Saturday, 17 October 2009

रोशनी के रंग हजार





रोशनी और अंधकार के बिना इस सृष्टि में कुछ भी संभव नहीं होता। अंधेरा था इसलिए रोशनी का जन्म हुआ। कह सकते हैं कि रोशनी अंधकार की बेटी है यानी उजाला तम का पुत्र है। चित्रकला में कहा जाता है कि सफेद कोई रंग नहीं है, वह रंगों की अनुपस्थिति से उपजी रिक्तता है। इस प्रकार रोशनी अंधकार की अनुपस्थिति है लेकिन रिक्तता नहीं, मानव समाज के लिए वह अंधकार से पैदा होने वाली रिक्तता की पूरक है। विज्ञान कहता है कि रोशनी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन यानी विद्युतचुंबकीय विकिरण है। लेकिन भारतीय मनीषा ने ईसा से छह सौ बरस पहले कह दिया था कि यह सृष्टि जिन पंचतत्वों से बनी है उसमें अग्नि बहुत महत्वपूर्ण है। अग्निरूपी इस रोशनी की मनुष्य सभ्यता में लाखों बरसों से प्रतिष्ठा रही है, देश-धर्म के बंधनों से बहुत ऊंचा स्थान रहा है रोशनी का। हर जाति, मजहब, देश, काल में रोशनी को पवित्र माना गया है तो इसीलिए कि रोशनी से मनुष्य का रिश्ता जन्‍म से शुरू होता है और गर्भावस्था के तम से मुक्त होने और रोशन दुनिया में आने की कामना उसे रोशनी के हजार रंगों की ओर लिए चलती है। कहने को रोशनी के सिर्फ सात रंग होते हैं, लेकिन यह मनुष्य ही है जिसने उसे हजारों आयाम दे दिए हैं। इंसान के लिए रोशनी अब सिर्फ दिन के उजाले और रात में काम आने वाली रोशनी भर नहीं, बल्कि जिंदगी के हर हिस्से में रोशनी फैला देने से है।

रोशनी का इतिहास
विज्ञान में रोशनी को पहले यह माना जाता था कि प्रकाश की संरचना पदार्थ जैसी है, जिसे आगे चलकर आइंस्टीन तक आते आते पूरी तरह नकार दिया गया। इस परंपरा में आदि मुस्लिम वैज्ञानिक इब्न अल हसैन के अलावा देकार्त, न्यूटन, रॉबर्ट हुक और थॉमस यंग की खोजों को नहीं भूला जा सकता। अब विज्ञान कहता है कि रोशनी एक प्रवाहमान चीज है। लेकिन सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत में दीपावली का त्यौहार जिस तरह भगवान राम के अयोध्या आगमन को लेकर मनाया जाता है, उसी तरह दुनिया भर में दीपोत्सव को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं, और लगभग सभी धर्मों और संस्कृतियों में रोशनी का उत्सव साल में एक बार जरूर मनाया जाता है। मसलन ईसाई समुदाय क्रिसमस को दीपावली की तरह मनाता है, इस्लाम में पैगंबर मोहम्मद साहब के जन्मदिन यानी बारावफात को चराग रोशन किये जाते हैं, सिक्ख समुदाय में गुरूनानक जन्मदिवस पर रोशनी सजाई जाती है, महावीर स्वामी की जयंती पर जैन और महात्मा बुद्ध की जयंती पर बौद्ध धर्मावलंबी अपने घर और पूजास्थलों को रोशन करते हैं। पारसी तो हैं ही अग्निपूजक। वैसे लगभग सभी धर्मों में पूजाघरों में दीपक जलाना या शमा रोशन करना प्रतिदिन का रिवाज है। मंदिर, मस्जिद, जिनालय, चैत्यालय में दीया और गिरजाघर में शमा रोशन करना वस्तुत: रोशनी की आराधना ही है। और इसके पीछे है मनुष्य की वह आदिम समझ जिसके चलते उसने प्रकृति की सबसे ताकतवर चीजों में अग्नि को सबसे उच्च स्थान दिया। जब पहली बार मनुष्य ने अग्नि का रौद्र रूप देखा होगा, फिर वो चाहे ज्वालामुखी से निकली हो, आकाश से बरसी हो या पेड़-पत्थररों के टकराने से पैदा हुई हो, तभी उसके प्रति भय मिश्रित श्रद्धा का भाव पैदा हुआ होगा। यही आगे चलकर दीपक या शमा जलाने में बदल गया। मानव सभ्य्ता का इतिहास रोशनी का इतिहास है, जिसमें येन केन प्रकारेण अंधकार से मुक्त होने और रोशन दुनिया बसाने की चाहत छुपी हुई है, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’।

