शहीदो
मैं पूरे देश की ओर से
आपसे क्षमा चाहता हूँ
हमें माफ़ करना
हमारे भीतर आप जैसा
देश प्रेम का जज़्बा नहीं रहा
हमारे लिए देश
रगों में दौड़ने वाला लहू नहीं रहा
अंतराष्ट्रीय सीमाओं से आबद्ध
भूमि का एक टुकड़ा मात्र है देश
हमें माफ़ करना
हम भूल गये हैं
जन-गण-मन और
वंदे मातरम् का फ़र्क
नहीं जानते हम
किसने लिखा था कौनसा गीत
किसके लिए
हमें माफ़ करना
हमारे स्कूल-घर-दफ़्तरों में
आपकी तस्वीरों की जगह
संुदर द्दश्यावलियों
आधुनिक चित्रों और
फ़िल्मी चरित्रों ने ले ली है
हमें माफ़ करना
‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाते हुए
भले ही रुँध जाता होगा
लता मंगेशकर का गला
हमारी आँखों में तो कम्पन भी नहीं होता
हमें माफ़ करना
हम देशभक्ति के तराने
साल में सिर्फ़ दो बार सुनते हैं
हम पाँव पकड़कर क्षमा चाहतेे हैं
आपने जिन्हें विदेशी आक्रांता कहकर
भगा दिया था सात समुंदरों पार
उन्हीं के आगमन पर हमने
समुद्र से संसद तक
बिछा दिये हैं पलक-पाँवड़े
हमें माफ़ करना
हम परजीवी हो गये हैं
अपने पैरों पर खड़े रहने का
हमारे भीतर माद्दा नहीं रहा
हमारे घुटनों ने चूम ली है ज़मीन
और हाथ उठ गये हैं निराशा में आसमान की ओर
हमें माफ़ करना
आने वाली पीढ़ियों को
हम नहीं बता पायेंगे
बिस्मिल, भगतसिंह, अशफ़ाक़ उल्ला का नाम
हमें माफ़ करना
हमारे इरादे नेक नहीं हैं
हमें माफ़ करना
हम नहीं जानते
हम क्या कर रहे हैं
हमें माफ़ करना
हम यह देश
नहीं सँभाल पा रहे हैं
Tuesday, 23 March 2010
Sunday, 21 March 2010
विंदा हुए विदा...
भारतीय भाषाओं में ऐसे कवि कम ही हुए हैं, जिन्हे अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य और आम जनता के बीच खासी लोकप्रियता हासिल हो। विंदा करंदीकर ऐसे ही विरल रचनाकार थे, जिन्हें मराठी के अलावा हिंदी, अंग्रेजी और समस्त भारतीय भाषाओं में बेहद सम्मान मिला। विंदा के इस आदर की वजह है उनकी अद्भुत पठनीयता। आधुनिक भारतीय कविता में जितने प्रयोग विंदा करंदीकर ने किए, शायद ही किसी अन्य कवि ने किए हों। शब्द, शिल्प, शैली, बिंब, रूपविधान आदि तमाम चीजों को लेकर विंदा करंदीकर अत्यंत प्रयोगधर्मी होते हुए भी पाठक के लिए कभी दुर्बोध नहीं हुए, यह उनकी अद्भुत काव्यमेधा का ही कमाल है। और संभवतः इसके पीछे उनकी रचनाशीलता का वह दुर्लभ पक्ष छिपा है, जिसमें विंदा बाल कविताओं के महान रचनाकार के तौर पर सामने आते हैं। बच्चों के लिए लिखना बेहद मुश्किल होता है और विंदा इस विधा के उस्ताद थे। मानवीय संवेदनाओं से सराबोर विंदा की कविता आधुनिक भारतीय कविता की इसलिए भी अमूल्य धरोहर है कि उनकी कविता में भारतीय समाज, प्रकृति, मिथक, लोक जीवन और प्राणी जगत भी अपनी पूरी अर्थवत्ता और सौंदर्य के साथ नमूदार होता है। मात्रात्मक रूप से कम लेकिन उत्कृष्ट लेखन करने वाले विंदा करंदीकर ने कविता के अलावा आलोचना भी लिखी। उन्होंने अरस्तू के काव्यशास्त्र का मराठी में अनुवाद भी किया। विंदा करंदीकर ने मराठी के अलावा अंग्रेजी में भी कविताएं लिखीं। विंदा के विराट रचनाकार स्वरूप को ज्ञानपीठ, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, कबीर सम्मान, साहित्य अकादमी फेलोशिप, केशवसुत पुरस्कार आदि कई विशिष्ट सम्मानों से नवाजा गया। उनका निधन आधुनिक भारतीय कविता के लिए एक युग का समाप्त होना है। हिंदी में चंद्रकांत बांदिवडेकर ने उनकी अधिकांश कविताओं का अनुवाद किया है। मुझे उनकी कविता ‘झपताल’ बेहद पसंद है।
झपताल
पल्लू बाँध कर भोर जागती है...
तभी से झप. झप विचरती रहती हो
...कुर कुर करने वाले पालने में दो अंखियाँ खिलने लगती हैं
और फिर नन्ही. नन्ही मोदक मुट्ठी से
तुम्हारे स्तनों पर आता है गलफुल्लापन,
सादा पहन कर विचरती हो
तुम्हारे पोतने से
बूढ़ा चूल्हा फिर से एक बार लाल हो जाता है
और उसके बाद उगता सूर्य रस्सी पर लटकाए
तीन गंडतरों को सुखाने लगता है
इसीलिए तुम उसे चाहती हो!
