Sunday, 20 December 2009

गुनाहों का देवता: 50 बरस: सौ संस्करण



हिंदी में अगर साहित्य की लोकप्रिय किताबों की बात की जाए तो धर्मवीर भारती का उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ शीर्ष दस पुस्तकों में होगा। भारत की विभिन्न भाषाओं में इसके सौ के करीब संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और युवा वर्ग में आज भी यह खासी लोकप्रिय किताब है। इस लोकप्रियता का कारण अगर इसकी बेहद रोमांटिक प्रेम कहानी है तो इसके बरक्स प्रेम का एक उदात्त और बलिदानी स्वरूप भी है। इस उपन्यास की जितनी लोकप्रियता है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हिंदी में इससे ज्यादा लोकप्रिय उपन्यास की चर्चा करेंगे तो एक के बाद एक कई नाम आते चले जाएंगे और बावजूद इसके ‘गुनाहों का देवता’ की पसंदगी अपनी जगह कायम रहेगी। इस पसंदगी के कारण जुदा हो सकते है, लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो एक खास वक्त में इसे पसंद करते थे, लेकिन अब यह उन्हें नहीं रूचता। खुद धर्मवीर भारती ही इस बात को कभी नहीं समझ पाए कि इसकी अपार लोकप्रियता के पीछे क्या कारण रहे।

प्रेम का निष्छल रूप उर्फ प्लेटोनिक लव की अवधारणा

जब यह उपन्यास प्रकाशित हुआ तब पूरे देश में आदर्शवाद की जबर्दस्त धूम थी। छठे दशक की किसी भी कला संस्कृति की विधा को ले लीजिए हर तरफ आदर्शवाद ही दिखाई देता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग तुरंत बाद के इस परिदृश्‍य में एक अजीब किस्म का जोश और जुनून था जिसमें बहुत कम लोग थे जो अंग्रेजों से मुक्ति के मोहभंग को यथार्थ में चित्रित कर रहे थे। नेहरूयुगीन आशावाद का एक जोम था, जिसमें पूरा देश बह रहा था। धर्मवीर भारती भी उस परिदृश्‍य के ही एक पात्र और कलाकार थे। वे उससे अलग कैसे रह सकते थे? आजादी के बाद के इस कालखण्ड में जो महत्वपूर्ण किताबें सामने आईं उनमें से अधिकांश में आत्मबलिदान को लेकर एक विचित्र किस्म का व्यामोह था। हर कोई कुरबान होना चाहता था, लेकिन किसी को पता नहीं था कि किस पर कुर्बान होना है। कोई अपनी कला पर कुर्बान था तो कोई अपनी प्रेमिका पर और बाकी सब किसी ना किसी मकसद को लेकर। बलिदानी होने की कामना कोई बुरी बात नहीं, लेकिन दिक्कत तब होती है जब आपके सामने कोई ठोस आदर्श नहीं हो। यह उपन्यास उसी दौर की कथा है जिसमें आदर्श का कोई एक स्वरूप नहीं था और सच्चाई यह भी है कि यथार्थ में आदर्श का कोई एक मानक और ठोस रूप हो भी नहीं सकता। और प्रेम में तो आदर्श वक्त के साथ बहुत तेजी से बदलते रहते हैं। इसलिए भारती जी के युवावस्था में लिखे इस उपन्यास में एक यूटोपियाई प्रेम है। दो युवा दिलों के बीच पनपने वाला अव्यक्त किस्म का प्रेम, जिसे दोनों जानते तो हैं, पर अनजान भी बने रहते हैं और एक दूसरे को बस किसी प्रकार सुखी देखना चाहते हैं। जिसे अंग्रेजी में प्लेटोनिक लव कहते हैं, जिसमें दैहिक संबंध के बिना अपने प्रेम का चरम रूप दो प्रेमी दिखाना चाहते हैं। चंदर और सुधा ऐसे ही प्रेमी हैं।

भोली नायिका का आदर्श बनाम प्रेक्टिकल ईसाई लडकी

सुधा के रूप में धर्मवीर भारती ने एक मासूम, चंचल, शोख और भोली नायिका का आदर्ष चरित्र गढ़ा, जिसके लिए चंदर अपने आपको बलिदान कर देता है। इसके बरक्स भारती जी ने पम्मी के रूप में एक व्यावहारिक युवती का चरित्र रचा, जो एक आजाद खयाल युवती है, लेकिन उसके भी अपने आदर्श हैं। वह भी देह से परे के प्रेम को महत्व देती है। लेकिन चंदर और पम्मी की पहली रोमांटिक मुलाकात को भारती जी इस वाक्य से खत्म कर बहुत कुछ कह देते हैं, जो दृश्‍य में नहीं कहा जा सकता था। ‘पम्मी उठी, वह भी उठा। बांस का मचान हिला। लहरों में हरकत हुई। करोड़ों साल से अलग और पवित्र सितारे हिले, आपस में टकराए और चूर-चूर होकर बिखर गए।’ पम्मी का आदर्श प्रेम और चंदर की पवित्रता क्या इस वाक्य में टूट कर बिखरते नहीं दिखाई देते। अंत में जाकर चंदर सुधा के सामने स्वीकार भी करता है, जब वह कहता है, ‘लेकिन तुमसे एक बात नहीं छिपाउंगा। वह यह कि ऐसे भी क्षण आए हैं जब पम्मी के समर्पण ने मेरे मन की सारी कटुता धो दी है..।’ पम्मी के प्रेम का फलसफा यह है कि आदर्शवादी प्यार की प्रतिक्रिया सेक्स की ही प्यास में होती है। चंदर को लिखे अपने अंतिम पत्र में पम्मी कहती भी है, ‘मैं जानती थी कि हम दोनों के संबंधों में प्रारंभ से इतनी विचित्रताएं थीं कि हम दोनों का संबंध स्थायी नहीं रह सकता था, फिर भी जिन क्षणों में हम दोनों एक ही तूफान में फंस गए थे, वे क्षण मेरे लिए मूल्य निधि रहेंगे।’

