Sunday, 6 February 2011

बसंत और उल्‍काएं

तीन बाई दो की उस पथरीली बेंच पर

तुमने बैठते ही पूछा था कि

बसन्त से पहले झड़े हुए पत्तों का

उल्काओं से क्या रिश्ता है

पसोपेश में पड़ गया था मैं यह सोचकर कि

उल्काएँ कौनसे बसंत के पहले गिरती हैं कि

पृथ्वी के अलावा सृष्टि में और कहाँ आता है बसन्त

चंद्रमा से पूछा मैंने तो उसने कहा

‘मैं तो ख़ुद रोज़-रोज़ झड़ता हूँ

मेरे यहाँ हर दूसरे पखवाड़े बसन्त आता है

लेकिन उल्काओं के बारे में नहीं जानता मैं’

पृथ्वी ने भी ऐसा ही जवाब दिया

‘मैं तो ख़ुद एक टूटे हुए तारे की कड़ी हूँ

उल्काओं के बारे में तो जानती हूँ मैं

लेकिन बसंत से उनका रिश्ता मुझे पता नहीं’

एक गिरती हुई उल्का ने ही

तुम्हारे सवाल का जवाब दिया

‘ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है और ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र उसकी शाखाएँ हैं

हम जैसे छोटे सितारे उसके पत्ते हैं

पृथ्वी पर जब बसन्त आता है तो

हम देखने चले आते हैं

झड़े हुए पत्ते हमारे पिछले बरस के दोस्त हैं’



आओ हम दोनों मिलकर

इस बसंत में आयी हुई उल्काओं का स्वागत करें

Tuesday, 1 February 2011

गुलाबी नगरी में लेखकों का मेला

जयपुर में साहित्य का महाकुंभ इस बार छठे वर्ष में प्रवेश कर भारतीय ही नहीं वैश्विक क्षितिज पर एक नई पहचान छोड़ गया, जिसमें साल दर साल पर्यटन नगरी जयपुर की पहचान साहित्य और संस्कृति के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में बनती दिखाई देती है। 21 जनवरी, 2011 की सुबह पारंपरिक वाद्य यंत्रों के तुमुल नाद के साथ आरंभ हुए लिटरेचर फेस्टिवल का आगाज मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत, विद्वान राजनेता डा. कर्ण सिंह और संस्कृत के अमेरिकी विद्वान पद्मश्री डा. शेल्डेन पोलक ने किया। इसके बाद नोबेल पुरस्कार से सम्मानित तुर्की के विश्वप्रसिद्ध उपन्यासकार ओरहान पामुक से खुले सत्र में संवाद हुआ। युवा लेखक चंद्रहास चौधुरी के साथ संवाद में ओरहान पामुक ने कहा कि पूरी दुनिया में लोगों के दिल एक जैसे हैं, मन एक जैसे हैं, बस सांस्कृतिक भिन्नता और रहन-सहन की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए दुनिया की किसी भी भाषा में लिखा जाने वाला साहित्य लोगों के मन को छूता है क्योंकि उन्हें अपने आसपास जैसी एक दूसरी दुनिया देखने को मिलती है। पामुक ने कहा कि भारत की पारंपरिक चिंतन प्रणाली में बहुत कुछ ऐसा है जो लोगों को अपने समय की सचाइयों को नए ढंग से देखकर लिखने के लिए प्रेरित कर सकता है। पामुक ने ‘आर्ट आफ नावल’ पर बात करते हुए कहा कि लेखक की अपनी राजनैतिक समझ होती है जो उसकी रचना प्रक्रिया में पक कर एक नए रूप में सामने आती है।

पांच दिन चले साहित्य के इस महाकुंभ में इस बार भारत सहित दुनिया के बीस से अधिक देशों के 220 से अधिक लेखकों ने भागीदारी की। दो बार के बुकर विजेता जे.एम. कोएट्जी के साथ अमेरिका से रिचर्ड फोर्ड और जेय मैकिरनरी जैसे अंग्रेजी के विख्यात लेखकों के साथ विक्रम सेठ, इरविन वेल्श और मोहसिन हामिद भी इस महामेले में शामिल हुए। इस सूची में वो लेखक, संपादक, लिटरेरी एजेंट और प्रकाशक शामिल नहीं हैं जो इस विशाल साहित्यिक मेले का लुत्फ उठाने दुनिया के कई कोनों से यहां पहुंचे। पिछले दो-तीन वर्षों से इस साहित्योत्सव में दक्षिण एशिया पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की गई है, जिसकी वजह से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और भूटान जैसे पड़ौसी मुल्कों के लेखक भी इसमें शिरकत कर रहे हैं। इन प्रयासों से इस उपमहाद्वीप के देशों में सांस्कृतिक संबंध बेहतर बनाने में खासी सफलता मिल सकती है। पहली बार अफगानिस्तान के मशहूर लेखक अतीक रहीमी की इस उत्सव में भागीदारी हुई तो नेपाल से नाराण वागले और मंजुश्री थापा की आमद हुई।