बीच. बीच में तुम्हारे पैरों में
मेरे सपने बिल्ली की भाँति चुलबुलाते रहते हैं
उनकी गर्दनें चुटकी में पकड़ तुम उन्हें दूर करती हो
फिर भी चिड़िया . कौए के नाम से खिलाये खाने में
बचा .खुचा एकाध निवाला उन्हे भी मिलता है।
तुम घर भर में चक्कर काटती रहती हो
छोटी बड़ी चीजों में तुम्हारी परछाई रेंगती रहती है
...स्वागत के लिए सुहासिनी होती हो
परोसते समय यक्षिणी
खिलाते समय पक्षिणी
संचय करते समय संहिता
और भविष्य के लिए स्वप्नसती
गृहस्थी की दस फुटी खोली में
दिन की चौबीस मात्राएँ ठीकठाक बिठानेवाली तुम्हारी कीमिया
मुझे अभी तक समझ में नही आई।
Sunday, 14 March 2010
साहसी और प्रतिभावान लेखक: वोले शोयिंका
नाइजीरिया जैसे छोटे से देश को विश्व साहित्य में एकमात्र नोबल पुरस्कार दिलाने का श्रेय महान अश्वेत कवि, नाटककार और उपन्यासकार वोले शोयिंका को जाता है। शोयिंका पहले अश्वेत अफ्रीकी रचनाकार हैं, जिन्हें 1986 में नोबल पुरस्कार मिला। कई बार भारत आ चुके शोयिंका हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी आए थे। 13 जुलाई, 1934 को नाइजीरिया की योरूबा जनजाति के एक प्रतिष्ठित परिवार में वोले शोयिंका का जन्म हुआ। इनका परिवार आदिम जनजातीय परंपराओं और मिथकीय ज्ञान को सहेज कर रखने वाला परिवार था। बचपन से ही शोयिंका को अपनी इस पैतृक संपदा को गहराई से जानने-समझने का अवसर मिला, जो आगे चलकर उनके रचनाकर्म का एक विशिष्ट पक्ष बन गया। अश्वेत अफ्रीकी जनजातियों में लोकनाट्य, कला और संगीत की समृद्ध परंपरा रही है, जो भारतीय लोक परंपराओं की भांति लोकजीवन में अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम है। अभिव्यक्ति की इसी परंपरा ने शोयिंका को विशिष्ट बनाया। यही वजह है कि नाइजीरिया में कालेज में पढ़ाई के दौरान शोयिंका ने भ्रष्टाचार विरोधी और न्यायप्रिय छात्रों का एक संगठन बनाया और जनसंघर्ष की राजनीति में कूद पड़े। 1954 में वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। लीड्स विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करते हुए शोयिंका ने यूरोपीय साहित्य का विशद् अध्ययन किया। इसी बीच उन्होंने दो महत्वपूर्ण नाटक लिखे, ‘द स्वैम्प ड्वैलर्स’ और ‘द लायन एण्ड द ज्वैल’। दोनों ही नाटक लंदन में मंचित हुए और खासे मशहूर हुए। इन नाटकों में खुद शोयिंका नाटककार होने के साथ अभिनेता भी रहे।
शोयिंका के जन्म के समय नाइजीरिया एक ब्रिटिश उपनिवेश था। 1960 में वापसी के वक्त आजादी की फिजा में लौटे और अफ्रीकी नाटकों के अध्ययन में जुट गए। नौजवानों के लिए उन्होंने एक नाट्य संस्था का भी गठन किया और रंगमंच के अलावा, रेडियो, टेलीविजन के लिए भी लिखने लगे। वतन की आजादी को लेकर लिखा गया उनका नाटक ‘ए डांस आफ द फोरेस्ट’ बहुत मकबूल हुआ। 1962 में वे इफे विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के व्याख्याता नियुक्त हुए और 1965 में लागोस विश्वविद्यालय में वरिष्ठ व्याख्याता के रूप में अध्यापन करने लगे। इसी वर्ष एक नाइजीरियाई प्रांत के चुनावों में सरकार की धांधली को लेकर शोयिंका एक रेडियो स्टेशन पर बंदूक लेकर पहुंचे और विजयी नेता के भाषण की जगह अपनी तीखी प्रतिक्रिया प्रसारित की, जिसकी वजह से सरकार ने उस रेडियो स्टेशन को जब्त कर लिया। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और दो साल बाद रिहा किया गया। 1967 में गृहयुद्ध के दौरान शोयिंका को तानाशाह सरकार ने फिर से एकांत कारावास में डाल दिया, जहां से उन्हें 1969 में रिहाई मिली। जेल में शोयिंका ने टिश्यू पेपर पर कविताएं लिखीं। अपने जेल अनुभव उन्होंने ‘द मैन डाइड- प्रिजन नोट्स आफ वोले शोयिंका’ पुस्तक में प्रकाशित किए। वे सिर्फ नाइजीरियाई तानाशाही का ही नहीं, दुनिया की तमाम तानाशाह सरकारों का विरोध करते रहे हैं। इसी कारण उन पर समय-समय पर हमले भी होते रहे हैं। जनरल सानी अबाचा ने तो शोयिंका के लिए मौत का फरमान ही जारी कर दिया था। शोयिंका को मोटर साइकिल पर चोरी छिपे देश छोड़के भागना पड़ा। वे अमेरिका और कई देशों में गए और विश्व के नेताओं से मिलकर अपने देश को तानाशाही से मुक्ति दिलाने के लिए विमर्श करते रहे। उनके प्रयासों से ही नाइजीरिया में नागरिक प्रशासन की स्थापना हो सकी। वापसी में जनता ने उनका नायकों की तरह स्वागत किया।