मध्यवर्ग की ढुलमुल मानसिकता और प्रेम का यथार्थ

अनिर्णय निम्न मध्य वर्ग की चारित्रिक विशेषता है, जिसे चंदर के व्यक्तित्व में बखूबी देखा जा सकता है। प्रेम में समर्पण और बलिदान में से उसने बलिदान को चुना और इस चुनाव ने दो युवाओं को दूर कर दिया। वह बेहद प्रतिभाशाली है, सुधा के पिता उसे पसंद भी करते हैं, लेकिन दो भिन्न जातियों के बीच कैसे एक संबंध विवाह तक पहुंच सकता है? इस पर सुधा के पिता का मौन बहुत कुछ कह देता है। वे भी तो उसी मध्यवर्गीय मानसिकता के शिकार हैं, जो छठे दशक में एक आदर्श समाज की परिकल्पना में सामाजिक जीवन में कोई बदलाव नहीं चाहता था। यथार्थ में घट रहे प्रेम को अनदेखा कर आदर्शवादी और आज्ञाकारी बना रहना इस उपन्यास के तमाम पात्रों की चारित्रिक विवशता है। प्रेम का आदर्श स्वरूप क्या हो इस पर हर कालखण्ड में बहस चलती रहती है। धर्मवीर भारती के इस उपन्यास की लोकप्रियता के बहुत से कारणों में संभवतः यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है, कि इस उपन्यास में युवा मन, प्रेम और सेक्स को लेकर पहली बार इतनी खुलकर चर्चा की गई, जिसमें सामाजिक बंधनों के साथ एक आदर्शवादी प्रेम को ही अंतिम सत्य के तौर पर प्रतिष्ठित किया गया। इसीलिए सामान्य घर-परिवारों में माता-पिता ने इस उपन्यास को अपने अपनी संतानों के लिए वर्जित नहीं किया। मनुष्य को वैसे भी आदर्श अच्छे लगते हैं, इसलिए ‘गुनाहों का देवता’ हर काल में पसंद किया गया और किया जाता रहेगा।


देवदास का शाकाहारी संस्करण

जिन लोगों ने इस उपन्यास को अपनी युवावस्था में पढ़ा, उन्हें बीस-तीस बरस बाद अगर यह उपन्यास पढ़ने को दिया जाए तो अधिकांश को इसमें एक विचित्र बचकानापन नजर आता है। खुद भारती जी भी इसे कलात्मक रूप से अपरिपक्व उपन्यास मानते थे। इसमें बहुत से ऐसे विवरण हैं, जिन्हें अगर हटा दिया जाए तो भी इसकी कथावस्तु पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उपन्यास में कई जगह अति भावुकता है, कोरा आदर्शवाद है। मेरे जैसे कई पाठकों को यह शरत चंद्र के ‘देवदास’ का शाकाहारी संस्करण लगता है। जहां देवदास प्रेम में नाकाम होकर शराब की शरण में जाता है यानी एक भटकाव में जीता है, वहीं चंदर भी अनिर्णय में भटकता है। पारो की तरह सुधा भी अपने प्रेम के लिए कुछ नहीं कर पा सकने के लिए विवश है और अंत में दम तोड़ देती है। चंद्रमुखी की तरह पम्मी चंदर को राह पर लाने की कोशिश में खुद अपने पति के पास चली जाती है। देवदास और चंदर में फर्क इतना है कि देवदास की भांति चंदर आत्महंता बनने के बजाय सुविधाजनक राह पर चलते हुए बिनती के साथ जिंदगी गुजारने के लिए चल देता है। एक फिल्मी किस्म का समापन होता है, जिसमें अंत में सुधा की मृत्यु के बाद सब अपनी राह पर सुखी जीवन जीने के लिए चल पड़ते हैं और इन सबके पास एक आदर्श भरी दुनिया का स्वप्न है।

एक ना बन सकी फिल्म

इस उपन्यास की लोकप्रियता को भुनाने का एक फिल्मी प्रयास भी हुआ। अमिताभ बच्चन और रेखा को लेकर एक फिल्म का निर्माण शुरु हुआ था ‘एक था चंदर एक थी सुधा’ के नाम से। यह हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य ही है कि साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में प्रायः अधबीच में ही दम तोड़ देती हैं। इस फिल्म के साथ भी यही हुआ, कुछ रीलें बनीं और फिर फिल्म डिब्बे में बंद हो गई। इसकी शूटिंग इलाहाबाद में हुई थी, जिसमें अमिताभ पर इलाहाबाद में साइकिल चलाने के दृश्‍य फिल्माए गए थे। एक पूरा गाना भी रफी की आवाज में रिकार्ड किया गया था, जिसे बाद में अधूरी फिल्मों के टुकड़े जोड़कर बनाई गई ‘फिल्म ही फिल्म’ शीर्षक फिल्म में इस्तेमाल किया गया।

Sunday, 13 December 2009

कलिंग की युद्ध भूमि को देखकर

कई बरस पहले उड़ीसा गया था। उस वक्‍त धौलगिरि और कोणार्क देखकर कुछ कविताएं लिखी थीं। इतने साल गुजर गए हैं, लेकिन ये कविताएं मुझे आज भी अच्‍छी लगती हैं। अपने पाठक-मित्रों के लिए आज ये दो कविताएं प्रस्‍तुत कर रहा हूं।


एक

जहाँ लड़ा गया था युद्ध
वहाँ खेत खड़े हैं धान के
और काजू का लहलहाता जंगल


युद्ध भूमि क्या हमेशा
उपजाऊ ही होती है
या धरती चुकाती है
पिये गये रक्त का क़र्ज़ ?