हिंदी और भारतीय भाषाओं के लेखकों की इस उत्सव में भागीदारी साल दर साल बढती जा रही है। इस बार हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर कुछ नए विषयों पर कवि, लेखक और पत्रकारों के बीच रोचक और सार्थक संवाद हुए। जन्मशताब्दी वर्ष में अज्ञेय, नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह पर ओम थानवी, महेंद्र सुधांश और सुधीश पचौरी के बीच अविनाश के साथ संवाद हुआ। ‘‘ऐसी हिंदी कैसी हिंदी’’ पर मृणाल पांडे, रवीश कुमार, सुधीश पचौरी और प्रसून जोशी के बीच सत्‍यानंद निरूपम के संयोजन में रोमांचक बातचीत हुई। इसी तरह ‘नई भाषा नए तेवर’’ में गिरिराज किराडू, मोहल्ला लाइव के अविनाश और मनीषा पांडेय के बीच रवीश कुमार के साथ उत्तेजक चर्चा हुई। उर्दू जुबान को लेकर गीतकार जावेद अख्तर ने बहुत तल्खी के साथ कहा कि जुबानों का ताल्लुक मजहब से नहीं होता, इलाकों से होता है, लेकिन यह तकलीफ देने वाली बात है कि जहां उर्दू पढ़ने-लिखने वाले लोगों की कमी हो रही है, वहीं उर्दू सुनने वालों की तादाद में इजाफा हो रहा है। तेजी से लोकप्रिय हो रहे भोजपुरी सिनेमा पर भी एक सत्र में अविजीत घोष और कुमार शांता का अमिताव कुमार के साथ संवाद हुआ।

मराठी थिएटर, कश्मीर, रामायण और बुल्ले शाह पर भी कई सत्रों में खुलकर चर्चा हुई। बुल्ले शाह को भारत-पाक के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत आधार बताते हुए पत्रकार गायक मदनगोपाल ने कई नई जानकारियां देते हुए उनके कलाम को बेहद खूबसूरती से पेश किया। राजस्थान की राजधानी में आयोजित इस उत्सव में प्रदेश के हिंदी व राजस्थानी लेखकों की भी शिरकत रही। लेखकों में आपसी संवाद से पता चला कि इस बार राजस्थान से लेखकों का चयन अगर और बेहतर होता तो राजस्थान की समकालीन रचनाशीलता का एक बेहतर स्वरूप सामने लाया जा सकता था। स्थानीय लेखकों में इस बात को लेकर भी किंचित क्षोभ था कि इस बार आयोजन में उनकी भागीदारी के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी।

दक्षिण एशियाई साहित्य के लिए शुरु हुआ डीएससी पुरस्कार पहली बार अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार एच.एम. नकवी को हार्परकॉलिंस से प्रकाशित उपनके उपन्यास ‘होम बॉय’ के लिए प्रदान किया गया। दक्षिण एशिया के इस सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार में नकवी को पचास हजार अमेरिकी डॉलर और प्रतीक चिन्ह प्रदान किया गया। इस पुरस्कार के निर्णय से बहुत से लोगों को आश्‍चर्य भी हुआ, क्योंकि सब यही मान कर चल रहे थे कि यह पुरस्कार अमित चौधुरी को ‘द इम्मोर्टल्स’ पर दिया जाएगा। पुरस्कार के लिए चयनित अंतिम पांच लेखकों में अमित सबकी पहली पसंद थे।

पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए आयोजकों ने इस बार कार्यक्रम स्थल डिग्गी पैलेस का काफी विस्तार किया लेकिन आमजन और विद्यार्थियों की जबर्दस्त भागीदारी ने सिद्ध कर दिया कि इस साहित्योत्सव को लेकर उनमें बेहद उत्साह है और इसीलिए बावजूद तमाम इंतजामों के हर जगह लोगों की भीड़ छाई रही और लोगों को बैठने के लिए ही नहीं चलने के लिए भी जगह कम पड़ गई। अगली बार संभवतः आयोजकों को नई जगह तलाश करनी होगी, क्योंकि इसमें सिनेमा की मशहूर हस्तियों की उपस्थिति के वक्त तो बेकाबू भीड़ जमा हो जाती है, जो निश्चित रूप से आने वाले सालों में बढती जाएगी। साहित्य के इस विशाल मेले में प्रायोजकों की संख्या भी बढती जा रही है। साहित्य के नाम पर इस बढते हुए बाजारवाद को लेकर विगत तीन साल से जयपुर आ रहे एक अमेरिकी पत्रकार की टिप्पणी थी कि हर साल यह साहित्योत्सव व्यावसायिक अधिक होते जा रहा है जो बेहद चिंताजनक है।

यह रपट संपादित रूप में हिंदी आउटलुक के फरवरी 2011 अंक में प्रकाशित हुई है।



Monday, 31 January 2011

राजद्रोह और महात्‍मा गांधी का बयान

23 मार्च, 1922 को अदालत में महात्मा गांधी ने यह बयान दिया।

आज मानवाधिकार कार्यकर्ता और चिकित्‍सक डॉ. बिनायक सेन को राजद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया गया है। अंग्रेज सरकार ने महात्‍मा गांधी और हजारों देशभक्‍तों को उसी धारा 124-ए में जेल में डाल दिया था। 23 मार्च, 1922 को महात्‍मा गांधी ने अदालत में राजद्रोह के मामले में जो बयान दिया था, वह यहां प्रस्‍तुत है। इस बयान को आज के संदर्भ में पढ़ना एक नया अनुभव है। कल 30 जनवरी, 2011 को यह बयान मैंने बिनायक सेन के समर्थन में गांधी सर्किल पर आयोजित सभा में सुनाया था। आप भी पढ़ें और विचार करें।