उनकी रचनाओं में 1965 में प्रकाशित उपन्यास ‘द इंटरप्रेटर्स’ अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस उपन्यास में शोयिंका ने नाइजीरिया के दो शहरों इबाडान और लागोस के क्लबों में मिलने वाले बुद्धिजीवियों का वृतांत लिखा है, जो लगातार इस बात पर अपने-अपने ढंग से विचार करते हैं कि नाइजीरियाई वास्तविकता क्या है? इस जटिल उपन्यास को विश्वसाहित्य में जेम्स जायस और विलियम फाकनर के सृजन के समकक्ष माना जाता है। शोयिंका के नाटकों में अफ्रीकी लोक कला रूपों की प्रचुरता के साथ पश्चिमी व यूरोपीय आधुनिकता का गजब का संगम मिलता है। उनकी कविताओं में आदिम अफ्रीकी लोकविश्वास और मनुष्य के अंतर्संबंधों का बेहद खूबसूरत वर्णन मिलता है। उन्होंने पाश्चात्य साहित्य के अध्ययन से जो दृष्टि प्राप्त की, उसके माध्यम से उन्होंने अपनी योरूब जनजाति के देवताओं को नए रूप में देखते हुए विलक्षण कविताएं लिखीं। दुनिया भर में चल रहे जनसंघर्षों के प्रबल प्रवक्ता वोले शोयिंका ने नेल्सन मंडेला से लेकर आम आदमी तक के लिए सैंकडों कविताएं लिखी हैं, जिसने दुनिया भर के संघर्षरत लोग प्रेरित होते हैं और उनकी रचनाओं के माध्यम से अपने सतत संघर्षों को धार देते हैं। शोयिंका की कविताओं का एक पूरा संग्रह हिंदी के वरिष्ठ कवि वीरेंद्र कुमार बरनवाल ने करीब दो दशक पूर्व किया था, जिसे ज्ञानपीठ ने 'विश्व भारती' शृंखला में प्रकाशित किया था।
हिंदी में उनकी कविताओं का काफी अनुवाद हुआ है। वरिष्ठ कवि वीरेंद्र कुमार बरनवाल ने तो एक पूरा संग्रह ही शोयिंका की कविताओं का अनुवाद कर दिया, जिसे भारतीय ज्ञानपीठ ने ‘विष्व भारती’ शृंखला में दो दषक पहले प्रकाषित किया था। वोले शोयिंका आज भी निरंतर लिख रहे हैं, लेकिन संयोग से उनकी गद्य रचनाएं हिंदी में कम ही प्रकाषित हुई हैं।
यह आलेख संपादित रूप में राजस्थान पत्रिका के रविवारीय संस्करण में 14 मार्च, 2010 को प्रकाशित हुआ।
Monday, 8 March 2010
मख्मूर साहब के बिना
उर्दू के मशहूर शाइर मख्मूर सईदी साहब का पिछले दिनों यानी 2 मार्च, 2010 को जयपुर में निधन हो गया। 31 दिसंबर, 1934 को टोंक में जन्मे मख्मूर साहब ने उर्दू शायरी में राजस्थान का परचम इस बुलंदी के साथ फहराया कि इस रेगिस्तानी सरजमीं की तमाम रंगतें उनकी शायरी में नुमायां हो गईं। टोंक के अदबी घराने से आपका शेरी सफर शुरु हुआ और हिंदुस्तान-पाकिस्तान ही नहीं दुनिया के तमाम उर्दू जुबां के मुरीद मुल्कों में अपनी सादाबयानी और दिलकश जज्बात की वजह से नई बुलंदियों पे पहुंचा। उनकी शायरी में उर्दू अदब की क्लासिकल, तरक्कीपसंद और जदीदियत तीनों दौर की शायरी के रंग मिलते हैं। मखमूर साहब हर दौर की शायरी से वाबस्ता रहे लेकिन अपने उपर किसी किस्म का ठप्पा नहीं लगने दिया और हर दौर की बेहतरीन चीजों का वे अपनी शायरी में इस्तेमाल करते हुए अपनी बात जुदा ढंग से कहते रहे। वे उस जदीदियत से दूर रहे जिसमें आम-अवाम के रंजो-गम की बात नहीं होती, लेकिन उनकी जदीद शायरी में कुदरत की खूबसूरती और इंसानियत के तमामतर रंगो-बू भी शामिल है। जब उर्दू शायरी में लोगों ने रूबाई कहना लगभग छोड़ दिया, मख्मूर साहब ने एक मरती हुई विधा को बचाने के लिए रूबाई को नई पहचान दी। वे सिर्फ ग़ज़ल के ही शायर नहीं थे, उन्होंने बड़ी तादाद में बेहतरीन नज्में भी कहीं। उर्दू आलोचना में भी उनका बड़ा योगदान है और उर्दू की साहित्यिक पत्रकारिता में भी उन्होंने नए आयाम स्थापित किए। यूं उनके हजारों शेरों में से सैंकड़ों शेर ऐसे हैं जो लंबे समय तक लोगों की जुबान पर गूंजते रहेंगे, लेकिन मुझे लगता है कि भविष्य में उनका यह शेर आज के दौर को देखते हुए हमेशा मौजूं बना रहेगा,
इतनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियां
घर कहीं गुम हो गया, दीवारो दर के दरमियां।
यह बहुत दुखद है कि जब मख्मूर साहब अपनी शायरी के उरूज पे थे, जब हिंदुस्तानी उर्दू अदब ने साहित्य एकेडमी और ग़ालिब अवार्ड से उनकी शायरी का एहतराम किया, कुदरत ने उन्हें हमसे छीन लिया। पेश हैं उनकी नायाब शायरी से चुनिंदा शेर-
खेल समझा न तेरे प्यार को हम ने वरना ,
हम कोई खेल जो खेले हैं तो हारे कम हैं.
सबसे झुक कर मिलना अपनी आदत है,
कद अपना हम सबके बराबर रखते हैं.
सिर्फ एक ख्वाब था मैं अपने ज़माने के लिए,
जिस ने पाया है मुझे उस ने गंवाया है मुझे.
अपने ख्वाब पलकों से झटक दो
मुकद्दर खुश्क पत्तों का है शाखों से जुदा होना
अजाब क्या है मखमूर तुम पर यूं रिसे गम है
हवाओं की तो आदत है चरागों से खफा रहना.