दो

इतनी शांत है दया*
गोया अभी तक याद हो
गौतम से जो आया था
अशोक तक शान्ति का उपदेश


इसी जल में बहा होगा लाखों सैनिकों का रक्त
शान्त दया के सीने में अभी भी दबे होंगे
लाखों सैनिकों के कवच-कुण्डल अस्त्र-शस्त्र

एक नदी की गवाही क्या काफ़ी नहीं है
रक्तपात के ख़िलाफ़


दया से पूछो
नरसंहार देखकर
कितना रोयी होगी
पछाड़ें मार-मार
धौलगिरि की चट्टानों से


राम ने ली सरयू में जल-समाधि
अशोक ने लिया शांतिव्रत दया की साक्षी में


नदियों ने ही बचाया है
इंसान को हैवानियत से
नदियों ने ही बनाया है
पुरुष को पुरुषोत्‍तम


नदियों के इस बचाने और बनाने में ही छिपा है
नीर-क्षीर विवेक ॰



*दया - नदी का नाम

Sunday, 6 December 2009

छह दिसंबर : दो कविताएं


छह दिसंबर, 1992 के सांप्रदायिक दावानल के बाद  दो कविताएं लिखी थीं, जो कहीं प्रकाशित नहीं हुईं। आज सत्रह बरस बाद भी मैं वही पीड़ा और आक्रोश महसूस कर रहा हूं, जो उस वक्‍त इन कविताओं को लिखते समय था। समय कभी कम नहीं करता यादों के जख्‍म, बल्कि तासीर बढ़ा देता है। सांप्रदायिक हिंसा में इन सत्रह बरसों में मारे गए लोगों के प्रति शोकांजलि के रूप में प्रस्‍तुत हैं ये कविताएं।

कारसेवक

वादाफरामोश आए हैं
नई मिसालें लाए हैं
बनाने गए थे
ढहाके आए हैं

6 दिसंबर का एक अखबार

घिसी पिटी गजटनुमा सरकारी खबरों और
रात भर की भयावह आशंकाग्रस्‍त प्रतीक्षा के बाद
सुबह मिला अखबार

देखते ही लगा
इससे तो बेहतर है
वह सरकारी बुलेटिन

जब चौथा खंभा ही करने लगे
हत्‍यारों की हिमायत
देशभक्‍तों को सिखाने लगे सबक
करने लगे घृणा का व्‍यापार
तब ढुलमुल सरकारी खबरें ही देती हैं सुकून

अपराधी-उपद्रवियों को कहा जाए बलिदानी कारसेवक
तो सचमुच ऐसे अखबार को कर देना चाहिए
सिगड़ी के हवाले

Friday, 4 December 2009

राजस्थानी लोकगीतों में नारी संवेदना




बचपन से मैं विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले महिलाओं के गीत सुनता आया हूं और साहित्य में रूचि पैदा होने के बाद से इन गीतों के विविध पक्षों को लेकर सोचता विचारता रहा हूं। सबसे पहले मुझे जिन गीतों ने आकृष्ट किया, वो थे विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले गीत। इनमें भी खास तौर पर समधी और समधन को लेकर गाए जाने वाली गालियां। मेरी स्मृति में आज भी उस बारात की याद बहुत ताजा है जिसमें मैंने पहली बार इन वैवाहिक गालियों को गौर से सुना था। यह उस किशोरावस्था के दौर की बात है, जब शब्दों के अर्थ समझ में आने लगे थे और खुद भी तुकबंदी की उधेड़बुन प्रारंभ कर दी थी। मेरे ननिहाल पक्ष में विवाह था और गर्मियों की छुट्टियों के दिन थे। उस बारात में हम एक गांव में गए थे। वहां गांव की महिलाओं ने जिस तरह खुलकर गालियां गाईं थीं, वो अविस्मरणीय है। वर पक्ष के तमाम महत्वपूर्ण पुरुषों के नाम वधू पक्ष की स्त्रियां बारात में आए हम बच्चों से पूछतीं और फिर सबके नाम ले-लेकर खुलकर गालियां गाती जातीं और बारातियों के लिए पूरियां बेलने और सब्जी काटने के काम निपटातीं जातीं। उन बहुत-सी गालियों में एक आज भी याद रहती है तो इसलिए कि यह आज भी बतौर शगुन सब जगह गाई जाती है। समधी का नाम चाहे जितना लंबा या छोटा हो स्त्रियां उसे इस छोटे से छंद में बहुत खूबसूरती से पिरोकर अपने जज्बात का इजहार कर ही देती हैं।

रामू जी की लौंठी बड़ी मसतानी
म्हारी बोतल को डाटो बा ही खोलै
लुळ जा रै पतासा दिन उगियौ


अर्थात रामू जी की पत्नी बड़ी मस्त है, मेरी शराब की बोतल का ढक्कन वही खोलेगी। इसके बाद की पंक्ति सिर्फ छंद की पूर्ति के लिए है, इसका सिर्फ इतना ही अर्थ है कि बताशे अब झुक जा, दिन उगने वाला है। वस्तुतः यह वैवाहिक अवसरों पर महिलाओं द्वारा समय काटने का गीत है, जिसमें एक किस्म की मस्ती और ठिठोली है, एक नए बनने वाले संबंध को सहज बनाने की कोशिश है। इस तरह वे अपने तमाम समधियों के नामों से परिचित हो जाती हैं। इसमें अगर समधन का नाम मालूम हो जाए तो उसे भी पिरो दिया जाता है।

बहरहाल हम जब वापस लौटे तो रास्ते में दूल्हे के मामा का गांव था, वहां भी बारात की मेजबानी की गई और एक दिन ठहराया गया। यहां भी रात भर मांगलिक गीतों के साथ गालियां गाई गईं। तीसरे दिन जब बारात शहर आई तो मालूम हुआ कि दो दिन बाद लड़की वाले लड़की को लेने आएंगे और साथ में स्त्रियां भी आएंगी। राजस्थान में समधनों के इस मिलन को ‘समडोळा’ कहते हैं, इसके बिना समधन कभी एक दूसरे से नहीं मिलतीं। इस परंपरा के पीछे संभवतः यही आशय रहा होगा कि समधनों का यदि आकस्मिक मिलन होगा तो वह शिकवे-शिकायत का होगा। इसलिए ऐसी व्यवस्था बनाई गई कि एक उत्सवी मिलन हो जाए तो भविष्य में इस प्रथम मिलन की स्मृतियां संबंधों में कड़वाहट की जगह मधुरता पैदा करेगी। तो दो दिन बाद जो समधिनों का महामिलन हुआ, वह जबर्दस्त था। दोनों तरफ लंबे-चौड़े परिवार थे, इसलिए दोनों ओर से सैंकड़ों स्त्रियां एक साथ जमा हुईं। इक्का-दुक्का साड़ियों में और बाकी सब लहंगे और लूगड़ी में थीं। एक रंगीन नजारा था, भरपूर उत्साह और आनंद का। और फिर शुरु हुआ गालियां गाने का मुकाबला। दोनों तरफ से एक प्रतियोगिता जैसा माहौल बन गया, कव्वाली की तरह सवाल-जवाब का सिलसिला चल निकला और बिना किसी साज-बाज के गालियां इतने प्रभावी ढंग से गाई जाने लगीं कि एक संगीतमय वातावरण बन गया। ऐसे में किसी के भी पैर थिरक सकते हैं, सो दोनों तरफ से महिलाएं नाचने लगीं। मुकाबला दिलचस्प होता जा रहा था, शक्ति प्रदर्शन के लिए वर पक्ष की एक महिला ने मूसल थाम लिया था और उसे धरती पर खम ठोकने के अंदाज में हर टेक के साथ जोरों से जमीन में पैबस्त करने की कोशिश करतीं। वधू पक्ष कहां पीछे रहने वाला था, पास में एक थान था, जिस पर धूणा जलता रहता था, कोई वहां से एक चिमटा उठा लाई और फिर वधू पक्ष की सबसे दमदार गायिका ने उस चिमटे को तलवार की तरह लहराकर अपना शक्ति प्रदर्शन किया। कोई दो-तीन घण्टों तक यह दिलचस्प मुकाबला चलता रहा, जो बाद में खाने और विदाई तक निर्बाध गति से जारी रहा।