''मैं स्वीकार करता हूं कि संभवतः भारत और इंग्लैंड की जनता को शांत करने के लिए ही मुख्य तौर पर यह मुकदमा चलाया गया है और इसमें मुझे यह विस्तार से बताना चाहिए कि कैसे और क्यों मैं एक निष्ठावान, वफादार और सहयोगी से एक हठी असंतुष्ट और असहयोगी के रूप में तब्दील हो गया हूं। मुझे अदालत को यह भी बताना ही चाहिए कि क्यों मैं भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति लगातार असंतोष पैदा करने का अपराधी सिद्ध किए जाने की मांग करता हूं।

मेरे सार्वजनिक जीवन का आरंभ 1893 में दक्षिण अफ्रीका के खराब वातावरण में हुआ। उस देश में ब्रिटिश सरकार के साथ पहला संपर्क बहुत अच्छा नहीं रहा। मुझे लगा कि एक मनुष्य और एक भारतीय होने के कारण मेरे कोई अधिकार नहीं हैं। सही बात तो यह कि मुझे यह अच्छी तरह पता चल गया कि एक मनुष्य के रूप में मेरे कोई अधिकार इसलिए नहीं हैं कि मैं एक भारतीय हूं।

लेकिन इससे मुझे कोई असमंजस नहीं हुआ। मैंने सोचा कि भारतीयों के साथ यह बर्ताव उस व्यवस्था के फोड़े हैं और उसके मूल में ही यह खामी है। मैंने सरकार का स्वेच्छा से और दिल से सहयोग किया। जब भी मुझे लगा कि इस व्यवस्था में खामी है मैंने खुले तौर पर इसकी आलोचना भी की, लेकिन कभी नहीं चाहा कि इसका पतन हो।

मैं अनचाहे ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ब्रिटिश संबंध के कारण भारत आर्थिक और राजनैतिक रूप से इस कदर असहाय हो गया है जितना इतिहास में कभी नहीं था। किसी भी आक्रमणकारी के खिलाफ एक निशस्त्र भारत के पास विरोध की कोई ताकत ही नहीं है, अगर उसे अपने सशस्त्र दुश्मन से मुकाबला करना हो। हालात ये हैं कि हमारे सबसे अच्छे लोग भी यह सोचते हैं कि भारत की कई पीढियों को स्वतंत्र गणराज्य बनने से पहले ही चुक जाएंगी। भारत इस कदर गरीब हो चुका है कि उसमें अकाल तक से लड़ने की ताकत नहीं रही। ब्रिटिश आगमन से पूर्व यहां लाखों कुटीर धंधों में कताई-बुनाई होती थी, जो इस देश के मामूली कृषि संसाधनों का पूरक और जरूरत भर होता था। वो कुटीर उद्योग जो भारत के अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था आज हृदयहीन और अमानवीय प्रक्रिया के तहत ब्रिटिश आगमन के बाद नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है। छोटे कस्बों के बाशिंदे भी इतना जानते हैं कि भारत की भूखी जनता किस तरह जीवनहीन हो गई है। वे यह भी जानते हैं कि उनको मिलने वाला आराम उस दलाली को दर्शाता है जो उन्हें उस काम के बदले मिलती है जो वे विदेशी शोषक के लिए करते हैं और यह भी कि जनता को मिलने वाला मुनाफा और दलाली खत्म हो गया है। वे यह भी समझ गए है कि ब्रिटिश भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार जनता के निरंतर शोषण पर ही चलती है और इसी के लिए चलती है। यह कोई कुतर्क नहीं है और आंकड़ों की बाजीगरी से आप इस प्रमाण को झूठा सिद्ध नहीं कर सकते जो हजारों गांवों में नंगी आंखों से कंकालों के रूप में दिखाई देते हैं। मुझे कोई संदेह नहीं है, अगर कहीं ईश्वर है तो मानवता के विरुद्ध इतिहास के सबसे बड़े अपराध के लिए इंग्लैंड और भारत के शहरी नागरिकों को जवाब देना ही पड़ेगा। इस देश में तो कानून भी विदेशी शोषक की सेवा के लिए बनाए गए हैं। पंजाब मार्शल लॉ के अंतर्गत दर्ज किए गए मामलों में मेरा निष्पक्ष परीक्षण बताता है कि 95 प्रतिशत मामले पूरी तरह गलत थे। भारत में राजनैतिक मामलों में मेरा अनुभव इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि दस में से नौ मामलों में निर्दोष लोगों को फंसाया जाता है। उनका अपराध इतना ही है कि वो अपने वतन से प्रेम करते हैं। भारत की अदालतों में 100 में से 99 मामलों में यूरोपियनों के मुकाबले इंसाफ नहीं मिलता। यह कोई मनगढंत तस्वीर नहीं है। यह लगभग प्रत्येक भारतीय का अनुभव है अगर वह ऐसे किसी मामले में पड़ा हो। मेरे विचार से यह कानून के प्रशासन का शोषक के हित में वेश्यावृति करने जैसा है।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि देश के प्रशासन में लगे अंग्रेज और उनके भारतीय सहयोगी यह जानते ही नहीं कि वे उस अपराध में लगे हुए हैं जिसे मैंने बताने की कोशिश की है। मैं संतुष्ट हूं कि अंग्रेज और भारतीय अधिकारी पूरी ईमानदारी से यह विश्वास करते हैं कि वे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्थाओं में से एक का संचालन कर रहे हैं और भारत धीमे ही सही आगे बढ़ रहा है। वे नहीं जानते कि एक तरफ तो आतंकवाद की सूक्ष्म और प्रभावी व्यवस्था और शक्ति का संगठित प्रदर्शन है और दूसरी तरफ तमाम किस्म की शक्तियों और आत्मरक्षा से वंचित आम जनता है, इस सबसे लोगों का पुंसत्व समाप्त हो गया है और उनमें एक निठल्लापन भर गया है। इस दर्दनाक प्रवृति ने प्रशासकों तक को अपने कब्जे में ले लिया है जिससे लोग प्रशासन को कुछ समझते ही नहीं और प्रशासक आत्मछल के शिकार हो रहे हैं। धारा-124-ए जिसके तहत मुझे खुशी है कि आरोपी बनाया गया है, यह भारतीय दण्ड संहिता की शानदार धारा है, जिसे भारतीय नागरिकों के दमन के लिए बनाया गया है। कानून ना तो प्रेम की रचना कर सकता है और ना ही उसे संचालित कर सकता है। अगर कोई किसी व्यक्ति या व्यवस्था से प्रेम करता है तो उसे अपना अप्रेम या असंतोष भी व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए, जब तक कि वह किसी प्रकार से हिंसा की ओर ना जाए। लेकिन जिस धारा में मि. बैंकर (असहयोग आंदोलन में गांधी जी के सहयोगी) और मुझे दोषी करार दिया गया है उसके अंतर्गत जरा-सा असंतोष पैदा करना भी अपराध है। इस धारा के अंतर्गत दर्ज किए गए कुछ मामलों का अध्ययन किया है और मैं जानता हूं कि देश के सर्वश्रेष्ठ देशभक्तों को इस धारा के अंतर्गत आरोपी बनाया गया है। मैं इसे एक विशेषाधिकार मानता हूं और इसीलिए इस धारा के अंतर्गत आरोपी बनाए जाने की मांग करता हूं। मैंने अपने असंतोष के कारणों का संक्षेप में विवरण देने की कोशिश की है। किसी भी प्रशासक के प्रति मेरे मन और आत्मा में कोई व्यक्तिगत दुर्भाव नहीं है, क्या मैं सम्राट के प्रतिनिधि के प्रति थोड़ा भी असंतोष नहीं दिखा सकता। लेकिन मैं एक ऐसी सरकार के प्रति असंतोष रखना अपना नैतिक दायित्व मानता हूं, जिसने पुरानी किसी भी व्यवस्था से अधिक भारत का नुकसान किया है। भारत का पुरुषार्थ इतिहास में इतना कमतर कभी नहीं हुआ, जितना ब्रिटिश शासन में हुआ है। ऐसा विश्वास रखते हुए मैं मानता हूं कि इस व्यवस्था के प्रति प्रेम रखना एक अपराध है। मेरे लिए यह विशेषाधिकार की बात है कि मेरे विरुद्ध मेरे लिखे उन लेखों को सबूत के तौर पर पेश किया गया है जो मैं लिख सका।