हमारे बाद की नस्लें उतारे
सुखन का कर्ज़ जो हम पर रहा है
Sunday, 28 February 2010
साहित्यकारों के विनोद प्रसंग
हिंदी ही क्या समस्त भाषाओं में साहित्यकारों के जीवन में बहुत से विनोद प्रसंग जुड़े रहते हैं। इन प्रसंगों से गंभीर दिखने वाले रचनाकारों की एक सहज और आत्मीय छवि बनती है। हिंदी साहित्य की ऐतिहासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में कीर्तिशेष संपादक स्व. श्रीनारायण चतुर्वेदी ने महान साहित्यकारों के ऐसे रोचक और मनोरंजक संस्मरणों की एक पूरी शृंखला प्रकाशित की थी। उर्दू साहित्य में इसकी पुरानी परंपरा रही है और इसी वजह से उर्दू के महान रचनाकारों के बारे में आम जनता में भी बहुत से लतीफे प्रचलित हैं। मीर, गालिब के शेरों से सामान्य व्यक्ति भी परिचित है और उनके रोचक प्रसंगों से भी। होली के अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ ऐसे ही रोचक एवं मनोरंजक संस्मरण।
दरबार में कविता
मलिक मुहम्मद जायसी बेहद कुरूप थे। एक बार वे अमेठी के काव्य-प्रेमी राजा के दरबार में पहुंचे तो राजा समेत दरबार में उपस्थित तमाम लोग उन्हें देखकर बुरी तरह हंसने लगे। जायसी ने अपने सुमधुर कण्ठ से बस एक अर्द्धाली सुनाई और सबको निरुत्तर कर दिया, ‘मोहि कां हंससि कि कोंहरहिं।’ अर्थात् मुझ पर हंस रहे हो या बनाने वाले ईश्वर रूपी कुम्हार पर। कवि और राजा के बीच ऐसे ही एक संवाद का प्रसंग जयपुर के राजा मानसिंह प्रथम के काल का है। महाकवि बिहारी के भांजे लोकनाथ चौबे भी जयपुर दरबार के कवि थे। चौबेजी को महाराज कहा ही जाता है। तो एक बार चौबेजी गांव गए हुए थे। वहां उन्हें रुपयों की आवश्यकता हुई तो उन्होंने स्थानीय सेठ को राजा के नाम एक हजार की हुण्डी लिखकर दे दी, साथ में एक प्रशस्ति का छंद भी लिखकर दे दिया। राजा मानसिंह ने हुण्डी तो स्वीकार कर ली, लेकिन जवाब में एक दोहा भी लिख भेजा,
इतमें हम महाराज हैं, उतमें तुम महाराज।
हुण्डी करी हजार की नेक ना आई लाज।।
आलोचक की व्यंग्योक्ति
एक बार आचार्य रामचंद्र शुक्ल और लाला भगवानदीन बाजार में एक शरबत की दुकान पर पहुंचे। दुकानदार ने वहां नए जमाने के हिसाब से महिलाओं को परिचारिका रखा हुआ था। जब दोनों ने शरबत पी लिया तो लालाजी ने पूछा, ‘कितना दाम हुआ?’ परिचारिका ने मुस्कुराते हुए जब दाम दस आने बताया तो तीन गुना दाम सुनकर लालाजी विचलित हुए। उन्होंने आचार्यजी की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो आचार्य जी अपनी सनातन गंभीर मुद्रा में बने रहे और बोले, ‘दे दीजिए दस आने, इसमें शरबते-दीदार की कीमत भी शामिल है।’ इसी प्रकार एक बार एक अध्यापक शुक्लजी के पास आए और स्कूली पाठ्यक्रम में लगी हुर्ह एक कविता ‘चीरहरण’ को निकालने की मांग करने लगे। उन्होंने कहा, ‘यह कविता एकदम निकाल देनी चाहिए। भला आप ही बतलाइये, इसे बालकों को कैसे पढ़ाया जाएगा?’ शुक्लजी ने शांत भाव से कहा, ‘परेशान क्यों होते हैं? कह दीजिएगा कि कृष्णजी स्काउटिंग करने गए थे।’
राष्ट्रकवि और द्राक्षासव
एक बार राष्ट्रकवि मैथिलीषरण गुप्त अपने दिल्ली आवास से बाहर गए हुए थे। पीछे से राय कृष्णदास आए और साथ में द्राक्षासव की एक बोतल भी ले आए। जब तक राय साहब रहे गुप्तजी बाहर थे। राय साहब जाते वक्त खाली बोतल मेज पर छोड़ गए। गुप्तजी लौटे तो बोतल देखकर मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने बोतल उठाई तो खाली बोतल पाकर निराश हो गए। क्रोध में गुप्तजी ने एक कविता लिख डाली-
कृष्णदास! यह करतूत किस क्रूर की?
आए थके हारे हम यात्रा कर दूर की।
द्राक्षासव तो न मिला, बोतल ही रीती थी!
जानते हमीं हैं तब हम पर जो बीती थी!
ऐसी घड़ी भी हा! पड़ी उस दिन देखनी-
धार बिना जैसे असि, मसि बिना लेखनी!