रोशनी का दर्शन
सभ्यता के प्रारंभ से ही रोशनी मनुष्य के चिंतन का केंद्र रही है, इसीलिए रोशनी अपने भौतिक अर्थ और अभिप्राय: से आगे चलकर मनुष्य जीवन को सांगोपांग रूप से प्रकाशमान करने के व्यापक और विस्तृत अर्थ में तब्दील हो गई है। मानव समाज को कैसे एक ऐसी रोशन दुनिया बनाया जाए जिसमें किसी भी प्रकार का अंधकार ना हो, यह चिंतन सदियों से चला आ रहा है। भारतीय दर्शन परंपरा ने पहली बार रोशनी को इतने व्यापक और बहुलतावादी दृष्टिकोण से देखा और संपूर्ण सृष्टि को प्रकाशमान करने की परिकल्पना की। सबसे पहले सांख्य और वैशेषिक परंपरा के दार्शनिकों ने प्रकृति के मूल तत्वों पर चिंतन करते हुए प्रकाश को जीवन का महत्वपूर्ण कारक माना। महात्मा बुद्ध के अनुयायियों और जैन मुनियों ने इस परंपरा को समृद्ध करते हुए मनुष्य समाज को संपूर्णता में प्रकाशमान बनाने को लेकर मौलिक चिंतन किया, जिससे बहुत से नैतिक और सहज मानवीय मूल्यों की व्यापक परिकल्पना संभव हुई। इस प्रकार का प्रकाशमान चिंतन लगभग सभी धर्मों में हुआ और एक किस्म की वैश्विक सभ्य मानव समाज की सृष्टि के लिए रोशन खयालों की दुनिया का विस्तार हुआ।

हर तरफ रोशन हो दुनिया
आज के मानव समाज को हर तरफ रोशनी चाहिए, सिर्फ घरों की बिजली नहीं, लोगों के दिमाग भी रोशन होने चाहिए। शिक्षा की रोशनी हर ओर फैले, धार्मिक, राष्ट्रवादी और जातिवादी कट्टरता का अंधकार हटे, अंधविश्वास का तमस छंटे, समानता का प्रकाश फैले, मनुष्य जीवन के तमाम अंधकार दूर हों। दुनिया के सारे दीपोत्सव यही कामना करते हैं।
यूं दुनिया के विभिन्नि हिस्सों में मनाए जाने वाले लगभग सभी दीपोत्सव कृषक परंपरा से जुड़े हैं यानी फसल पकने के बाद के उत्सव हैं जिसमें नवान्न के साथ व्यक्ति और समुदाय की प्रगति की कामना जुड़ी हुई है। इस प्रकार देखा जाए तो यह दुनिया में किसी भी मनुष्य के भूखा ना रहने की कामना और स्वस्‍थ मानव समाज की परिकल्‍पना से जुड़ा दीपकामना का उत्सव है। आज के किसानों के हालात देखकर क्या हम एक बार फिर उस किसान के बारे में सोच सकते हैं जो बहुत बुरी हालत में है, आत्महत्या करने को मजबूर है। क्यों किसान के बेटे बंदूक उठा रहे हैं और क्यों खुशियों के पटाखों की जगह आतंक के खौफनाक धमाके हर ओर सुनाई दे रहे हैं। इन हालात में एक दीपक उनके नाम भी रोशन किया जाए, जो हमसे बिछुड़े और उनके नाम भी जो राह भटक कर अंधकार की राह जा रहे हैं। हर मजहब में जलने वाला दीपक मनुष्य के दिल और दिमागों को रोशन करे, इसी सोच के साथ सही मायनों में शुभ होगा दीपोत्सव।

सांध्य रवि ने कहा
मेरा साथ देगा कौन
सुनकर जगत सारा
रह गया निरूत्तर मौन
एक माटी के दीये ने कहा
नम्रता के साथ
जितना हो सकेगा
मैं करूंगा नाथ
रवींद नाथ टैगौर



यह आलेख जयपुर से प्रकाशित डेली न्‍यूज़ के रविवारीय 'हम लोग' की टॉप स्‍टोरी के रूप में 11 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित हुआ। चित्र गूगल से साभार।