इस लंबे संस्मरण का मकसद यह बताना है कि राजस्थानी समाज एक बंद समाज है, जिसमें महिलाओं को बहुत कम अवसर मिलते हैं, जहां वे अपने आपको किसी भी प्रकार व्यक्त कर सकें। शादी-ब्याह के मौके पर उन्हें जो सीमित स्वतंत्रता मिलती है उसमें वे पुरुष सत्ता को ललकारती हैं, अपने आक्रोश को व्यक्त करती हैं और अगले अवसर तक ‘रिलेक्स्ड’ महसूस करती हैं। बंद समाजों में स्त्रियों को इस प्रकार के अवसर कम मिलते हैं जब वे पुरुषों को चुनौती दे सकें, उनके साथ चुहल कर सकें। विवाह और होली के अवसर पर ही उन्हें इसके लिए इजाजत मिलती है, जिसका वे भरपूर इस्तेमाल करती हैं। बारात के आगमन पर दूल्हे का स्वागत सत्कार तो ‘तोरण आयो राइबर’ जैसे सुंदर गीतों से किया जाता है, लेकिन बारातियों के लिए गाली गाई जाती है-

काळा-काळा ही आया रै
गोरो एक न आयो
बूढ़ा-बूढ़ा ही आया रै
छोरो एक न आयो
छोटा-छोटा ही आया रै
लांबो एक न आयो


राजस्थानी लोक संस्कृति के विविध पक्षों पर विचार करते हुए, खास तौर पर गीतों के सामाजिक पक्षों पर गौर करते हुए मुझे कई नई जानकारियां पता चलीं। अपनी एक कविता के लिए मुझे जब अंग्रेजी के ‘डिम्पल’ शब्द का कोई हिंदी पर्याय नहीं मिला तो मैंने राजस्थानी के विद्वान कवि चंद्रप्रकाश देवल से पूछा कि क्या राजस्थानी में कोई ऐसा शब्द है? उन्होंने कहा कि भारतीय सौंदर्यशास्त्र में डिम्पल कोई उपमा या सौंदर्य का मानक नहीं है, इसलिए इसका पर्याय कहां मिलेगा। हमारे यहां तो प्रेमी या प्रेमिका के लिए ही कोई शब्द नहीं, लोककथा के प्रेमी-प्रेमिकाओं के नाम या गोरी, जोड़ायत जैसे संबोधनों से ही अपने प्रिय को बुलाया जाता है। संभवतः यही बात आज पूरे देश में देखी जा सकती है, जहां सब स्त्री-पुरुष अपने बच्चों की मार्फत पति-पत्नी को बुलाते हैं, गोलू की मां-गोलू के पापा जैसे संबोधनों से।

पिछले दिनों आदरणीय विजयदान देथा द्वारा संग्रहित और संपादित ‘गीतों की फुलवाड़ी’ पढ़ते हुए राजस्थानी लोक गीतों के भीतर की सामाजिक चेतना के कई पहलुओं को जानने का अवसर मिला। राजस्थानी के जितने भी प्रेम गीत हैं, उनमें पति प्रेम के गीत हैं, स्वतंत्र प्रेम के नहीं। जहां भी लड़की ने किसी दूसरे प्रेमी की कल्पना की तो वह निषिद्ध है, फिर वो चाहे मोर जैसा सुंदर पक्षी ही क्यों ना हो। मोर हो या जोगी, इन पर मोहित होने का मतलब है, ये मारे जाएंगे। ननद अपनी भाभी के साथ पानी लेने जाती है और रास्ते में या कुए-तालाब पर अगर किसी परपुरुष को देख भी लेती है तो भाभी ननद की मिन्नतें करती हैं कि वह ससुराल में किसी को नहीं बताए, वरना गजब हो जाएगा। इन प्रेमगीतों की इस पृष्ठभूमि के आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहली बात तो यह कि भले ही बंद समाज में प्रेम की आजादी ना हो, पति के परदेस जाने या अन्यान्य कारणों से रूपवान पुरुष पर मोहित होने की स्थितियां समाज में होती थीं और इस पाप की सजा होती थी, जो आज भी राजस्थान, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के कई समाजों में देखा जा सकता है। इन गीतों से एक और बात पता चलती है कि अविवाहित स्त्री भी प्रेमी का स्वप्न अगर देखती है तो वह किसी राव या राजकुमार तक लाकर सीमित कर दिया जाता है। एक गीत में एक कुंवारी लड़की सिंध के एक राजकुमार रायधन का स्वप्न देखती है, जिसे माता खारिज कर देती है, कारण सिंध में अकाल पड़ा है और यहां खूब मेह बरसा है, इसलिए राव से ब्याहेंगे। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि बेटी को दूर मुश्किल हालात में नहीं ब्याहना।