बैरंग डाक का दोहा
डाकघर में बैरंग चिट्ठियों पर आधी गोल मुहर लगाई जाती है और दोगुना डाक-व्यय वसूल किया जाता है। एक अज्ञात कवि ने इस पर एक अद्भुत दोहा लिखा है-
आधी मुहर लगाय कें, मांगत दूने दाम।
याही सों इन जनन को, पड़्यो ‘डाकिया’ नाम।।
निराला की मस्ती
महाकवि निराला को अक्सर किसी चीज की धुन चढ़ जाती तो वे उसी में डूबे रहते। मृत्यु से पूर्व एक बार उन्हें अंग्रेजी काव्य की धुन सवार हो गई तो उन्होंने तमाम अंग्रेज कवियों को पढ़ डाला। मिल्टन और शेक्सपीयर उन्हें खास तौर पर पसंद थे और अक्सर कहते थे कि कविता में इन दोनों को कौन पछाड़ सकता है। एक बार होली के दिन सुबह से ही निराला जी विजया के रंग में थे और मौन धारण कर रखा था। आने वाले लोग उनका मौन देखकर चले गए। बस गिनती के लोग रह गए। किसी ने निराला जी से कहा कि होली का दिन है पंडितजी, इस वक्त तो कोई होली होनी चाहिए। निराला जी को होली गाने की धुन सवार हो गई तो लगे होली गाने। उस दिन करीब ढाई-तीन घण्टे तक निराला जी होली गाते रहे। जब गाते-गाते मन भर गया तो कुछ देर चुप रहने के बाद बोले, ‘बस यहीं-हिंदी की इन होलियों में -मिल्टन और शेक्सपीयर हिंदी से मात खा जाते हैं!’
हिंदी से हिंदी अनुवाद
बहुत से लेखकों की भाषा अत्यंत क्लिष्ट होती है। सौंदर्यशास्त्र के विद्वान लेखक रमेश कुंतल मेघ भी ऐसे ही रचनाकारों में हैं। एक किस्सा उनके बारे में प्रचलित है। हुआ यह कि एक बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और रमेश कुंतल मेघ का आमना-सामना हो गया। औपचारिक बातचीत के बाद मस्तमौला द्विवेदी जी ने कहा, ‘डॉ. साहब अब तो आपकी किताबों का भी हिंदी अनुवाद आ जाना चाहिए।’
कुछ चुटकुले-कुछ जातक कथाएं
हिंदी साहित्य में एक समय ‘धर्मयुग’ ने साहित्यकारों के बारे में कुछ चुटकुलानुमा प्रहसन प्रकाशित किए थे। उनमें से एक महान आलोचक डॉ. नामवर सिंह के बारे में था। दिल्ली में सड़कों पर नई-नई ट्रेफिक लाइटें लगी ही थीं। एक व्यक्ति लाईट के साथ अपनी दिशा बदल लेता था। कभी दांए तो कभी बांए मुड़ जाता था। ट्रेफिक पुलिस के सिपाही ने उसकी गतिविधि को देखकर कहा, ‘ऐ धोती वाले बाबा, तुम कभी दांए तो कभी बांए क्यों जाते हो?’ वहीं दो लेखक भी पास में खड़े थे। दोनों ने एक साथ कहा, ‘यह पुलिसवाला नामवर जी की आलोचना को कितनी अच्छी तरह से समझता है।’
एक समय हिंदी में लेखकों को लेकर बहुत सी जातक कथाओं की रचना की गई थी। प्रसिद्व कवि राजेश जोशी ने ऐसी ही कुछ जातक कथाएं सुनाई। एक गरीब किसान को खेत में खुदाई करते हुए एक बड़ा-सा टब मिला। उसने माथा पीट लिया कि निकलना ही था तो कोई खजाना निकलना चाहिए था। उसने झल्लाइट में एक गाजर टब में फेंक दी। टब में गिरते ही गाजर एक से दो हो गई। किसान ने दो गाजर फेंकी तो चार हो गईं। वह जो भी चीज टब में डालता वो दोगुनी हो जाती। जमींदार को इसका पता चला तो उसने टब अपने घर मंगवा लिया, क्योंकि जमीन तो उसी की थी, जिसमें टब निकला। इसके कुछ ही दिन बाद देश में राजनैतिक संकट खड़ा हो गया। सरकार ने लोगों का ध्यान बंटाने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृति महोत्सव जैसे आयोजन शुरु करने का फैसला किया। संस्कृति से जुड़े लोगों की खोज की जाने लगी, लेकिन सरकार के पास ऐसे लोगों की बहुत कमी थी। ऐसे में सरकार को किसी ने उस टब को उपयोग में लेने की सलाह दी। सरकार ने उस टब की मदद से एक अशोक वाजपेयी जैसे कई अशोक वाजपेयी बना डाले और सबको विभिन्न सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों में नियुक्तियां दे दीं।
अशोक वाजपेयी को लेकर एक और जातक कथा प्रचलित है। हुआ यह कि एक बार एक संन्यासी भारत भवन नामक गुफा में अपने शिष्यों सहित आकर ठहरा। उसने देखा कि खूंटी पर टंगे थैले से रोज रोटियां गायब हो जाती हैं। एक दिन संन्यासी नींद का बहाना कर जागता रहा। उसने देखा कि एक चूहा अपने बिल से निकल कर सीधा छलांग लगा कर खूंटी पर टंगे थैले से रोटियां निकाल कर वापस बिल में चला जाता है। अगले दिन संन्यासी ने शिष्यों को बुलाकर बिल खुदवाया तो वहां राष्ट्रीय खजाना गड़ा हुआ था। संन्यासी ने वहां से खजाना खाली करा दिया। अबकी बार चूहा आया तो संन्यासी ने देखा कि वह छलांग नहीं लगा पा रहा है और सिर्फ एक-आध इंच ही उछल पा रहा है। संन्यासी ने अपने शिष्यों को बुलाकर समझाया कि चूहा राष्ट्रीय खजाने के प्रताप से ही लंबी छलांगें लगा रहा था।
हिंदी के पितामह का एक चुटकुला
भारतेंदु हरिश्चंद्र अपनी पत्रिका ‘श्रीहरिश्चंद्र चंद्रिका’ में चुटकुले प्रकाशित किया करते थे। प्रस्तुत है उस जमाने की भाषा में एक चुटकुला-
एक नवयौवना सुंदरी चतुर चरफरी वसंत ऋतु में अपनी बहनेली के यहां गई और कुछ इधर उधर की मन लगन की बातें कर रही थी कि प्यासी हुई और पानी मांगा। इसकी उस मुंहबोली बहन ने कोरे कुल्हड़े में पानी भरकर ला दिया जो इसने मुह लगाकर पिया तो कुल्हड़ा होठों से लग रहा। वह खिखिलाकर हंसी और इस दोहे को पढ़ने लगीः
रे माटी के कुल्हड़ा, तोहे डारों पटकाय।
होंठ रखे हैं पीउ, तू क्यों चूसे जाय।।
यह सुन उसकी बहनेली ने कुल्हड़े की ओर से उत्तर दियाः
लात सही मूंकी सही उलटे सहे कुदार।
इन होठन के कारने सिर पर धरे अंगार।।
और अंत में निराला जी की एक होली
नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरी खेली होली !