Monday, 5 October 2009

मैं महज एक काला हब्‍शी हूं



नोबल पुरस्कार के इतिहास में अब तक सिर्फ तीन अश्वेत साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया है, जिनमें वोले शोयिंका और टोनी मॉरिसन के साथ डेरेक वालकोट का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। वेस्टन इण्डीज के छोटे-से देश सेंट लूसिया के बेहद प्रतिष्ठित कवि डेरेक वालकोट को जब 1992 में नोबल पुरस्कार दिया गया, तब इस कैरेबियन द्वीप समूह के साहित्य की ओर विश्व समुदाय का ध्यान गया। यूरोप और वेस्ट इण्डीज की संस्कृति के बीच बंजारों की तरह घूमने वाले वालकोट के सृजन संसार में कविता बहुत गहराई के साथ रची बसी है। गुलामों जैसी विरासत से चलकर नोबल पुरस्कार तक की सृजनयात्रा बेहद रोचक और दिल दहला देने वाली भी है, लेकिन वालकोट की मस्तमौला फकीरी जैसी काव्यात्मक जिंदगी एक आदर्श भी है और मानक भी। यह जानकर बेहद आश्चर्य होता है कि नोबल पुरस्कार लेते वक्त वालकोट ने भारतीय रामलीला का विशद वर्णन किया था। दरअसल वे ट्रिनीडाड के एक गांव में भारतीय मूल के लोगों द्वारा खेले जाने वाली रामलीला की बात कर रहे थे और उनके नोबल भाषण का एक लंबा हिस्सा उस रामलीला के बहाने जड़ों से उखड़े, गुलामी से निकलकर आए, उपनिवेशवाद के सताए लोगों के दर्द को बयान कर रहा था, जिसे पहली बार विश्वमंच पर इतना बड़ा सम्मान दिया जा रहा था।


चित्रकार पिता और टीचर मां के यहां वालकोट एक जुड़वां भाई रोड्रिक के साथ 23 जनवरी, 1930 को वालकोट का जन्म एक सुदूर द्वीप के एक गांव में हुआ। 18 बरस की उम्र में पहला कविता संग्रह आया और ‘इन ए ग्रीन नाइट’ संग्रह से वे चर्चा में आए। पत्रकारिता और देश-विदेश में अध्यापन करते हुए जीवनयापन किया और इन दिनों वे ट्रिनीडाड में रह रहे हैं। वालकोट के लेखन में उनके जीवन के आत्मसंघर्ष और कैरेबियन द्वीप समूह में रहने वाले लोगों की जिंदगी का सच्चा लेखा-जोखा देखने को मिलता है।

‘द फॉरच्यून ट्रेवलर’ और ‘मिडसमर’ में वालकोट ने अमेरिका में खुद को एक अश्वेत कवि के रूप में गहराई से देखने की कोशिश की। क्योंकि अमेरिका प्रवास के दौरान उन्हें रह-रह कर अपना कैरेबियाई परिवेश याद आता था। एक कवि ह्रदय व्यक्तित्व अपनी जड़ों उखड़कर कैसे अपने आपको तनहा महसूस करता है, इसे बहुत शिद्दत से वालकोट ने अपने इन संग्रहों में रेखांकित किया है। उनकी किताबों के ‘कास्टअवे’ और ‘द गल्‍फ' जैसे शीर्षक भी उनकी इसी मानसिक उधेड़बुन को व्यक्त करते हैं। उन्होंने अपने एक साक्षात्का्र में कहा था कि हम चाहे कहीं भी रहें, अमेरिका में या लंदन में, हमें महसूस होता है कि जैसे हमें अलग रखा जाता है, यह एक किस्म का अलगाववाद है।

वालकोट की सबसे मशहूर कविता है ‘ओमेरोस’, जो होमर से प्रेरित है। इस काव्यकृति में वालकोट ने होमर के प्रसिद्ध नाटक ‘इलियड’ और ‘ऑडिसी’ को कैरेबिया पृष्ठभूमि में पुनर्सृजित किया। चौंसठ अध्यायों वाली इस लंबी कविता में वालकोट ने निर्वासन, बिछुड़े हुए लोगों और कैरेबियाई जनजीवन का चित्रण करते हुए नस्लवाद के प्रति अपना गुस्सा और उपनिवेशवादी प्रवृत्तियों खासकर औपनिवेशिक संस्कृति का समूल नकार प्रस्तुत किया है। इस किताब में वे एक जगह लिखते हैं, ‘मैं महज एक काला हब्शी हूं / जिसे समुद्र से प्रेम है / मेरे पास गहरी औपनिवेशिक शिक्षा है / मेरे भीतर डच, नीग्रो और अंग्रेजी भाषाएं मौजूद हैं / या तो मैं कुछ नहीं हूं या फिर एक पूरा राष्ट्र हूं।‘