राजस्थानी प्रेम गीतों में ‘कुरजां’ बहुत लोकप्रिय गीत है। कुरज एक प्रवासी पक्षी है जो मध्य एशिया से चलकर हर साल राजस्थान के रेतीले इलाकों में आता है और तालाबों के किनारे डेरा डालता है। इसके प्रवास स्थल में कंकड़ बहुत होते हैं, जिन्हें कुरज खाना पसंद करता है। कहते हैं कि कुरज पक्षी एक ही बार जोड़ा बनाता है। राजस्थानी लोक परंपरा ने इस मिथ को अपने भीतर इस कदर गूंथा है कि कुरज का मादा रूप कुरजां हो गया। अब नायिका या विरहणी के लिए कुरजां एक ऐसा माध्यम बन जाती है, जो उसके परदेस गए पति को उसका संदेश पहुंचा सकती है। कुरजां का परदेस कहीं और है, लेकिन भोली नायिका के लिए सब परदेस बराबर हैं। कुरजां की मनुहार करती नायिका कहती है कि क्या कंकड़ खाती है, तुझे सच्चे मोती चुगाउंगी, मेरे प्रियतम तक मेरा संदेस पहुंचा दे। कुरजां संदेश लेकर जाती है और पिया को साथ लाती है। ‘कुरजां ऐ म्हारो भंवर मिला दियो ऐ।’

पीहर और ससुराल के गीतों में नारी की वही सनातन कोमल भावनाएं हैं, जिसके तहत वह परदेस में ससुराल नहीं चाहती और हो जाता है तो पीहर की याद में रोती हुई गाती रहती है। फिर भी वह खुश है, तमाम मुश्किल हालात के बावजूद वह अपने सुंदर पति और भरे-पूरे ससुराल से प्रसन्न है, बस याद सताती है। यह एक प्रकार से स्त्री की भावनाओं को सीमित कर देता है और ऐसे वातावरण की सृष्टि करता है, जिसमें स्त्री के दुख कविता में व्यक्त तो होते हैं, लेकिन एक किस्म से स्त्री यहां समझौता कर लेती है। वह प्रतीकों में अपनी बात कहती है और गीत गाने भर से मुक्त हो जाती है। लोक की यह खास विषेषता भी है, जिसमें वह अपने दुख-दर्द के लिए किसी सांस्कृतिक माध्यम या कला रूप में अपनी शरणस्थली ढूंढ़ लेता है।

यहां मुझे एक गीत याद आ रहा है जो किसी भी जनम, मरण या परण के अवसर पर सबसे पहले गाया जाता है। यह एक प्रकार की वंदना है, जो भगवान गणेश को ‘घर आओ गजानंद राज’ कहने से शुरू होता है और फिर इसमें तमाम देवी, देवताओं, लोक देवता-देवियों तक को घर आने का निमंत्रण दिया जाता है। यह गीत अत्यंत सामान्य ढंग से प्रारंभ होता है और जैसे-जैसे इसमें देवी-देवता बढते जाते हैं, इसके गाने की गति और ओज भी बढता जाता है। सुनते हुए लगता है जैसे स्त्री जाति तमाम देवी-देवताओं को ललकार रही हों कि आओ और देखो हम किस हाल में रह रही हैं। यह गीत मुझे अक्सर वंदना से अधिक विद्रोह का गीत लगता है। मेरे विचार से स्त्री को जहां भी जगह मिली उसने अपनी व्यथा-कथा कहने का अवसर नहीं छोड़ा। फिर वो चाहे वंदना हो या गाली गायन। लोकगीतों में छिपी इस चेतना के स्वरों का जितना अवगाहन किया जाएगा, हमें लोक संस्कृति के उतने ही नए और महत्वपूर्ण पहलू नजर आते चले जाएंगे।

यह आलेख लोक संस्‍कृति की महत्‍वपूर्ण पत्रिका 'मड़ई' के अंक-2009 में प्रकाशित हुआ है।

Wednesday, 2 December 2009

मित्रों के आग्रह पर ब्‍लाग पर कविता



बहुत से पाठक और मित्रों का लंबे समय से आग्रह था कि अपने ब्‍लाग पर कविताएं भी प्रकाशित करनी चाहिएं। मैं बहुत संकोच में था, लेकिन अब लगता है कि जो कविताएं संग्रह में हैं और बहुत से पाठक-मित्रों ने नहीं पढ़ी हैं, उन्‍हें यहां दिया जा सकता है। इस तरह शायद इन कविताओं को एक नया पाठक वर्ग मिले। और इन कविताओं की कुछ और परख हो सके। आज जो कविता सबसे पहले दे रहा हूं, वह इतिहास की एक पुस्‍तक पढ़ते हुए सूझी थी। इतिहास सुंदरी आम्रपाली का एक प्रसंग पढ़ा था कि वह अपने अंतिम दिनों में बौद्ध भिक्षुणी हो गई थी। मुझे इस प्रसंग को पढते हुए लगा कि क्‍या वजह रही होगी और क्‍या मानसिकता रही होगी आम्रपाली की, कि उसे अंतिम शरण धर्म में मिली। क्‍या आध्‍यात्मिकता की तरफ झुकाव के पीछे मनुष्‍य के व्‍यक्तिगत जीवनानुभव होते हैं, या जीवन के एक मोड़ पर आकर संसार और जीवन को निस्‍सार समझने से यह संभव होता है। ऐसे कई सवालों से जूझते हुए यह कविता लिखी थी। आज पाठक और मित्रों से जानना चाहता हूं कि वे इस कविता के कुछ और अर्थ भी खोल सकेंगे और मेरा ज्ञानवर्धन कर सकेंगे।  

वैशाली-सी दुनिया में


नगर भर को
खुश रखने के जतन में
रोज़ रेतघड़ी में से रिसती रेत की मानिंद
भीतर ही भीतर कण-कण रिसती रही आम्रपाली

सिक्कों की खनक और चमक के बदले
किसी न किसी का पहलू
रोशन करती रही आम्रपाली

छाता ही रहा उसकी आत्मा पर
अंधकार का काजल

महागणिका होते हुए भी उसने
अनुभव किया खुद को
साधारण से भी तुच्छ

झोंपड़ों में पली आम्रपाली को
रास न आया महागणिका का वैभव
उसके रोम-रोम ने पुकारा
तथागत ! तथागत ! तथागत !