सच में मैं विश्वासपूर्वक कहता हूं कि जिस अप्राकृतिक स्थिति में ये दो देश रह रहे हैं वहां मैंने असहयोग के माध्यम से भारत और इंग्लैंड दोनों की सेवा की है। मेरी विनम्र राय है कि बुराई के साथ असहयोग करना भी उतना ही बड़ा कर्तव्य है जितना अच्छाई के साथ सहयोग करना। लेकिन अतीत में बुरा करने वाले के साथ असहयोग जानबूझकर हिंसा के रूप में ही व्यक्त किया गया। मैं अपने देशवासियों को यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि हिंसक असहयोग बुराई को और बढ़ाएगा और यह भी कि हिंसा से बुराई को बल ही मिलेगा। बुराई का खात्मा तभी होगा जब हम हिंसा से पूरी तरह मुक्त हो जाएं। अहिंसा में यह भी निहित है कि हम बुराई के साथ असहयोग करने के लिए दंडित होने के लिए खुद को प्रस्तुत कर दें। इसलिए मैं यहां स्वयं को प्रसन्नता के साथ प्रस्तुत करता हूं कि कानून के तहत जो जानबूझकर किया गया अपराध है, और मेरे लिए यह एक नागरिक का सबसे बड़ा कर्तव्य है, उसके लिए मुझे बड़े से बड़ा दंड दिया जाए। न्यायाधीश महोदय, आपके पास अब एक ही सूरत बची रह गई है कि अगर आप समझते हैं कि आप जिस कानून को चला रहे हैं और वो गलत है, बुराई का साथ देने वाला है और मैं निर्दोष हूं तो आप अपने पद से इस्तीफा दें और इस तरह बुराई से अपने आपको दूर कर लें। अगर आप समझते हैं और मानते हैं कि यह व्यवस्था और आपके कानून का शासन इस देश की जनता के लिए अच्छा है और इसलिए मेरी गतिविधियां सार्वजनिक जीवन के लिए हानिकारक हैं तो मुझे गंभीर से गंभीर सजा दें।''