वालकोट कवि के साथ बहुत बड़े नाटककार भी हैं। उनके लिखे नाटकों में भी कविताओं की ही अभिव्यक्ति हुई है अर्थात् जो बात कविता में कही, उसे नाटक में पूरी कहानी के साथ कुछ और नाटकीय वैविध्य के साथ प्रस्तुत किया। दो दर्जन से अधिक नाटकों में उन्होंने पूरे कैरेबियाई द्वीप समूह की अंतसचेतना को बहुत गहराई से देखा-परखा है। चार सौ साल के गुलामी और औपनिवेशिक दासता वाले इतिहास की परत दर परत खोज करते हुए वे उस विराट जनसमुदाय की आवाज बन जाते हैं जो सदियों से अपमानित और प्रताडि़त होता आया है। यह वह जनसमुदाय है जिसे दक्षिण अफ्रीका और भारत से जहाजों में भरकर अंग्रेज वहां ले गए थे, जिनकी अपनी जुबान और संस्कृति उपनिवेशवाद के चलते गुम हो गई और वो एक अजीब सी मिली-जुली खिचड़ी किस्‍म की संस्कृति में रहने के लिए अभिशप्त हैं। इस जनता में वो भारतीय भी हैं जिनका वहां के सांस्कृतिक और सामाजिक ही नहीं आर्थिक और राजनैतिक रूप से भी महत्व है। भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक और नोबल पुरस्कार से सम्मानित सर वी.एस. नायपाल भी यहीं से गए थे और पॉप गायिका पार्वती खान भी यहीं की हैं।

वालकोट का सबसे प्रसिद्ध नाटक है ‘ड्रीम आन मंकी माउण्टेन’। इस नाटक में वालकोट ने कैरेबियाई संस्कृति का विहंगम परिदृश्य रचते हुए एक स्वनप्निल संसार की रचना की है जिसमें दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाता है। इस विविधतापूर्ण्‍ सांस्कृतिक परिदृश्य के बारे में और उसकी अपनी पीड़ा को लेकर वालकोट ने एक जगह लिखा है, ‘यहां हम सब अजनबी हैं...हमारे शरीर एक भाषा में विचार करते हैं और दूसरी भाषा में विचरते हैं।‘
वालकोट मानक अंग्रेजी और कैरेबियाई भाषा में समान रूप से लिखते हैं। उनकी मातृभाषा क्रेयोल है जो एक छोटे से समुदाय की भाषा है। उन्होंने अपने जुड़वां भाई की मृत्यु के बाद 2004 में अपनी आखिरी पुस्‍तक लिखी ‘द प्रोडिगाल’।

वालकोट का कहना है कि वे अपनी क्षमता का आठवां हिस्सा ही लिख सके हैं, और कैरेबिया द्वीप समूह में बोली जाने वाली तमाम टूटी-फूटी खिचड़ी भाषाओं से वे पूर्णत: परिचित हैं। डेरेक वालकोट ने विश्वसाहित्य का गहन अध्ययन किया, जिसके कारण उन्होंने अपनी रचनात्‍मकता में एक तरफ जहां यूरोपियन सर्जनात्मक मानदण्डों के अनुकूल प्रतिमानों का प्रयोग किया वहीं अपने कैरेबियाई द्वीप समूह की गहरी संवेदनशील और आत्मीयता भरी संस्कृति को जुबान दी। कलात्मकता के साथ रचनाओं में आई इस संवेदनशीलता ने वालकोट की काव्य और नाट्य कला को नया उत्कर्ष दिया, जिसे खारिज करना असंभव था। ऊपर से उनके काम की मात्रा इतनी विपुल और समृद्ध कि नोबल पुरस्कार देते वक्त उनके सृजन को ‘महासागरीय कृतित्व्’ कहा गया। इस महासागर से प्रस्तुत है एक कविता-

