वह भी इसके लेखक विकास स्वरूप की उपस्थिति में, उत्सव को अलग रंग दे गया। पुस्तक और चित्र प्रदर्शनियों ने माहौल को रचनात्मक रूप से समृद्ध किया। यहां पाठक अपने प्रिय लेखकों की किताबें, उनके हस्ताक्षरों सहित प्राप्त कर सके। इसमें भी खास बात यह रही कि अनेक पाठक अपनी मनपसंद किताबों को प्राप्त करने से सिर्फ इसलिए वंचित रहे कि आनन-फानन में ही किताबें बिक गईं। हमारे ही नगर के एक वरिष्ठ कवि की पुस्तक पहले दिन ही समाप्त हो गई और राजस्थान के लगभग सभी लेखकों की पुस्तकें हाथों-हाथ बिक गईं। इस उत्सव में अगर यह प्रतिबंध हटा दिया जाये कि इसमें भागीदार लेखकों की ही किताबें बिक्री के लिए उपलब्ध होंगी तो पाठकों को अन्य महत्वपूर्ण लेखकों की पुस्तकें भी खरीदने का मौका मिलेगा। इसमें विशेष रूप से भारतीय भाषाओं के लेखकों की पुस्तकों की अलग से प्रदर्षनी होनी चाहिए। आखिरकार हम भारतीय साहित्य और इसके साहित्यकारों के प्रोत्साहन में ही तो इस उत्सव का महत्व देखते हैं । सामान्य तौर पर इसकी उम्मीद नहीं कर सकते, वजह यह कि हम हिंदी समाज के लोग यह मानकर चलते हैं कि पाठक पढ़ना नहीं चाहता और हिंदी के प्रकाषक तो पाठक और लेखक को दो जुदा दुनिया के लोग मानकर चलते हैं। इसीलिए हिंदी का प्रकाषक सिर्फ सरकारी खरीद और पुस्तकालयों में किताबें खपाने की तरफ ही ध्यान देता है। इस उत्सव से कम से कम हिंदी के प्रकाषकों को यह तो सीखना ही चाहिए कि पाठक और लेखक के बीच आत्मीय संवाद के माध्यम से किताबों को वास्तविक पाठक तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है और इस प्रकार एक बड़े बाजार को पाया जा सकता है, तब शायद किसी प्रकाषक को सरकारी खरीद की आस में रिष्वतखोर सरकारी तंत्र की जी हुजूरी नहीं करनी पड़ेगी। अंग्रेजी का अच्छा प्रकाषक सिर्फ और सिर्फ पाठक पर ध्यान देता है, इसीलिए वहां लेखक की पहली किताब भी महत्वपुर्ण हो जाती है, जबकि हमारे यहां दर्जनों किताबें लिखने के बावजूद लेखक को कोई महत्व नहीं मिलता। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल निष्चिित रूप से अभी भी अंग्रेजीदां लोगों के पूर्ण प्रभाव में है। संभवतः यह एक अंतर्राष्टीय मजबूरी है, वैसे अगर आप कोई अखिल भारतीय आयोजन भी करें तो वह भी अंग्रेजी से मुक्त नहीं हो सकता। लेकिन इस किस्म के आयोजनों की खास खूबी यह होती है कि आपको एक साथ देष-दुनिया की कई भाषाएं सुनने को मिलती हैं। जैसे इस बार षक्तिदान कविया ने डिंगल में और के. सच्चिदानंदन ने मलयालम में कविता पाठ किया तो पाठक-श्रोताओं को एक बिल्कुल भिन्न तरह की भाषाओं को आस्वादन करने का मौका मिला। इसी तरह राजस्थानी और बांग्ला बाउल लोक कलाकारों के कार्यक्रम में भाषा के साथ संगीत की लय भी देखते ही बनती थी। विदेषी लेखक यही चाहते हैं, दरअसल भाषिक सौंदर्य का आस्वाद तमाम लेखकों को भाता है। मुझे एक अमेरिकी लेखक ने कहा कि मैं चाहता हूॅं कि यहां भारत की विभिन्न भाषाओं के लेखकों को उनकी मूल भाषा में सुनने का अवसर मिले, हम भले ही उसे आत्मसात न कर पायें, परंतु हम वाणी का सौंदर्य तो पहचान ही सकते हैं, हमारे लिए इसका संक्षिप्त अनुवाद हो जाये तो हम उसे और अच्छे ढंग से समझ सकेंगे। वैसे यह हमारी गलतफहमी है कि विदेषी हिंदी नहीं समझते। दरअसल भारत आने से पहले अधिकांष लेखक हिंदी का संक्षिप्त पाठ्यक्रम सीखकर आते हैं, जिसमें उन्हें सामान्य षिष्टाचार के साथ आम तौर पर काम आने वाली रोजमर्रा की हिंदी सिखाई जाती है। इसीलिए आपको कोई ना कोई विदेषी लेखक इस किस्म के समारोह में हिंदी बोलता दिखाई दे जायेगा।