Sunday, 31 October 2010

दिवालिया देश में दीवाली

इन दिनों जब आम गरीब आदमी दीपावली और त्यौहारी मौसम में परिजनों के पास जाने की सेाच रहा है, प्रसिद्ध कहानीकार अरुण प्रकाष की कहानी ‘भैया एक्सप्रेस’ याद आती है। इस कहानी में पंजाब में मजदूरी करने आए बिहारी मजदूरों की रेल यात्रा के बहाने उनकी व्यथा कथा का भयावह चित्रण है कि कैसे गरीब आदमी जब तीज-त्यौंहार पर अपने गांव-घर वापस जाता है तो उनकी रेल को अभिजात समाज नाम बदल कर ‘भैया एक्सप्रेस’ कर देता है। यह भारतीय समाज की 21वीं सदी के पहले दषक के अवसान वाली दीपावली है, जब सरकारी आंकड़ों और घोषणाओं में स्वर्णिम भारत की बहुरंगी तस्वीर दिखाई जा रही है, लेकिन रेल-बसों में ठसाठस भरकर अपने मूल आषियाने की ओर जाने वाली आम लोगों की तादाद बता रही है कि यह एक ही देष में रहने वाले लोगों के दो देषों का चित्र है, जिसमें एक चमकदार भारत है, जिसके लिए हर तरफ ऑफरों की भरमार है, सजे-संवर-दमकतेे शॉपिंग मॉल हैं, नियॉन रोषनियों का जगमगाता समंदर है, बोनस की घोषणाएं हैं, दीवाली के तोहफे हैं, पटाखों की कानफोड़ू आवाजें हैं और नकली मावा के मुकाबले चॉकलेट और सूखे मेवों का बाजारी मुकाबला है। दूसरा भारत अपने मिट्टी के कोरे दीयों में खील-बताषों और नई फसल के साथ गोबर-गेरू से घर-आंगन लीपता राम-राम करता हुआ भारत है, जहां कई साल-बरसों बाद अपनों से गले मिलने का संतोष है, जिसे हफ्ते-दस दिन बाद फिर किसी ‘भैया एक्सप्रेस’ में चमकते भारत के संपन्न लोगों की हिकारत के बीच अपने खून-पसीने को बेचने जाना है।

दस फीसदी विकास दर की चकाचौंध रोषनी, सेंसेक्स के थर्मामीटर और प्रत्यक्ष विदेषी निवेष के ग्लूकोज से चलने वाले एक देष के लिए उस देष की दिवालिया दीवाली का कोई अर्थ नहीं है, जो नींव की ईंट बन कर चमक-दमक पैदा करने के लिए अपना श्रम और अपने संसाधन निछावर कर रहा है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं, पारंपरिक रोजगार के अवसर समाप्त हो रहे हैं, लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, मानवीय श्रम भारतीय इतिहास में आज से पहले कभी इतना सस्ता नहीं था सो मजबूर लोग मामूली मजदूरी पर अपना पसीना बेचने को मजबूर हैं या चौराहों पर बीवी-बच्चों के साथ भीख मांगने के सिवा उनके पास आपराधिक तरीकों से काम चलाना ही अंतिम विकल्प बचा है। कहने को गांवों में महानरेगा है, जिसमें सौ दिन के रोजगार की गारंटी है, लेकिन पेट को तो 365 दिन भरना पड़ता है हुजूर और इस पर भी सितम यह कि नरेगा से लक्ष्मी को बंधक बनाकर घर में कैद करने वाले गांव के बड़े लोगों, पंच-सरपंच और सरकारी अफसरों का हिस्सा निकाल लो तो साल में दो हफ्ते का ही राषन जुटता है सौ दिन की नरेगा की मजदूरी से। लक्ष्मी जी को बंधक बनाकर चमकीले भारत के लोग ले गए हमारे लिए तो उनका वाहन ही छोड़ गए हैं जो अजीब निगाह से टुकुर-टुकुर देखता है हमारी तरफ, क्या करें उलूक महाषय का, हमारी अंधेरी रातों में तो उसकी एक जोड़ी टिमटिमाती आंखों की ही रोषनी है बस।

स्वर्ण चतुर्भुज जैसी मेगा सड़क परियोजनाएं देष के भूगोल का नक्षा बदल रही हैं और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सरीखी रेल पटरियां इक्कीसवीं सदी के वाणिज्यिक भारत का नया मानचित्र बनाने को बेताब हैं। लेकिन इस रोषन तस्वीर का दूसरा अंधेरा पहलू यह है कि इन सड़क और रेल मार्गों के किनारे बसे गांवों के ग्रामीणों की जिंदगियां आने वाले बरसों में हमेषा-हमेषा के लिए काली दीवाली लेकर आने वाली है। अगर केंद्र और राज्य सरकारों की भावी योजनाओं पर भरोसा किया जाए तो इन रेल-सड़क मार्गों के किनारे बसे गांवों की करोड़ों बीघा जमीन सरकारें अवाप्त कर पूंजीपति घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने जा रही हैं और इस जमीन पर कंपनियां खेती करेंगी, कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग करेंगी और रेल-सड़क मार्गों से तैयार माल सीधे देष-विदेष में बेचने के लिए भेज देंगी। फिर भविष्य में इन लाखों गांवों से मिट्टी के घर, गोबर के गोवर्धन और तमाम तीज त्यौहारों की रौनकें खत्म हो जाएंगी, बचेगा तो कंपनियों की चिमनियां का काला धुंआ और विषालकाय कृषि यंत्रों का अनंत शोरगुल, जिसमें ग्रामीण भारत की कृषि संस्कृति के सारे रंग खो जाएंगे। फिर कोई ‘भैया एक्सप्रेस’ इन रास्तों से गजरेगी तो बड़ेऋबूढ़े अपने बच्चों से कहेंगे कि यहीं कहीं हमारा गांव था, घर था, छोटा-सा खेत था, जहां हम होली-दीवाली और छठ मनाने आते थे।