प्रेम के बाद प्रेम

वक्त आएगा


जब तुम प्रफुल्लता के साथ


अपने ही दरवाजे पर, अपने ही आईने में


खुद का आते हुए स्वागत करोगे


और दोनों एक दूसरे की ओर मुस्कुराते हुए मिलोगे






फिर कहोगे, बैठो, कुछ खा लो


तुम उस अज्ञात व्यक्ति से प्रेम करोगे


जो तुम खुद ही थे


शराब परोसो, रोटी परोसो


उस अजनबी को वापस अपना दिल दे दो


जिसने तुम्हें प्रेम किया है






तमाम जिंदगी जिसे तुमने


किसी और के लिए उपेक्षित रखा


जिसे तुम दिल से जानते हो


किताबों की अलमारी से प्रेमपत्र बाहर निकाल लो






वो तस्वीरें, वो निराशा भरे नोट्स


आईने से अपनी ही छवि खुरच लो


बैठो, अपनी जिंदगी की दावत उड़ाओ।






Sunday, 4 October 2009

हरीश भादाणी – एक फकीरी जीवन



वो मेरे दादाजी की उम्र के थे, लेकिन मैं उन्हें बाकी दोस्तों की तरह हमेशा भाई साहब ही कहता था। वो भी भाई ही मानते थे, बात-बात में कुछ याद आने पर कहते थे, ‘प्रेमचंद तुम्हारी भाभी कहती है..’ और वे इस तरह पीढियों का अंतराल सिरे से खत्म कर देते थे। मैंने जीवन में ऐसा एक भी वरिष्ठ साहित्यकार नहीं देखा, जो इस कदर अपने से कमउम्र लोगों के बीच सहजता से घुलमिल जाता हो। हम श्रद्धा से पांव छूते तो मना कर देते, किताब भेंट करते तो हमेशा ‘सहधर्मी शब्दकर्मी समानधर्मा मित्र’ संबोधन ही लिखते, और भावुक होने पर बच्चों की तरह रो देते। वो सदा खिलखिलाता मुस्कुराते रहने वाला शख्स पहाड़ सी जिंदगी के कितने भयानक दौरों से गुजरकर आया था, यह जानकर मन श्रद्धा से भर जाता था और एकदम आत्मीयता का कभी ना थमने वाला दौर शुरू हो जाता था।

उनके साथ बिताए ना जाने कितने यादगार पल हैं जिनकी स्मृतियां भाव विह्वल कर देती हैं। लेकिन उनके विराट व्यक्तित्व के पीछे छिपी उनकी अनथक साहित्य् साधना को याद करता हूं तो लगता है ऐसा जीवन जीने के लिए एक जीवन कम पड़ जाए। कभी उनके जीवन के उतार चढाव भरे कंटकाकीर्ण पथ को याद करता हूं तो लगता है जैसे किसी विश्वस्तरीय लेखक की जीवन कथा पढ़ रहा हूं। बचपन में पिता संन्यासी होकर इकलौते पुत्र को अकेले छोड़कर चले गए। और एक सामंती किस्म के परिवार में कई हवेलियों के बीच हरीश भादाणी जी ने अपना बचपन गुजारा। ना जाने कितनी पीड़ाएं झेली होंगी इस बालक ने जो सामंती शोषण और अत्याचार बचपन में अपनी आंखों से देखा होगा। तभी तो वो ‘रोटी नाम सत है’ जैसा शाश्वत गीत लिख सके। हिंदी में क्या आपको विश्वसाहित्य में ऐसी कविता नहीं मिलेगी, जो एक शोकसंतप्तत स्‍वर को इस प्रकार एक आंदोलनकारी जनगीत में बदल दे। ‘राम नाम सत है’ की जगह 'रोटी नाम सत है कहना', कितने बड़े कवि के कण्ठ से निकला है, इसे इस गीत को पढने, गाने और सुनने से अहसास होता है। यहां वे अपनी संपूर्ण चेतना के साथ उपस्थित हैं, जिसमें वंचितों का क्रोध, अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था के प्रति आमजन का गहरा आक्रोश एक साथ देखा जा सकता है। इस गीत की कुछ पंक्तियां हैं, "रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है, ऐरावत पर इंदर बैठे बांट रहे टोपियां, झोलियां फैलाए लोग, भूल रहे सोटियां, वायदों की चूसनी से छाले पड़ जीभ पर, रसोई में लाव लाव भैरवी बजत है, बोले खाली पेट की करोड़ों करोड़ कूंडियां, तिरछी टोपी वाले भोपे भरे हैं बंदूकियां, भूख के धरमराज यही तेरा व्रत है, रोटी नाम सत है कि खाए से मुगत है।" मुक्ति राम के जाप से नहीं रोटी से मिलेगी। ऐसा स्वर आपको विश्वसाहित्य में इस चेतना के साथ आपको शायद ही कहीं मिलेगा।

हरीश जी एम.एन. राय और समाजवादी विचारों से चलकर मार्क्सवाद तक आए थे। लेकिन उनके भीतर की भारतीय मनीषा उन्हें बारंबार ऋग्वेद और उपनिषदों की ओर ले जाती थी, जिससे वे मार्क्सवाद और भारतीय मनीषा का प्रत्याख्यान करते थे। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं और उपनिषदों के अनेक सूक्तों की उन्होंने एक समाजशास्त्रीय ढंग से पुनर्रचना की है। और ऐसी रचनाओं का जब वे सस्वर पाठ करते थे तो जनमानस में ऐसा समां बंधता था कि पूछिए मत। उनके गाए गीतों पर हजारों लोग झूमते थे और उनकी अनुपस्थिति में भी हर जनांदोलन में उनके गीत गूंजते रहते हैं। उनके गीतों और कविताओं की पंक्तियां संघर्ष का नारा गईं। ‘बोल मजूरा हल्ला बोल’ जैसी पंक्ति हरीश भादाणी ही लिख सकते थे।