आम्रपाली चाहती है
आख़िरी बार रमण करना
मृत्यु की तरह आयें तथागत

वैशाली-सी दुनिया है यह
और ज़िंदगी आम्रपाली है ॰

Sunday, 29 November 2009

अर्थवान की तलाश में निरर्थकता के दर्शन का लेखक - अल्बैर कामू



भारत में जिन विदेशी रचनाकारों को सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है, उनमें अल्बैर कामू एक ऐसा नाम है, जिनकी रचनाओं का भारत की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। 1957 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित कामू, रूडयार्ड किपलिंग के बाद दूसरे ऐसे साहित्य़कार हैं जिन्हें महज 44 वर्ष की आयु में वैश्विक प्रतिष्ठा मिली। 7 नवंबर, 1913 को अल्जी़रिया के कृषि मजदूर पिता के घर में जन्मे कामू ने शुरुआत में अत्यंत संघर्षपूर्ण जीवन जीया। जन्म को एक साल भी नहीं हुआ था कि पिता की युद्ध में मृत्यु हो गई। मां की एक हादसे में सुनने-बोलने की क्षमता आधी रह गई थी। लेकिन विधवा मां ने अपने इस इकलौते सपूत के पालन-पोषण में कोई कमी नही रखी। कामू ने छात्रवृत्ति से अपनी शिक्षा जारी रखी। कई किस्म की छोटी-मोटी नौकरियां करते हुए वे एक अखबार के संपादक बने। 22 बरस की उम्र में दर्शनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त करते ही दर्शनशास्त्र पर लिखे लेखों की पुस्तक प्रकाशित हुई तो अल्जीरिया में एक लेखक के रूप में कामू की ख्या‍ति फैल गई।


रंगमंच, पत्रकारिता, वामपंथी राजनीति और दार्शनिक-सामाजिक गतिविधियों के बीच कामू ने अपना पहला उपन्या‍स ‘अजनबी’ लिखा और एक उपन्यासकार के तौर पर उनकी कलम का लोहा माना जाने लगा। इस पहले उपन्यास ने बीसवीं सदी के अस्तित्ववादी दर्शन को एक विशाल कैनवास प्रदान किया। जर्मनी के नाजीवाद के कुकृत्यों को कामू ने धर्म, राजनीति, दर्शन और मानव अस्तित्व के सवालों के कटघरे में खड़ा कर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि नाजीवाद एक निरर्थक और अमानवीय विचार है, जिसकी वजह से मनुष्य जाति का ही भविष्य संकट में पड़ गया है। इस उपन्यास के साथ ही कामू के सुप्रसिद्ध दार्शनिक लेख ‘मिथ ऑफ सिसिफस’ का प्रकाशन हुआ। इस पुस्तक में कामू ने निरर्थकतावाद के दर्शन को प्रस्तुत किया। कामू की मान्यता थी कि एक अदृश्य ईश्वर की कपोल कल्पना में बनाई गई इस दुनिया में अर्थ, एकता या समरूपता की खोज करना निरर्थक है। ग्रीक मिथक सिसिफस के माध्यम से कामू ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि संघर्ष का अपना आनंद है, भले ही वह लोगों की नजरों में निरर्थक हो और सबसे बड़ी बात यह कि सारी निरर्थकता के बावजूद आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है, बल्कि विद्रोह और क्रांति ही विकल्प है।

1947 में कामू का एक और विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘प्लेग’ प्रकाशित हुआ। एक शहर में प्लेग की महामारी फैलने का यह रोमांचक दस्तावेज है, जिसमें कामू की कलम पाठक की समूची चेतना को इस कदर झिंझोड़ कर रख देती है कि पाठक खुद को रोगी समझने लग जाए। विश्वसाहित्य में किसी महामारी की त्रासदी को लेकर लिखा गया संभवत: यह अकेला उपन्यास है। चिकित्सक, मरीज, पत्रकार, प्रशासन और पूरे नगर का महामारी के आतंक में जीता हुआ वातावरण इतनी गहरी संवेदना और लेखकीय संलग्नता के साथ लिखा गया है कि नियति और मानवीय स्थितियों को लेकर ढेरों सवाल उठ खड़े होते हैं। इस उपन्यास की हर पंक्ति अपने भीतर एक से अधिक अर्थ व्यक्त करती हुई पाठक की चेतना को कई स्तरों पर सोचने के लिए विवश करती है। इस उपन्‍यास को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों के खिलाफ फ्रांसिसी विद्रोह का प्रतीकात्मक आख्यान भी माना जाता है।

कामू की मान्यता थी कि उपन्यास दर्शनशास्त्र को दृश्य और बिंबों में व्यक्त करने के अलावा कुछ नहीं है। दर्शन और साहित्य के साथ राजनीति में समान विचारों के कारण प्रारंभ में अल्बैर कामू और ज्यां पाल सार्त्र की जबर्दस्त दोस्ती रही, लेकिन आगे चलकर राजनैतिक विचारों में मतभेद के कारण यह दोस्ती टूट गई। कामू और सार्त्र दोनों को अस्तित्ववाद का प्रवर्तक माना जाता है, लेकिन दोनों ने ही इससे इन्कार किया, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद के लेखकों में इन दोनों की प्रसिद्धि विश्वव्यापी रही। कामू ने अपने दार्शनिक और राजनैतिक विचारों के कारण बहुत से मित्रों को भी दुश्मन बना डाला था। वामपंथी झुकाव के बावजूद उन्होंने सोवियत रूस, पोलैंड और जर्मनी की सरकारों के कई निर्णयों की खुलकर आलोचना की। कामू के विचारों में मानवाधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और इसीलिए उन्होंने मृत्युदण्ड की जबर्दस्‍त आलोचना की। सार्त्र से संबंध विच्छेद से पहले कामू ने 1951 में ‘द रिबेल’ पुस्‍तक लिखी, जिसमें सत्ता के विरुद्ध मानव के विद्रोह के विभिन्न स्‍वरूपों और सिद्धांतों की गहरी पड़ताल की गई है।