इस किस्म के आयोजनों की सबसे बड़ी कमी यह रहती है कि इनमें आम आदमी की चिंताओं के बजाय उन बातों को ज्यादा महत्व दिया जाता है, जिनसे उच्च और मध्य वर्ग का रिष्ता रहता है। यद्यपि आतंकवाद और धार्मिक कट्टरवाद जैसी चीजें सभी को समान रूप से प्रभावित करती हैं, जिन पर इस बार खुलकर चर्चा हुई, जिनमें भाग लेने वाले लोगों के साथ उपस्थित लोगों के संवाद से पता चला कि सामान्य भारतीय न तो धार्मिक कट्टरपंथ के साथ है और न ही वह उन्हें किसी किस्म से बढ़ावा देना पसंद करता है। फिर भी राजस्थान के मालीराम शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘ओ सतासर’ के अंष का पाठ किया तो गरीब किसान जीवन का दर्दनाक पहलू सामने आया और सरवत खान के ‘अंधेरा पग’ से राजपुरोहित समाज की सदियों पुरानी महिला विरोधी परंपराओं का दिल दहला देने वाला पक्ष उजागर हुआ। इस तरह के जमीन से जुड़े लेखकों की अगर अधिक से अधिक भागीदारी हो तो इस अंतर्राष्टीय साहित्य उत्सव में भारतीय जनजीवन का सच्चा लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जा सकता है।स्थानीय लेखकों के साथ इसमें कुल तीन सौ के करीब लेखक और प्रकाषकों ने भाग लिया। निष्चित रूप से इसमें भारतीय और राजस्थानी भागीदारी कम है, इसमें कम से कम प्रतिदिन दो सत्र भारतीय भाषाई लेखकों के लिए होने चाहिएं। इससे भारत के बहुभाषी, सांस्कृतिक वैविध्य वाले बहुरंगी भारतीय साहित्य की छवि दुनिया भर के लेखक-प्रकाषक जगत के सम्मुख प्रस्तुत होगी। इसी तरह भारत के भी प्रमुख प्रकाषकों को, खास तौर पर हिंदी प्रकाषकों को आमंत्रित किया जाना चाहिए, जिससे वे भी यह सीख सकें कि पाठक और लेखक के बीच की दूरी कम करने से किस प्रकार सबका हित सध सकता है। इस उत्सव से मुझ जैसे लेखक को कम से कम यही सीखने को मिला कि साहित्य की जाजम पर सब बराबर होते हैं, जिसमें कोई विषिष्ट नहीं होता, इसीलिए यू. आर. अनंतमूर्ति से लेकर तरूण तेजपाल तक सब एक लाइन में लगकर चाय लेते हैं और कुर्सी खाली मिलने पर जमीन पर ही बैठ जाते हैं। साहित्यकारों के लिए इस आयोजन से यह भी एक किस्म की सीख ही मिलती है कि गंभीर साहित्यिक आयोजनों की तरह लेखक-पाठक संवाद और रचना पाठ जैसे आयोजनों को भी बढ़ावा देना चाहिए। मीडिया में इस साहित्य उत्सव को खासा महत्व मिला, लेकिन इसमें एक तो बिला वजह के विवाद के कारण और दूसरी वजह सितारा लेखक और फिल्मी-मीडिया हस्तियों का आगमन रही। इस आयोजन में ज्यादातर मीडियाकर्मी लेखक-सितारों के साक्षात्कार ही लेते रहे। मेरे खयाल से अगर वे सत्रों में हुई चर्चा और रचना पाठ को महत्व देते तो अखबारों के आम पाठकों को साहित्यकारों की गंभीर चिंताओं और सरोकारों के बारे में भी जानकारी मिलती। उम्मीद है अगले बरस चीजें और सुधरेंगी और जयपुर का यह विष्व स्तरीय आयोजन और नई बुलंदियों को छूएगा।

( इस पोस्ट में वर्तनी की अशुद्धियाँ, फॉण्ट परिवर्तन के कारण हैं, पाठक-मित्र कृपया क्षमा करेंगे। यह आलेख जयपुर से प्रकाशित 'डेली न्यूज़' अखबार में २८ जनवरी २२०९००९ को प्रकाशित हुआ है। )

Friday, 23 January 2009

भास्कर की संवेदनशीलता क्या कहिये!