क्योंकि उन्होंने अपनी आंखों से जो शोषण और अत्याचार देखा था, उसके प्रति उनकी घृणा इतनी जबर्दस्त थी कि जिस सामंती परिवार में पैदा हुए, उसकी एक एक ईंट तक उन्होंने आम आदमी की भूख मिटाने और साहित्यिक पत्रकारिता के लिए ‘वातायन’ को चलाने में बेच डाली। ऐसा जीवट वाला साहित्यकार आपको किसी भी भाषा में शायद ही मिलेगा, जिसने एक नहीं तेरह हवेलियां बेचने के बाद एक छोटे से घर में रहना मंजूर किया हो। और इसके बाद खुद जनपथ पर आ गए और ‘सड़कवासी राम’ लिखने लग गए। इस नई राह पर हरीश जी ने पता नहीं कितने पापड़ बेले। बंबई और कलकत्ता के ना जाने कितने सेठों के नाम से किताबें लिखीं, बड़े बड़े फिल्मी गीतकारों के नाम से गीत लिखे। सिनेजगत में उनके नाम से बस ‘आरंभ’ फिल्म का गीत ही बचा है, ‘सभी सुख दूर से गुजरें, गुजरते ही चले जाएं’। लगता है उनका जीवन भी ऐसा ही रहा, जिसमें सारे सुख दूर से गुजरे और उनके हिस्से आई सिर्फ रचनात्मकता, जिसके माध्यम से वो जनता की आवाज यानी जनकवि बन गए।
(नई दुनिया के राजस्‍थान संस्‍करण में 4 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित)



Friday, 2 October 2009

जनकवि हरीश भादाणी नहीं रहे



हिंदी और राजस्‍थानी के सुप्रसिद्ध जनकवि हरीश भादाणी जी का आज तड़के बीकानेर में निधन हो गया। 11 जून, 1933 को जन्‍मे हरीश भादाणी जी की लोकप्रियता इतनी जबर्दस्‍त थी कि हजारों लोगों को उनके गीत कंठस्‍थ हैं और विभिन्‍न जनांदलनों में बरसों से गाये जा रहे हैं। 'बोल मजूरा हल्‍ला बोल' और 'रोटी नाम सत है' जैसे कई गीत जगप्रसिद्ध हैं। उनकी कविता की बीस से अधिक पुस्‍तकें हिंदी और राजस्‍थानी में प्रकाशित हुईं। उनके परिवार में एक पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। उनकी बड़ी बेटी सरला माहेश्‍वरी दो बार पश्चिम बंगाल से राज्‍यसभा की सांसद रह चुकी हैं।
भादाणी जी पिछले कई महीनों से अस्‍वस्‍थ चल रहे थे। वे कैंसर से पीडि़त थे। दो दिन पूर्व ही वे कोलकाता में अपनी दोहित्री के विवाह समारोह से लौटे थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि बीकानेर शहर में आप किसी रिक्‍शा या तांगे वाले से उनका पता पूछकर उनके घर जा सकते हैं।

इनके पिता संन्‍यासी हो गए थे। उस वक्‍त हरीश जी बहुत छोटे थे। सामंती परिवार में जन्‍मे हरीश जी ने जनता के दुख दर्द को गले लगाया और एक-एक कर सात पुश्‍तैनी हवेलियों को बेचने के बाद एक छोटे से घर में रहने लगे। साहित्‍य और समाज को पूरी तरह समर्पित इस महान कवि के गीत सदियों तक अवाम के दिलोदिमाग में गूंजते रहेंगे। हरीश जी खुद बहुत अच्‍छा गाते थे। उनके गीतों की कई कैसेट और सीडी निकली हैं। उन्‍होंने कुछ वक्‍त मुंबइया फिल्‍मी दुनिया में भी गुजारा। कई मशहूर गीतकारों ने उन्‍हें आशीर्वाद दिया और उनके लिखे गीत अपने नाम से फिल्‍मों में चला दिये। 1976 में आनंद शंकर के संगीत निर्देशन में उनका लिखा और मुकेश की आवाज में गाया गया फिल्‍म 'आरंभ' का गीत 'सभी सुख दूर से गुजरें गुजरते ही चले जाएं' लोकप्रिय हुआ। फिल्‍मी दुनिया में उनके नाम से बस यही गीत बचा है, बाकी गीत बड़े गीतकारों के नाम चले गए। यह गीत मेरे विशेष आग्रह पर भाई युनूस खान ने रेडियोवाणी पर लगाया है। आप इस गीत को यहां सुन सकते हैं। हरीश जी ने कभी उन गीतकारों के नाम नहीं बताए, बस हंसकर टाल जाते थे।
मुझे व्‍यक्तिगत रूप से उनका 'रेत है रेत' बहुत पसंद है।