शहरों की चकाचौंध भरी रोषन दीपावली के जगमग उजालों में भविष्य के अंधेरों की भयावह कल्पना के बीच हमें दिखाई देते हैं बड़े शहरों में बसे गरीबों के अंधियारे आषियाने, जहां ना बिजली है ना पानी, है तो बस दमघोंटू मलिन बस्तियों का मैला-कुचैला मेरा भारत महान। इस भारत के बारे में आम शहरी और नगर नियोजकों और नियंताओं का मानना है कि इक्कीसवीं सदी के चमकीले भारत के माथे पर ये बदनुमा दाग हैं। जबकि तथ्य यह है कि सिर्फ दिल्ली में सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर खड़ी होने वाली कारों ने दिल्ली की दस प्रतिषत जगह घेर रखी है और वहां की मलिन बस्तियों ने महज एक फीसद जगह।
(डेली न्यूज़, जयपुर में रविवार ३१ अक्टूबर, २०१० को प्रकाशित. )

Wednesday, 13 October 2010

जाना एक कॉमरेड कवि का

पिछले कुछ सालों से एक-एक कर हमारे अत्यंत प्रिय और महत्वपूर्ण संघर्षशील रचनाकार साथी विदा हो रहे हैं और यह बेहद दुखद है। इस अक्टूबर महीने की शुरुआत ही राजस्थान के लोकप्रिय, क्रांतिकारी और अजातशत्रु कॉमरेड कवि शिवराम के आकस्मिक निधन से हुई। उनका यूं अचानक चले जाना हमारे समय का ऐसा हादसा है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी। शिवराम हाड़ौती अंचल की सबसे बुलंद आवाज थे। एक ऐसा इलाका, जो दक्षिणपंथियों का गढ़ है, जहां उद्योगपतियों का वर्चस्व है, वहां पिछले करीब चार दशक से शिवराम अकेले सिंह की तरह तमाम मोर्चों पर दहाड़ रहे थे और लोगों को एकजुट कर रहे थे। हाड़ोती के मजदूर, किसान, युवा, दलित, अल्पसंख्यक, वंचित, साहित्यकार, कलाकार और आम आदमी के  निर्द्वंद्व नेता शिवराम 01 अक्टूबर, 2010 को मौन हो गए। 
उनके निधन की सूचना से पूरे देश में शोक की लहर फैल गई। किसी के लिए यह कल्पना करना मुश्किल था कि शिवराम यूं अचानक भी जा सकते हैं। अभी तो उनके वास्तविक जननेता का काल शुरु हुआ था, जिसमें वे गांव-गांव, शहर-शहर घूम कर अपने ओजस्वी भाषणों, गहरे व्यंग्य और मर्मस्पर्शी कविताओं तथा चेतना से ओतप्रोत नाटकों के जरिए जन-जागरण का निरंतर काम कर रहे थे। तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद वे सभी समान विचारधाराओं के लोगों को एक मंच पर लाने में जुटे हुए थे। राजस्थान में संयुक्त सांस्कृतिक मोर्चा के वे संयोजक थे और दिन-रात कई मोर्चों पर सक्रिय रहते थे। पता नहीं यह अति सक्रियता ही तो कहीं उन्हें हमसे दूर नहीं ले गई। 
23 दिसंबर, 1949 को करौली के गांव गढ़ी बांदुवा में जन्मे शिवराम का परिवार जातिगत पेशे से स्वर्णकार था। जिस परिवार में बात ही हमेशा सोना-चांदी की होती रही हो, वहां से संघर्षों की आंच में तप कर जो व्यक्तित्व निकला उसने मेहनत और पसीने की बूंदों को शब्द और संघर्ष की माला में पिरोकर जनता के सौंदर्य के गहने बनाने का बीड़ा उठाया। अजमेर से आई.टी.आई. की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे दूरसंचार विभाग में तकनीशियन के रूप में सेवाएं देने लगे। विवेकानंद से प्रभावित होकर वे मार्क्सवाद की तरफ आए और फिर अपने पूरे परिवार और समाज को ही इस धारा में शामिल करते चले गए। ऐसे मार्क्सवादी बहुत कम होते हैं, जो अपने परिवार को भी विचारधारा से जोड़कर जनता के संघर्षों के लिए दीक्षित करते हैं। पर शिवराम ऐसे ही थे। उनके साथ जो भी जुड़ता वो उनके सहज, आत्मीय, निर्मल और प्रेमिल व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उनके विचारों का अनुषंगी हो जाता। हाड़ौती अंचल में शिवराम ने हजारों की संख्या मे लोगों को मार्क्सवाद की बुनियादी तालीम दी। सैंकड़ों कवि-लेखकों को प्रगतिशील-जनवादी सरोकारों से लैस होकर लिखने का पाठ पढ़ाया। 