हिन्दी का सबसे बड़ा अखबार होने का यह तो मतलब नहीं होता कि सबसे ज़्यादा संवेदनशील भी हो? भास्कर जब ऐसे दावे करता है तो गुस्सा आता है। परसों रात एक फ़ोन आया कि क्या जयपुर में चल रहे लिट्रेचर फेस्टिवल में विक्रम सेठ ने मंच पर शराब पी है? मैंने कहा, पता नहीं-मैंने देखा नहीं-और पी ली तो क्या गुनाह हो गया? फ़ोन करने वाले मित्र ने कहा, यह कल के भास्कर का बड़ा मुद्दा बन रहा है। मैंने कहा, बनने दो यार, भास्कर को अख़बार बेचने के लिए ऐसी शोशेबाजी करने की बीमारी है। पिछले बरस भास्कर के एक पत्रकार को आयोजकों ने खाना नहीं खिलाया तो उसने वितंडा मचवा दिया और हम से भी बयान दिलवा दिया। हो सकता है इस बार भास्कर का कोई कंठीधारी फेस्टिवल में पहुँच गया हो, जिसे विक्रम सेठ की किताबों के नाम भी ना पता हों, और वो संस्कृति का वैसे ही स्वयम्भू ठेकेदार बन गया हो, जैसे वैलेंटाइन डे पर शिव सैनिक और बजरंग दली बन जाते हैं। मैंने अपने अति-उत्साही मित्र को शांत रहने के लिए कहा, और सलाह दी कि गुस्सा कम करने के लिए दो पैग लगा लो यार। मैं भी यही कर रहा हूँ।
सुबह के भास्कर में फ्रंट पेज पर विक्रम सेठ की हाथ में रेड वाइन की बोतल थामे फोटो थी और शुद्धता-शुचिता वादी लेखकों के गुस्साए हुए बयानों से भरे दो पेज। मेरी पत्नी ने कहा, यह क्या बकवास है? ज़्यादातर लेखक-पत्रकार तो शराब पीते ही हैं, इसमें इतना ऊधम मचाने की क्या बात है? उसने कहा, राजस्थान की परम्परा तो सदियों से पीने-पिलाने की रही है, 'भर ल्या ऐ कल्हाली दारू दाखां री...पधारो म्हारे देस' । फ़िर फोन पर फोन आने लगे, फोनिक बहस में मैंने कहा, दुनिया के महानतम लेखकों में से ऐसे पाँच लेखकों के नाम बता दीजिये, जिन्होंने शराब नहीं पी हो।
लेकिन भास्कर में कुछ कमाल ऐसे होते हैं कि आपको या तो मज़ा आ जाता है या, रोना आता है। तो साहब, इस बार कमाल यह हुआ कि दम्भी-बड़बोले सम्पादक कल्पेश याग्निक, जिन्हें मुख्य पृष्ठ पर विशेष सम्पादकीय लिखने की बीमारी है, ने लेखक की संवेदनशीलता को लेकर फ़िर एक विशेष सम्पादकीय पेल डाला। इस बार उन्होंने मेयो कोलेज की एक छात्रा की मानसिक उथल-पुथल की कल्पना कर लिखा, 'वह मेयो कोलेज से सिर्फ़ अपने सपनों के लेखक को देखने आई थी। लेकिन बाद में उसकी घबराहट देखने लायक थी। उसने मासूमियत से पूछा: क्या विक्रम सेठ ऐसे हैं?' अब इन्हें कौन बताये कि मेयो में पढने वाले विद्यार्थी करोड़पति घरों के होते हैं, जिनके लिए ऐसे वाकये बेहद सामान्य होते हैं। और अगर संवेदना कि बात करें तो भैये, भास्कर की संवेदनशीलता का तो आलम यह है कि यहाँ, यानी