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक वसन रह गई मंद हँस अधर-दशन अनबोली
कली-सी काँटे की तोली !
मधु-ऋतु-रात मधुर अधरों की पी मधु सुधबुध खो ली,
खुले अलक मुंद गए पलक-दल श्रम-सुख की हद हो ली--
बनी रति की छवि भोली!
इनमें से चुनिंदा प्रसंग राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में 28 फरवरी, 2010 को प्रकाशित।
और अंत में निराला जी की एक होली
नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरी खेली होली !
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक वसन रह गई मंद हँस अधर-दशन अनबोली
कली-सी काँटे की तोली !
मधु-ऋतु-रात मधुर अधरों की पी मधु सुधबुध खो ली,
खुले अलक मुंद गए पलक-दल श्रम-सुख की हद हो ली--
बनी रति की छवि भोली!
इनमें से चुनिंदा प्रसंग राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में 28 फरवरी, 2010 को प्रकाशित।
Sunday, 21 February 2010
आधुनिक अरबी का महान रचनाकार - नजीब महफूज
अरबी साहित्य के इतिहास में पहला और अब तक का अंतिम नोबल पुरस्कार मिस्त्र के नजीब महफूज को 1988 में मिला। लेकिन नजीब इस पुरस्कार से तीन दशक पहले ही अरबी भाषा के इतिहास में वो मुकाम बना चुके थे, जिसमें वे बाल्जाक, तोलस्तोय और चार्ल्स डिकेंस के समकक्ष नजर आते हैं। उनके उपन्यासों को लेकर माना जाता है कि आधुनिक अरबी में उपन्यास विधा की शुरूआत संभवत उन्होंने ही की है। उनके उपन्यासों पर अरबी में अनेक चर्चित फिल्मों का निर्माण हुआ है और उन्हें आधुनिक अरबी साहित्य का विश्व में सर्वश्रेष्ठ लेखक माना जाता है। हालांकि बाहरी विश्व में उनको नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद ही पहचाना गया और दुनिया की कई भाषाओं में उनकी कृतियों का अनुवाद हुआ। नोबेल पुरस्कार मिलने की कई वजहों में से एक यह भी रही कि नजीब महफूज ने इस्लामिक जगत में सलमान रूश्दी के खिलाफ दिए गए फतवे की जबर्दस्त भर्त्सना की और 'सैटेनिक वर्सेज' के लिए रूश्दी की भी कडी आलोचना की। यद्यपि इसी कारण से उनकी कई कृतियों को मध्य-पूर्व के कई देशों में प्रतिबंधित भी कर दिया गया और उन पर जानलेवा हमले भी हुए। लेकिन इस साहसी लेखक ने अविचलित रहते हुए कट्टरपंथियों के आगे कभी घुटने नहीं टेके।
11 दिसंबर, 1911 को कैरो के एक उपनगर में निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्में नजीब सात भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। बचपन में मां ने खूब पढने और संग्रहालय दिखाने के बहाने इतिहास से परिचय कराने का जो सिलसिला चलाया वह आगे चलकर साहित्य के संस्कारों में परिणत हुआ। प्रारंभिक शिक्षा के बाद दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर करने पर पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए नजीब महफूज भी प्रशासनिक सेवा में चले गए। इस बीच उन्होंने ढेरों किताबें लिखीं, जिनमें उपन्यास, कहानियां, संस्मरण, इतिहास, वृतांत आदि शामिल हैं। नगीब अखबारों के लिए नियमित स्तंभ लिखते थे और उनके कई उपन्यास अखबारों में धारावाहिक प्रकाशित हुए। उन्होंने अनेक फिल्मों की पटकथा और कहानियां लिखीं, जो खासी प्रसिद्ध हुई। नजीब महफूज चाहते थे कि वे मिस्त्र का आधुनिक इतिहास उपन्यासों के रूप में लिखें, इसलिए प्रारंभ में उन्होंने 30 उपन्यासों की शृंखला पर काम करते हुए तीन उपन्यास लिखे, लेकिन बाद में इस परियोजना को बदल कर खुद को इतिहास के बजाय वर्तमान पर केंद्रित कर लिया। इस क्रम में उन्होंने एक उपन्यास त्रयी लिखी जो बेहद मशहूर हुई। इस त्रयी में नजीब ने 'पैलेस वाक', 'पैलेस ऑफ डिजायर' और 'शुगर स्ट्रीट' उपन्यास लिखे। इन उपन्यासों में प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर 1950 तक तीन पीढियों का जीवंत इतिहास था। इस बीच सत्ता परिवर्तन से विचलित नगीब ने अपनी रचनाएं प्रकाशित करना बंद कर दिया और सात साल बाद प्रकाशन की दुनिया में वापस लौटै। इसके बाद उन्होंने 'चिटचैट ऑन द नील' उपन्यास लिखा, जो काफी लोकप्रिय हुआ । इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्म के विविध पक्षों की कडी आलोचना करने वाले उपन्यास 'चिल्ड्रेन ऑफ अवर ऎली' को सिवाय लेबनान के समूचे अरब जगत में प्रतिबंधित कर दिया गया और आरोप में कहा गया कि नजीब ने इन धर्मो का कथित तौर पर अपमान किया है। नजीब महफूज ने अपने बाद के तमाम उपन्यास और कहानियों के केंद्र में धर्म की पारंपरिक व्याख्या और आधुनिक विचारों को एक मंच पर लाने का प्रयास करते हुए यह सोच रखी है कि आधुनिक विचारों के साथ सामंजस्य बिठाए बिना किसी भी धार्मिक विश्वास को आगे ले जाना मुश्किल है। जब मिस्त्र ने इजराइल से अमरीका की साक्षी में कैंप डेविड शांति संधि पर हस्ताक्षर किए तो नजीब पहले लेखक थे, जिन्होंने उस संधि का समर्थन किया और पूरी अरब दुनिया से दुश्मनी मोल ली। इस वजह से उनकी किताबों को प्रतिबंध का भी सामना करना पडा, लेकिन वे इस सबसे बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए।