मुझे याद नहीं कि उनसे मेरी पहली मुलाकात कब हुई थी, लेकिन उनके विचारों से, उनकी आयोजन क्षमता से, उनके मजदूर नेता वाले रूप से, उनके सृजनशील मन से, उनकी आत्मीयता से, उनकी सहज-सरल और मृदुल मुस्कान से मैं हमेशा प्रभावित हुआ। हमारे बीच कुछ बुनियादी वैचारिक सवालों पर मतभेद रहे, उन पर हम खुलकर चर्चा भी करते रहे, लेकिन यह उनके व्यक्तित्व का ही कमाल था कि मतभेद को उन्होंने कभी मनभेद नहीं बनने दिया। एक बार अजमेर में संयुक्त सांस्कृतिक मोर्चा की बैठक के बाद हम दोनों ने जयपुर तक की यात्रा में अपने संघर्षों के दौर के अनुभव आपस में बांटे। मुझे यह जानकर सुखद आश्‍चर्य हुआ कि स्वर्णकार परिवार में जन्म के बावजूद शिवराम जी ने बेहद संघर्ष किया और इसकी वजह यह थी कि वे बहुत स्वाभिमानी थे और पारिवारिक पेशे से अलग हटकर कुछ मन का काम करना चाहते थे, इसीलिए आई.टी.आई. में चले गए। उनकी औपचारिक शिक्षा बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन स्वाध्याय से उन्होंने तमाम किस्म का ज्ञान अर्जित किया। हिंदी में मार्क्सवाद की छोटी-छोटी पुस्तिकाओं से उन्होंने अपना वैचारिक आधार तैयार किया, जो कुछ पढ़ते उसे साथियों के साथ सरल दैनंदिन उदाहरणों से समझाते और उनकी चेतना को नया रूप देते। लोगों के बीच अपनी बात पहुंचाने के लिए उन्होंने नाटक को खास तौर पर नुक्कड़ नाटक को अपनाया। हिंदी में जब मंच के लिए ही अच्छे नाटक नहीं हैं तो नुक्कड़ नाटकों का तो वैसे ही अकाल है। इस कमी को पूरा करने के लिए शिवराम ने खुद नाटक लिखना शुरु किया और कलाकारों की कमी के चलते खुद अभिनेता और निर्देशक भी हो गए। जनता की समस्याओं पर नुक्कड़ नाटक लिखने की प्रक्रिया में शिवराम सिद्धहस्त हो गए थे। उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध नाटक है ‘जनता पागल हो गई है’, हिंदी में यह अब तक का सर्वाधिक मंचित नाटक है। नाटकों की उनकी पांच पुस्तकें प्रकाशित हैं। मेरे खयाल से हिंदी में शिवराम जनचेतना वाले नाटक लिखने वाले सबसे बड़े नाटककार हैं, शायद ही किसी अन्य नाटककार ने उनसे अधिक जन-नाटक लिखे हों। 
मूलतः कविर्मना शिवराम की कविताओं के तीन संग्रह हैं, ‘माटी मुळकेगी एक दिन’, ‘कुछ तो हाथ गहो’ और खुद साधो पतवार।’ कविताओं में वे आम आदमी से सीधा संवाद करते हैं और जगाने की बात करते हैं। उनकी कविताएं इसी जीवन और धरती पर रचे-बसे लोगों के सुख-दुख और निराशा से आशा की ओर ले जाने वाली कविताएं हैं। शिवराम मार्क्सवाद और अनवरत संघर्ष को ही जीवन का ध्येय मानने वाले सृजनशील, विचारक, जननायक थे। वे मानते थे कि जनसंघर्षों की सफलता मार्क्सवाद में ही संभव है, इसलिए अपनी एक कविता में वे कहते हैं, ‘उत्तर इधर है राहगीर, उत्तर इधर है।’ उनकी संघर्षषील और सृजनधर्मी स्मृति को नमन। 

यह स्‍मरणांजलि डेली न्‍यूज़, जयपुर के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' में 10 अक्‍टूबर, 2010 को प्रकाशित हुई।