भास्कर में काम करने वाले साहित्यकारों को भी बड़ी बे-इज्ज़ती के साथ बाहर का रास्ता दिखाया गया है। विश्वास न हो तो भाई राम कुमार सिंह का ब्लॉग पढ़ लीजिये, लिंक इसी पोस्ट पर मिल जायेगा। और लेखकों से मुफ्त में विमर्श करवाने वाला भास्कर, किस संवेदनशीलता की बात करता है, जब वो लवलीन जैसी महान लेखिका की मौत की ख़बर भी छापने लायक नहीं समझता, श्रद्धांजलि देना तो बहुत दूर की बात है। क्या लवलीन की मौत की ख़बर भी इसलिए नहीं छपी कि वो सिगरेट और शराब पीती थी? वैसे भास्कर के एक पूर्व-कर्मचारी के मुताबिक, भास्कर में सम्पादकों की कोई मीटिंग बिना शराब के नहीं होती। और भास्कर कानक्लेव में तो कहते हैं, नदियाँ बहती हैं।
बहरहाल, नैतिकता, शुचिता, शुद्धता और आदर्श की बात करने वाले लेखकों से भी सवाल करना चाहता हूँ कि यूरोप में पुनर्जागरण लेखक, चिंतकों के बल पर ही तो आया था। कभी वक्त मिले तो मोपासां को पढ़ लेना, नैतिकता के सारे सवाल हल हो जायेंगे। लेखक ख़ुद नए आदर्श बनाता है और वक्त के साथ उन्हें स्वीकार भी किया जाता है। दो कोडी के अनपढ़, बद-दिमाग पत्रकार उसकी मर्यादा तय नहीं कर सकते। क्या तोल्स्तोय को इसलिए खारिज कर दिया जाए कि उन्होंने अपनी नौकरानी से अवैध सम्बन्ध बनाए और एक औलाद भी पैदा कर दी। मुंशी प्रेमचंद के बारे में गोयनका आज तक ऐसी बकवास करते हैं, लेकिन प्रेमचंद की प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आई।
मुझे उम्मीद थी कि इस ख़ास ख़बर और सम्पादकीय का ज़बरदस्त असर होगा, भास्कर अपने जिला दफ्तरों में आदर्शवादी लेखकों को बुलाएगा और इस कथित सांस्कृतिक अपमान को लेकर आग उगलते बयान छपेंगे, कई तुक्कड़ कवि कवितायें लिखेंगे, जिन्हें शान से प्रकाशित किया जायेगा। लेकिन ऐसा नही हुआ, संघी पत्रकार तरुण विजय से विशेष लेख लिखवाया गया, अब वो तो संस्कृति की रक्षा के पुराने सिपाही हैं, सो उन्हें तो यही लिखना था। मैं पूछना चाहता हूँ तरुण विजय से कि जब अटल बिहारी वाजपेयी 'सदा-ऐ-सरहद' लेकर लाहौर गए थे, तो पाक-सीमा में उनका स्वागत पूरे सैन्य सम्मान से हुआ था, और पूरे देश ने टीवी पर देखा था, वाजपेयी जी के हाथ में शैम्पेन या बीयर का बड़ा सा ग्लास था। तब भारतीय संस्कृति क्या आराम करने चली गई थी भाई साहब?
कल शाम प्रख्यात पत्रकार तरुण तेजपाल ने भीड़ भरे लॉन में अपनी एक महिला मित्र का लिप-लोंक चुम्बन लिया, उस दृश्य को कैमरे में क़ैद करने के लिए कोई प्रेस फोटोग्राफर नहीं था। अब कल्पेश याग्निक, तरुण विजय और तमाम आदर्शवादी लोग क्या तरुण तेजपाल से भी इस बारे में सवाल करेंगे?