इसे मत छेड़ पसर जाएगी
रेत है रेत बिफर जाएगी
कुछ नहीं प्यास का समंदर है
ज़िन्दगी पांव-पांव जाएगी
धूप उफने है इस कलेजे पर
हाथ मत डाल ये जलाएगी
इसने निगले हैं कई लस्कर
ये कई और निगल जाएगी
न छलावे दिखा तू पानी के
जमीं आकाश तोड़ लाएगी
उठी गांवों से ये ख़म खाकर
एक आंधी सी शहर जाएगी
आंख की किरकिरी नहीं है ये
झांक लो झील नज़र आएगी
सुबह भीजी है लड़के मौसम से
सींच कर सांस दिन उगाएगी
कांच अब क्या हरीश मांजे है
रोशनी रेत में नहाएगी
इसे मत छेड़ पसर जाएगी
रेत है रेत बिफर जाएगी

इसके अलावा मुझे उनका 'रेत में नहाया है मन' भी बहुत भाता है।

रेत में नहाया है मन !



आग ऊपर से, आँच नीचे से


वो धुँआए कभी, झलमलाती जगे


वो पिघलती रहे, बुदबुदाती बहे


इन तटों पर कभी धार के बीच में


डूब-डूब तिर आया है मन


रेत में नहाया है मन !


घास सपनों सी, बेल अपनों सी


साँस के सूत में सात सुर गूँथ कर


भैरवी में कभी, साध केदारा


गूंगी घाटी में, सूने धारों पर


एक आसन बिछाया है मन


रेत में नहाया है मन !




आँधियाँ काँख में, आसमाँ आँख में


धूप की पगरखी, ताँबई, अंगरखी


होठ आखर रचे, शोर जैसे मचे


देख हिरनी लजी साथ चलने सजी


इस दूर तक निभाया है मन


रेत में नहाया है मन !




Sunday, 27 September 2009

इस सादगी पे बलि बलि जाएं...




जब से दुनिया में मंदी आई है लोग सादा जीवन अपनाने की बात करने लगे हैं। लेकिन सादगी भरा जीवन कोई नई बात नहीं है, भारतीय परंपरा में ऋषि-मुनियों के जमाने से सादा जीवन उच्च विचार की बात चलती आई है। प्रत्येक मनुष्य को अपनी जिंदगी अपने अलग ढंग से जीने का हक है। हर इंसान अपनी रूचियों के कारण सादा अथवा फैशनपरस्त जीवन शैली अपनाता है। कोई चाहकर भी उच्च जीवन शैली नहीं अपना सकता तो कोई सामर्थ्य के बावजूद बेहद सादगी भरा जीवन जीता है। बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं जो किसी महापुरूष के विचारों से प्रभावित होकर सादा जीवन अपनाने लगते हैं। कुल मिलाकर हर व्यक्ति का अपना स्टाइल स्टेटमेंट होता है, जिससे उसकी जीवनशैली बनती है। कुछ लोग वक्त के हिसाब से अपने को बदल लेते हैं और उसी के अनुरूप जीते हैं। मनुष्य का मन कभी स्थिर नहीं रहता इसलिए सामान्य तौर पर अपने परिवार, मित्र-मण्डली या किसी प्रिय के कहने पर वो खुद को बदल भी लेता है और कई बार अपनी जिद के चलते खुद को बदलने से इन्कार भी कर देता है। सादा जीवन का मतलब सिर्फ कपड़ों के चुनाव, खान-पान और यात्रा के साधनों में कमखर्ची नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक आदर्श भी है। बहुत से लोगों को अपने पेशे की विवशताओं के कारण एक खास किस्म की जीवनशैली सार्वजनिक जीवन में अपनानी पड़ सकती है। ऐसे लोग व्‍यक्तिगत जीवन में अपने आदर्श जीवन को जीने की कोशिश करते हैं। इस तरह दोहरा जीवन जीते हैं।



सादगी के आयाम

सादा जीवन मानव जाति के लिए एक जीवन मूल्य है। इसे तेरहवीं सदी के संत थॉमस एक्विनास ने इस तरह परिभाषित किया है कि जब मनुष्य को कोई लक्ष्य एक ही साधन से प्राप्त हो सकता है तो उसके लिए बहुत से साधनों का इस्ते‍माल करना बेकार की बात है, क्योंकि कुदरत ने एक चीज प्राप्त करने के लिए एक ही साधन बनाया है। इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि व्यक्ति को स्वस्थ जीवन के लिए खाद्य और पेय पदार्थों की जरूरत होती है, अब इसके लिए न्यूनतम आवश्यकता देश-काल के अनुसार भिन्न -भिन्न हो सकती हैं। लेकिन सिर्फ पेट भरने के लिए हजारों खर्च कर देना कहां तक उचित है। यह फिजूलखर्ची तो है ही, बल्कि एक प्रकार से देखा जाए तो उपलब्ध संसाधनों की बर्बादी भी है। इसी तरह जब मनुष्य का काम साधारण कपड़ों के दो-चार जोड़ों से तन ढंकने से चल सकता है तो नित नए महंगे कपड़े पहनना और खरीदना बर्बादी है। एक सामान्य वाहन से अगर घर का काम चल सकता है तो परिवार के प्रत्येाक सदस्य के लिए नित नए वाहन खरीदना उचित नहीं कहा जा सकता। सादगी भरा जीवन गरीबी की नहीं सौम्यता और सहज जीवन जीने की शैली है, जिसका निहितार्थ यह है कि व्‍यक्ति इस पृथ्वी पर उपलब्ध संसाधनों का अपनी आवश्यकताओं से अधिक इस्तेामाल नहीं करेगा और शेष संसाधन उन लोगों के लिए छोड़ देगा, जिनके पास जीने के लिए अनिवार्य संसाधन भी उपलब्ध नहीं हैं।