1956 में कामू का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुआ ‘पतन’। इसमें एक धार्मिक व्‍यक्ति किसी बार में बैठकर एक अजनबी के सामने अपने द्वारा किये गए अपराध स्वीकार करता है। इस प्रकार कामू जहां धार्मिकता के आवरण में छिपे पाखण्डों को उजागर करते हैं वहीं ज्यां बैप्टिस्ट के चरित्र के कथनों के माध्यम से आधुनिक व्यक्ति पर भी प्रहार करते हैं जो बार में बैठकर अपने गुनाह स्वीकार करता है। कामू ने अपने जीवन में ढेरों कहानियां और नाटक भी लिखे, जिनमें ‘कलिगुला’ नाटक बेहद प्रसिद्ध है। अल्जीरिया उस वक्त फ्रांस का उपनिवेश था, इसलिए कामू मुक्ति संग्राम के सिपाही भी थे। उनके दर्शन में इसीलिए विद्रोही विचारों की व्याप्ति मिलती है। कामू अपने देश को लेकर एक विशाल उपन्यास की रचना करना चाहते थे, जिसमें अल्जीरिया की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को एक बड़े व्यापक परिदृश्य पर प्रस्तुत करना चाहते थे। एक उपन्यास और कई कहानियां उनकी अधूरी रह गईं। 4 जनवरी, 1960 को एक कार दुर्घटना में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। निधन के बाद उनकी बेटी कैथरीन ने उनकी अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित कराया। 1970 में ‘ए हैप्पी डैथ’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें ‘अजनबी’ से मिलती जुलती कहानी है। 1995 में ‘द फर्स्ट मैन’ प्रकाशित हुआ, यह कामू का अधूरा उपन्यास है, जिसमें कामू ने अल्जीरिया में अपने बचपन के दिनों की यादें आत्मकथा के रूप में लिखी हैं। कामू ने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था कि अगर किसी भी चीज का कोई अर्थ नहीं है तो तुम सही हो, लेकिन फिर भी कुछ है जो अर्थवान है। कामू के साहित्य से उन्हीं अर्थवान चीजों को जानने और समझने की शक्ति मिलती है जो तमाम निरर्थकताओं के बावजूद अपने आप में ही नहीं मनुष्य जाति के लिए भी अर्थवान हैं। हिंदी में कामू की अधिकांश साहित्यिक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं, दार्शनिक विषयों पर लिखी पुस्तकें अभी आना बाकी हैं।

( यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 29, नवंबर, 2009 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।)

Saturday, 28 November 2009

दिसंबर के एक सर्द सफर की याद




लेखकों के साथ यूं तो बहुत-सी यात्राएं की हैं, लेकिन दिसंबर की कड़ाके की ठण्ड में किये गए दो लंबे सफर यादगार हैं। पहली याद दिसंबर 2005 की है, जब हम 25 लेखक दिल्ली से वाघा के रास्ते पाकिस्तान जा रहे थे। मैं पहली विदेश यात्रा के जोम में था, इसलिए दो-चार पैग ज्‍यादा लेकर बैठा था। सुबह करीब छह बजे आंख खुली तो ब्‍लैकआउट की वजह से याद ही नहीं आया कि बस में मैंने सामान रखा भी था कि नहीं। मैंने साथी लेखकों की तरफ देखा तो ज्‍यादातर सोए हुए थे, चंद्रकांत देवताले ही जागृत थे। मैंने उनसे पूछा तो उन्‍होंने आश्‍वस्‍त किया कि तुम्‍हारा सामान रख दिया गया था। लेकिन मैं असमंजस में था। बस एक ही खयाल आ रहा था कि कहीं बस रुके तो डिक्‍की खुलवाकर देख लूं। घने कोहरे की वजह से बस बहुत धीरे चल रही थी। लुधियाना से आगे सुबह के नौ बजे सबकी इच्छा हुई कि अब चाय पीनी चाहिए, सो एक ढाबे पर रुक गए। इलाहाबाद के एक बुजुर्ग शायर कोहरे में किसी खुले स्थान पर हल्के होकर आए तो उनके पीछे-पीछे एक नौजवान लाठी लेकर गुस्से में पंजाबी में गालियां बकता आ गया। लंबी बहस के बाद मामला समझ में आया कि बुजुर्गवार जिस जगह हल्के होकर आए हैं वहां एक बड़ा होटल है, जो कोहरे की वजह से दिखाई नहीं दिया। पच्चीस लोगों में महिलाएं भी थीं, जिनकी वजह से नौजवान शांत हो सका और उसके होटल में चाय-ना'श्‍ते के वादे पर मामला हंसी-खुशी में निपट सका। अगर कोहरा ना होता तो हम वाघा सुबह के सात बजे पहुंच सकते थे, लेकिन पहुंचे बारह बजे।

लाहौर रेल्वे स्टेशन पर जब हम सांझ ढले सात बजे अपनी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, तो दो डिब्बों में लेखकों का बंटवारा होना था कि छह सीटों वाले डिब्बे में कौन बैठेगा और बीस वाले में कौन? आखिर तय हुआ कि सूफी मत के छह लेखक अलग हो जाएंगे और बाकी सब एक साथ। इन छह में कवि राजेंद्र शर्मा अनचाहे ही फंस गए। खैर, हम बीस लेखक एक डिब्बे में बैठ तो गए, लेकिन यह समझ में नहीं आया कि रेल में और वो भी पाकिस्तान में रसरंजन कैसे होगा? बाद में पता चला कि हमारे पाकिस्तानी दोस्त छह फीट लंबे इरशाद अमीन ने रेल के सुरक्षा प्रहरियों को पहले ही समझा दिया था कि इस डिब्बे में हिंदुस्तानी लेखक-पत्रकार हैं। मैं जयपुर से ही ठण्ड में जकड़ा हुआ चला था। मुझे ऊपर वाली बर्थ पर जमना था, नीचे की बर्थ बुजुर्ग और लेखिकाओं के लिए थीं। मेरे नीचे वाली बर्थ पर चंद्रकांत देवताले बैठे थे। रेल का डिब्बा वातानुकूलित था, लेकिन सर्दी इतनी गजब की थी कि एसी के बावजूद कंपकंपी छूट रही थी। मेरे जैसे कई लेखक थे, जो इस भयानक सर्दी में गला तर करके सुकून पाना चाहते थे। हमारे मेजबान दोस्त ने जब अपना पिटारा खोला तो सबकी बांछें खिल गईं। वोदका के घूंट हलक में उतरे तो कंपकंपी कम हुई। गीत और गजलों की महफिल सज गई और चलती रेल में सुर और सुरा की सरिता बहने लगी। हमसफर पाकिस्तानी नागरिक भी इसमें मजा लेने लगे और सुबह होते-होते तो हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी यात्रियों में ऐसा भाईचारा स्थापित हो गया कि लेखिकाएं ही नहीं कई बुजुर्ग लेखक पाकिस्तानी यात्रियों के सफरी कटोरदानों में नाश्‍ता करते नजर आने लगे।
मेरी हालत सर्दी की वजह से खराब थी और दवाइयां कोई असर नहीं कर रही थीं। देवताले जी ने अपने बैग में से मेरे लिए सोंठ निकाली और कहा इसे चबाते रहो, तुम्हारे पान मसाले से बेहतर है यह। मैंने पान मसाला छोड़कर सोंठ चबाना शुरु किया तो कराची पहुंचते-पहुंचते इतना आराम मिला कि अगले दिन पता ही नहीं चला कि कब-कैसे सीने में जमा बलगम गायब हो गया और बंद नाक खुल गई।