Saturday, 10 January 2009

लवलीन के ना रहने पर



हिन्दी साहित्य की अद्भुत कथाकार लवलीन नहीं रहीं। 6 जनवरी की सुबह उन्होंने जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल में अन्तिम साँस ली। लवलीन अभी पचास की भी नहीं हुई थी कि अपने दोस्तों में से अशोक शास्त्री, संजीव मिश्र, रघुनन्दन त्रिवेदी और कुमार अहस्कर जैसे दुनिया से जल्दी कूच कर जाने वाले मित्रों के बीच पहुँच गई। यह भी अजीब संयोग है कि संजीव मिश्र और रघुनन्दन त्रिवेदी की तरह लवलीन भी नया साल शुरू होते ही याने जनवरी में हमसे बिछुडी।
हिन्दी साहित्य में लवलीन 'हंस' में 'चक्रवात' कहानी से चर्चित हुई। लेकिन इस से पहले वह राजस्थान में एक जागरूक और साहसी महिला पत्रकार के रूप में खासी चर्चित हो चुकी थी। जब प्रभाष जोशी रूपकंवर काण्ड में सतीसमर्थकों के साथ खड़े थे लवलीन राजस्थान जैसे सामंती प्रदेश में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक यौद्धा पत्रकार की तरह लड़ रही थी। लवलीन के उस दौर की एक झलक आप उसकी किताब 'प्रेम के साथ पिटाई' में देख सकते हैं।
लवलीन ज़िन्दगी में पता नही कितने स्तरों पर लड़ती रही? अवसाद की बिमारी ने उसका पूरा घर छीन लिया॥ दो भाई अवसाद में भरी जवानी में चले गए। और वो ख़ुद इस अवसाद से लड़ती हुई लिखकर ही जीती रही... वह कहती थी लिखना मेरे लिए जीने का दूसरा नाम है, नहीं लिखूंगी तो मर जाउंगी मैं...
और उसने लिखा भी तो कितना सा? पहली किताब थी 'सलिल नागर कमीशन आया', जिस पर उसे पहला 'अंतरीप' सम्मान मिला, कहानियों की दूसरी किताब थी 'चक्रवात'। ज्ञानपीठ से आया उपन्यास 'स्वप्न ही रास्ता है', स्त्री विमर्श पर 'प्रेम के साथ पिटाई'। कहानियों की एक और किताब आने वाली है 'सुरंग पार की रौशनी'। एक उपन्यास उसने एक साल पहले पूरा कर लिया था लेकिन बीमारी की वज़ह से उसका आखिरी हिस्सा नहीं लिख पाई थी... आखिरी दिनों में वह अपनी आत्मकथा को उपन्यास का रूप दे रही थी। उसकी कविताओं की भी एक किताब आने वाली थी...
लिखने और जीने की अद्भुत जिजीविषा वाली हमारी इस लाडली लेखिका की 'नया ज्ञानोदय' में जो डायरी छपी है, उस से उसकी रचनात्मकता का अनुमान लगाया जा सकता है।

लेकिन अफ़सोस हिन्दी के सबसे बड़े कहे जाने वाले अखबार यानी 'दैनिक भास्कर' ने इस प्रतिभाशाली साहित्यकार-पत्रकार की मृत्यु की ख़बर को छापने लायक भी नहीं समझा। जो अखबार लेखकों से मुफ्त में 'विमर्श' करवाता है, उसे कम से कम किसी लेखक की मृत्यु को तो ख़बर समझना चाहिए... पी.टी.आई.ने दिन के दो बजे ख़बर जारी कर दी, दूरदर्शन, ई.टी.वी.ने ख़बर चला दी, लेकिन जयपुर में बैठे भास्कर के करता-धर्ताओं को प्रेस विज्ञप्ति भेजने के बावजूद लवलीन की मौत का कोई ग़म नहीं हुआ... भास्कर के नक्कारखाने में लवलीन जैसी लेखिका की मृत्यु की आवाज़ का भले ही कोई महत्त्व ना हो, लवलीन के दोस्त-पाठक उसे हमेशा याद करेंगे... तभी तो उसकी मृत्यु के तीसरे दिन उसकी श्रधांजलि सभा में सैकड़ों लोग आए, उन में हिन्दी के साहित्यकार, चित्रकार, पत्रकार ही नही सामाजिक कार्यकर्ता और संस्कृतिकर्मी भी शामिल थे। और यह श्रद्धांजलि सभा भी लवलीन के दोस्तों ने ही की...
लवलीन की स्मृति को शत-शत नमन..