मिस्त्र के बाल्जाक कहे जाने वाले नजीब महफूज ने हालांकि कभी मिस्त्र के बाहर की दुनिया नहीं देखी, लेकिन उनकी रचनाओं में आने वाले विचार बताते हैं कि वे कितनी बडी और महान वैश्विक सोच के लेखक हैं। उनकी रचनाओं में दुनिया के श्रेष्ठतम विचार समाहित हैं और यूरोपीय और आधुनिकतावादी विचारों से उनका साहित्य लबरेज है। अपने दृढ विचारों के कारण नजीब महफूज हमेशा अतिवादियों की हिटलिस्ट में रहे, लेकिन उन्होंने अपनी वैचारिक दृढता में कभी कमी नहीं आने दी। 30 अगस्त, 2006 को नजीब महफूज ने अंतिम सांस ली।
राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में 21 फरवरी, 2010 को 'विश्व के साहित्यकार' स्तंभ में प्रकाशित।
राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में 21 फरवरी, 2010 को 'विश्व के साहित्यकार' स्तंभ में प्रकाशित।
Monday, 15 February 2010
कोई सरहद ना इसे रोके...
प्राय: सभी देशों में पुरूष-स्त्री से एकनिष्ठ प्रेम की मांग करते हैं किंतु मौका मिलने पर विवाहेत्तर संबंधों से गुरेज नहीं करते और स्त्री ऎसा कर ले, तो झट से तलाक दे देते हैं। किंतु आधुनिक विचारों ने अब महिलाओं को जन्म-जन्मांतर की कैद वाले दकियानूसी विचारों से निजात दिला दी है।
शिक्षा, तकनीक और वैश्वीकरण ने जिस प्रकार पूरी दुनिया को "विश्व ग्राम" में बदल दिया है, उसमें अब देशों की सीमाएं समाप्त हो रही हैं और स्त्री-पुरूष संबंधों की एक नई और वैश्विक प्रेम की दुनिया विकसित हो रही हैं। धर्म, जाति, समाज, गांव, शहर, गोत्र, भाषा और प्रांत से युगों आगे बढ़कर प्रेम की दुनिया तमाम बंधनों से आगे चली आई है और दुनिया के हर हिस्से में व्यापक होती जा रही है। इस नई वैश्विक दुनिया को बनाने में सबसे बड़ा योगदान आधुनिक शिक्षा का है, जिसने लोगों के दिलों में यह बात बहुत गहरे से पैबस्त कर दी है कि मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद नहीं होता और जहां दिल मिले वहीं प्रेम और विवाह करना चाहिए। इस विचार को पहले औद्योगिक क्रांति के दौर में यूरोप-अमेरिका में मान्यता मिली और नस्ल व जाति के भेद खत्म हुए तो सही मायने में एक समतावादी समाज विकसित करने के लिए लोगों ने प्रेम को विवाह में परिणत करना शुरू किया। हालांकि पश्चिम में विवाह और संतानोत्पत्ति के बीच लंबे समय से कोई संबंध नहीं माना जाता रहा है, क्योंकि वहां एकल मातृत्व को भी सहज रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। पश्चिमी समाज स्त्री-पुरूष संबंधों के मामले में बेहद खुला समाज है और भारतीय उपमहाद्वीप जैसे देशों के बंद समाजों के बाशिंदों को वह संभवत: इसी वजह से आकर्षित भी करता है। इसी के साथ एक सच यह भी है कि पश्चिमी समाज भारतीय उपमहाद्वीप की वैवाहिक परंपराओं और लंबे गृहस्थ जीवन के आदर्श का आदर करते हुए अनुकरणीय मानता है। तकनीक के इस युग में लगभग हर देश में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रेम संबंध विकसित हो रहे हैं और विवाह की वेदी तक पहुंच रहे हैं।
दूरसंचार के क्षेत्र में इंटरनेट-क्रांति ने दुनिया भर के लोगों को एक-दूसरे के नजदीक ला दिया है। ई-मेल, नेटवर्किंग साइट्स और चैटिंग की सुविधा ने लोगों को इस कदर परस्पर एक कर दिया है कि अपनी पसंद का साथी दुनिया के किसी भी कोने से चुना जा सकता है। उससे बातचीत कर एक-दूसरे को गहराई से जाना जा सकता है और उचित लगे, तो प्रेम और विवाह भी किया जा सकता है। इंटरनेट पर बहुत से मैरिज-ब्यूरो संचालित हो रहे हैं, जहां किसी भी देश से वर-वधू का चुनाव किया जा सकता है। आज के वैश्वीकरण के माहौल में युवा वर्ग उच्च शिक्षा के लिए दुनिया के विभिन्न देशों में जाते हैं। फिर वहीं रोजगार भी प्राप्त कर लेते हैं। अकेले युवक-युवतियों की सहपाठी और सहकर्मियों से मित्रता होती है, और ये मैत्रियां कई मामलों में प्रेम और विवाह में परिणत हो जाती हैं। हिंदी के प्रसिद्ध कवि-साहित्यकार अनिल जनविजय स्कॉलरशिप पर मास्को गए, वहीं नौकरी मिल गई, तो सहपाठी रूसी कन्या से प्रेम हुआ, जो अंतत: विवाह तक पहुंचा। ऎसे हजारों उदाहरण भारतीय युवक-युवतियों के मिल जाएंगे। एक समय ऎसा भी था, जब इस प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय विवाह सिर्फ शाही खानदानों में ही हुआ करते थे, जो कि प्रेम-विवाह कम राजनैतिक और कूटनीतिक विवाह अघिक हुआ करते थे।