कराची से लौटते वक्त हम लोग एक नॉन एसी बस में रवाना हुए। बॉर्डर एरिया और डाकू-लुटेरों के भय के कारण सारे शीशे बंद कर दिए गए। बहुत घुटन होने लगी तो हवा के लिए कण्डक्टर ने छत वाली खिड़की खोल दी। रेतीले इलाके की धूल बस में समाने लगी और विभूति नारायण राय की हालत खराब होने लगी। वो खिड़की बंद करनी पड़ी। सेवण के शाहबाज कलंदर की दरगाह की जियारत कर हम ब्रिटिश जमाने के गेस्ट हाउस में रात बिताने पहुंचे। सुबह पांच बजे ही हमें जगा दिया गया, मोहन्जोदड़ो जाने के लिए। छह बजे नाश्‍ता लग गया। एकाध वीर लेखक नहा धोकर तैयार हो गए थे। आलोचक खगेंद्र ठाकुर इतनी सुबह चार परांठे खा चुके थे और सबको चकित कर दिया था। बाहर निकले तो जिंदगी की अब तक की सबसे खूबसूरत सुबह देखी। सिंध नदी कोहरे में लिपटी हुई मंथर गति से बह रही थी और आसमान में सूरज के आने से पहले का सुरमई और सुनहले रंगों का कैनवस मंडा हुआ था। एक तरफ दरगाह की रोशनी थी और दूसरी जानिब सूर्यदेव की कलाकारी। हम तमाम लेखक इस रंगीन सुबह के मोहपाश में इस कदर जकड़ गए थे कि चंद्रकांत देवताले और कमला प्रसाद ने कहा कि अपने कैमरे निकालो और इस सुबह को कैद कर लो, जिसमें हमारी तस्वीरें भी हों।


मोहन्जोदड़ो से लरकाना पहुंचे तो हमने अपने मेजबान दोस्तों से मिन्नत की कि कहीं कोई दुकान हो तो बता दें, हमारा कोटा खत्म हो चुका है। हमें जानकर ताज्जुब हुआ कि इतने बड़े नगर में शराब की कोई दुकान नहीं है, जबकि यहां हिंदुओं की अच्छी खासी आबादी है। हमें लगा कि हमारे मेजबान पक्के मुसलमान हैं। जब सब तरफ उम्मीदें खत्म हो चुकीं तो खयाल आया कि राय साहब और पवन कुमार के सामान में दो बोतलें हैं। दो दिन के सफर में एक नई पार्टी का गठन हो चुका था, जिसके महासचिव थे राय साहब। पार्टी की सदस्यता मुझ जैसे कुछ लोगों को प्राप्त हो चुकी थी, बाकी की विचाराधीन थी। राय साहब के पास जो बोतल थी, उसके बारे में वो इतना कुछ बता चुके थे कि उसे देखने भर से शायद हमारी प्यास शांत हो जाती। वे यह बोतल मॉरीशस से लाए थे, जिस पर मार्क ट्वेन की प्रसिद्ध उक्ति लिखी थी कि ईश्‍वर ने पहले मॉरीशस बनाया और फिर स्वर्ग। स्वर्ग मॉरीशस की नकल है।

सवाल यह था कि बस की छत पर तिरपाल में बंधे हमारे सामान में से वो बोतलें कैसे लाई जाए। लेखक के पास विचारों की कमी नहीं होती, इसलिए निरंतर चिंतन के बाद राय साहब की तबियत को आधार बनाया गया। उनकी दवा उनके सामान में बंद है, उसे निकालना है। बीच सड़क पर बस रुकवाई गई, खलासी के साथ कवि पवन कुमार बस की छत पर चढ़े और राय साहब के सूटकेस के साथ अपना बैग भी ले आए। अब रात आराम से गुजारी जा सकती थी। लेकिन सामान कम था और प्रत्याशी ज्यादा। देवताले जी ने मुझसे मनुहार की कि डेढ़ पैग से काम चल जाएगा। एक लेखिका ने भी सर्दी के कारण एक पैग की गुजारिश की। राय साहब की पार्टी की सदस्यता लेने वालों की तादाद बढ़ गई। उन्होंने घोषणा की कि समाजवाद की राह पर आगे चलना है, इसलिए यथासंभव कोशिश की जाएगी कि कोई तिश्‍नालब ना रह जाए। थोड़ी ही सही मिलेगी सबको। और सच में कोई तिश्‍नालब ना रहा। सबको मिली और एक सर्द सफर में सबको राहत मिली। लाहौर पहुंचे तो राय साहब की तबियत और बिगड़ गई। उन्हें वहां के सर गंगाराम अस्पताल ले जाया गया और सक्‍शन मशीन से उनका जमा कफ निकाला गया।
दिसंबर का दूसरा सर्द सफर डॉ. नामवर सिंह, शरद दत्‍त, प्रभुनाथ सिंह आजमी, कमला प्रसाद और राजेंद्र शर्मा के साथ भोपाल से छिंदवाड़ा पैसेंजर ट्रेन में फर्स्‍ट क्‍लास के कूपे में किया था, 2007 में। उस पर फिर कभी।