Sunday, 10 October 2010

राम सजीवन की प्रेमकथा

यह जवाहर कला केंद्र की फ्राइडे थियेटर की हमेशा जैसी चहल-पहल भरी शाम थी। मेरे जैसे कई दर्शकों के मन में जिज्ञासा थी कि हिंदी के अद्भुत कथाकार उदय प्रकाश की चर्चित कहानी ‘राम सजीवन की प्रेमकथा’ को योग्य युवा रंगकर्मी अभिषेक गोस्वामी कैसे प्रस्तुत करेंगे? रंगायन सभागार में जब रोशनियां गुल हुईं तो अंधेरे में अभिषेक की आवाज में राम सजीवन के गांव से देश की राजधानी के सबसे महत्वपूर्ण विश्‍वविद्यालय तक पहुंचने की संक्षिप्त, पर रोचक कथा और राम सजीवन की पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि जैसे-जैसे उजागर होती गई, मंच पर छाया अंधेरा भी छंटने लगा। कुर्ते-पायजामें में राम सजीवन राजधानी के विश्‍वविद्यालय में दाखिल हुए तो उनकी मित्र मंडली ने उनके आंरभिक अनुभवों और उनके बिहारी लहजे को लेकर उनकी मुश्किलों को एक एक कर बयान करना शुरु किया तो राम सजीवन की कथा रोचक ढंग से आगे बढने लगी। गंवई पृष्ठभूमि के राम सजीवन के लिए चीजों को देखने का गंवई अंदाज दर्शकों को गुदगुदाने लगा। किसी ने कितनी कीमत के जूते या कपड़े पहन रखे हैं इसे राम सजीवन क्विंटल धान या गेहूं में बयान करते तो दर्शकों के ठहाके लगते। इसी प्रक्रिया में राम सजीवन विश्‍वविद्यालय में सहपाठी छात्रों के कौतूहल का विषय बनते गए और विषमता और समाजवादी समाज की बहसों में वे वामपंथ के मार्ग पर चलते चले गए।

क्हानी में रोचक मोड़ तब आता है जब विश्‍वविद्यालय में लड़कियों को भी प्रवेश की अनुमति मिल जाती है और राम सजीवन होस्टल के जिस कमरे में रहते हैं उसकी बालकनी के ठीक सामने एक छात्रा अनिता चांदीवाला आ जाती है। बड़े बाप की बेटी अनिता लंदन से पढ़कर आई है। राम सजीवन उसे बालकनी में निसंकोच खड़ी देखते हैं तो उसके हाव-भाव से उन्हें लगने लगता है कि उन दोनों में प्रेम हो गया है और यह प्रेम मौन संवादों में मुखरित हो रहा है। वे अपने मित्रों से इस प्रसंग की चर्चा करते हैं और उपहास का पात्र बनते चले जाते हैं। इस इकतरफा प्रेमकथा का बुखार जब चरम पर पहुंचता है तो राम सजीवन देशी-विदेशी प्रेम कवितएं पत्रों में लिख कर अनिता को भेजने लगते हैं, जिसकी शिकायत वार्डन से की जाती है। अंततः मित्र लोग जबर्दस्ती राम सजीवन को गांव भेज देते हैं। एक साल बाद गांव से लौटने पर भी राम सजीवन सामान्य नहीं होते। लेकिन इस एक बरस में बहुत कुछ बदल जाता है, अनिता वापस लंदन चली जाती है और विश्‍वविद्यालय में माहौल बदल जाता है, उनका कमरा बदल दिया जाता है।

इकतरफा प्रेम की इस असाधारण प्रेमकथा को अभिषेक ने जिस रंगशैली में मंच पर प्रस्तुत किया वह बेहद प्रभावी और प्रयोगवादी है। आधुनिक कहानी को वायस ओवर, मादक संगीत और कई पात्रों के माध्यम से कहने में जो कमाल अभिषेक ने किया है वह काबिले तारीफ है। कलाकारों ने जिस तन्मयता से अभिनय किया, वह कहानी का प्रवाह टूटने नहीं देता और एक किरदार की कथा को कई किरदारों से कहलाने का नवाचार रंगमंच की असीम संभावनाओं भरी दुनिया को व्यक्त करत है। प्रकाश योजना और कई किस्म के रंग उपकरणों का जिस कुशलता के साथ अभिषेक इस्तेमाल करते हैं, वह कहानी को कई रूपों में व्यंजित और व्याख्यायित करता है। एक भोली-भाली मासूम प्रेमकथा राजधानी के आर्थिक विषमता भरे माहौल में कैसे उपहास का पात्र बन जाती है, भावनाएं जहां हर तरह से रौंद दी जाती है और व्यवस्था किसी मासूम प्रेमकथा को परवान नहीं चढ़ने देती। निश्‍चय ही एक विशिष्ट किस्म का रंग अनुभव है अभिषेक गोस्वामी की ‘राम सजीवन की प्रेमकथा।’

Monday, 4 October 2010

तुम्हारे शहर में

जब भी इस शहर में दाखिल होता हूँ


तुम्हारी याद आती है

वो तुम्हारा मोरपंखी नीला सूट

आँखों के आगे आसमान की तरह छा जाता है



वो दिन अब भी याद आते हैं

जब तुम्हारी मुस्कान में

चाँद का अक्स चमकता था

और हमारी बातों में परिन्दों का गान सुनाई देता था



वो तुम्हारा हरा कढ़ाईदार सूट

एक सरसब्ज बागीचा था

जो तुम्हारी देह-धरा को अलौकिक बनाता था



जब तुम झिड़कती थीं मुझे

मैं बच्चा हो जाता था

और तुम्हारी नाराज़गी पर

बुजुर्ग बनना पड़ता था मुझे



वो दिन अब नहीं लौटेंगे मम्मो

लेकिन मैं हूँ कि

बार-बार लौट आता हूँ इस शहर में

पता नहीं अब हम कभी मिलें न मिलें

पता नहीं इस विशाल शहर के किस कोने-अन्तरे में

तुम सम्भाल रही होंगी अपना घर

और एक मैं हूँ कि

हर फुरसत में सड़कों पर

खोजता फिरता हूँ

वही मोरपंखी नीला और हरा कढ़ाईदार सूट 