साम्यवादी व्यवस्था के पतन के बाद रूस में जिस प्रकार भयानक आर्थिक कंगाली आई, उससे सबसे ज्यादा रूसी महिलाएं प्रभावित हुईं। रूसी महिलाएं ही क्या, दुनिया के लगभग तमाम देशों की महिलाएं आजन्म वैवाहिक संबंधों को तरजीह देती हैं, किंतु आधुनिक विचारों ने अब महिलाओं को जन्म-जन्मांतर की कैद वाले विचारों से निजात दिला दी है। एक रूसी महिला ईव के अनुसार वह भी अपनी मां की तरह आजन्म विवाह का रिश्ता चाहती थी, किंतु उसे अपने क्रूर पिता जैसा पति नहीं चाहिए था। ईव की निगाह में विवाह एक स्थायी प्रेम संबंध कायम करने का नाम है। इसके लिए उसने दुनिया भर में इंटरनेट के माध्यम से अपने लिए उपयुक्त वर की तलाश की। ईव जैसी लाखों-करोड़ों महिलाएं हैं, जिन्हें अपने लिए उपयुक्त वर के स्थान पर स्थायी प्रेमी की तलाश है, जिसकी परिणति लोक-कथाओं और किंवदंतियों के प्रेमी जैसी त्रासदीपूर्ण ना हो। रूसी स्त्रियां अंतर्राष्ट्रीय विवाह करने में पहले स्थान पर हैं।
चीन में एक संतान के प्रतिबंध के कारण लोग कन्याओं को गर्भ में मार डालते हैं, इसलिए वहां लिंगानुपात भयानक रूप से गड़बड़ा गया है और मांग उठने लगी है कि चीनियों को विदेशी नागरिकों से विवाह की अनुमति दी जानी चाहिए। यही हाल जापान का है, जहां पुरूष अत्यघिक काम करने और शराबनोशी की वजह से परिवार की तरफ ध्यान नहीं देते, इसलिए जापानी युवतियां विदेशी पुरूषों से विवाह करने को प्राथमिकता देती हैं। इसी वजह से जापानी पुरूषों में भी विदेशी युवतियों से विवाह करने की दर तेजी से बढी है। दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, थाईलैंड और वियतनाम में भी विदेशी विवाहों में पिछले एक दशक में जबर्दस्त वृद्धि दर्ज की गई है।
अमेरिका जैसे देश में श्वेत-अश्वेत के बीच विवाह संबंध अत्यंत सामान्य बात है और अमेरिकन स्त्री-पुरूष दुनिया के विभिन्न देशों के नागरिकों से विवाह कर रहे हैं। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के हजारों युवक-युवतियां अमेरिकियों से विवाह कर रहे हैं। पश्चिमी समाज में विवाह प्रेम को स्थायित्व देने के लिए किया जाता है, जबकि पूर्वी देशों में जीवन के स्थायित्व के लिए विवाह किया जाता है। एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में 52 प्रतिशत चीनियों ने यह राय जाहिर की। यूरोप के विभिन्न देशों के नागरिकों में आपस में प्रेम और विवाह करने की प्रवृत्ति यूरोपियन यूनियन बनने के बाद बढ़ गई है।
अंतर्राष्ट्रीय विवाह में बहुत से देशों में कानूनी दिक्कतें पेश आती हैं। अगर कानूनी बाधाओं से पार पा भी लिया जाए, तो सांस्कृतिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। धार्मिक और नैतिक संस्कार ऎसे विवाहों में आगे चलकर बहुत कटु वातावरण को जन्म दे सकते हैं। यह देखा गया है कि प्राय: सभी देशों में पुरूष-स्त्री से एकनिष्ठ प्रेम की मांग करते हैं किंतु मौका मिलने पर विवाहेत्तर संबंधों से गुरेज नहीं करते और स्त्री ऎसा कर ले, तो झट से तलाक दे देते हैं। जिन देशों में धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें हावी रहती हैं, वहां के नागरिकों से प्रेम और विवाह भारी मुसीबतें खड़ी कर सकता है।
ग्लोबल हुए संत वेलेंटाइन
प्रेम के संत वेलेंटाइन भी ग्लोबल संत हो गए हैं। बाजार की आपाधापी में संत वेलेंटाइन का मानवतावादी प्रेम का संदेश कहीं पीछे चला गया है और मॉल संस्कृति हावी हो गई है। लेकिन इसी बाजार ने मनुष्य-मनुष्य के बीच सहयोग, सद्भावना और मानवीय प्रेम के एक नये संसार की असंख्य खिड़कियां खोल दी हैं, जहां लोग तमाम दकियानूसियों को दरकिनार करते हुए "विश्व ग्राम" में प्रेम की अपनी चाहतों के गुलशन खिला सकते हैं और दुनिया को सही मायनों में एक प्यार भरी दुनिया बना सकते हैं। इस नई दुनिया में पुरानी दुश्मनियां नहीं होंगी और अतीत की शत्रुताओं को प्रेम के बाणों से बींधकर एक नया इतिहास लिखने की कोशिशें की जाएंगी। आमीन!!!
डेली न्यूज़, जयपुर के रविवारीय परिशिष्ट 'हम लोग' में रविवार, 14 फरवरी, 2010 के 'प्रेम अंक' में प्रकाशित।
डेली न्यूज़, जयपुर के रविवारीय परिशिष्ट 'हम लोग' में रविवार, 14 फरवरी, 2010 के 'प्रेम अंक' में प्रकाशित।
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