सादगी का फैशन

आजकल सादगी का फैशन भी चल पड़ा है। फैशन एक प्रकार की प्रतिस्पंर्धा ही है जिसमें एक दूसरे से बेहतर और अलग दिखने की कोशिश की जाती है। आपने बहुत से हाई प्रोफाइल लोगों को कुछ खास मौकों पर सादा सूती या खादी के कपड़ों में देखा होगा। ये लाग आम तौर पर ऐसा नहीं करते, मतलब सादगी उनके लिए फैशन है, जिससे आम लोगों की नजर में वे इस सादगी की वजह से ही खास हो जाते हैं। फैशन के इस दौर में कभी हेय समझी जाने वाली चीजें भी नए फैशन के रूप में चल पड़ी हैं। जैसे आदिवासी और जनजातीय पहनावा और आभूषण आज की हाई क्लास सोसायटी का फैशन हो गया है। ग्रामीण समाज में दैनंदिन उपयोग की चीजें सजावटी सामान की तरह ड्राइंग रूम की शोभा बन गई हैं। यह सादगी नहीं सादगी का फैशन है जो पहले चीजों से घृणा करता है और खुद अपनाकर उसे एंटीक बना देता है।

सरकार की सादगी बनाम सादगी की राजनीति

इन दिनों केंद्र से लेकर राज्य सरकारें सादगी का गुणगान कर रही हैं। यह कितनी बेतुकी बात है कि सरकार और राजनेता सादगी की बात कर रहे हैं। उन्हें तो हर वक्त ही सादगी भरा जीवन अपनाना चाहिए, क्योंकि सरकारी फिजूलखर्ची तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में कभी भी जायज नहीं ठहराई जा सकती। इन दिनों चल रही सरकारी सादगी दरअसल एक प्रकार का नाटक है, जिसमें जनता के बीच संवेदनशील सरकार का भ्रम पैदा किया जा रहा है। इस प्रकार सरकार जनता के उन सवालों को टालने की कोशिश में कामयाब हो जाती है, जिनसे उसे हालिया दौर में संघर्ष करना पड़ सकता है। मसलन बैंक-बीमा जैसे कई उद्योगों में नए वेतनमानों के मुद्दे को सरकार मंदी के नाम पर सादगी की आड़ में टाल सकती है और इससे जनता के बीच एक किस्म की लोकप्रियता हासिल कर सकती है। राजनीति में सादगी एक जबर्दस्ती लोकप्रियतावादी फैशन है, जिसमें जनता को आकर्षित करने के तमाम प्रयत्न किए जाते हैं। और राजनीति में सादगी का फैशन नया नहीं है, यह तो पंडित नेहरू के जमाने से चला आ रहा है। उस वक्त लोहिया जी ने हिसाब लगाकर बताया था कि एक दिन में नेहरू जी पर कितना खर्च होता है। आदिवासी और ग्रामीण जनता के बीच उनके जैसे कपड़े पहनना भी राजनीति का फैशन है, इससे नेताओं को खूब लोकप्रियता हासिल होती है।

सादगी का दर्शन बनाम सादगी का इतिहास

लिखित इतिहास में सादगी का पहला उदाहरण गौतम बुद्ध के काल में मिलता है। महात्मा बुद्ध ने अपने अपने अनुयायियों से अपनी आवश्यकताओं को न्यूतनतम करने के लिए कहा था। उन्होंने स्वयं अपनी जरूरतों को कम कर दिया था। बुद्ध ने अपने श्रमण में भिक्षुकों को कहा था कि भिक्षा में अगर एक दिन की आवश्यकता जितना मिल जाए तो उसके बाद भीख नहीं मांगनी चाहिए और एक भिक्षुक को निरंतर अपनी आवश्यकताएं कम करते जाना चाहिए। इसके बाद महावीर स्वामी ने भी सादगी पर जोर दिया था। बुद्ध-महावीर से लेकर महात्मा गांधी जैसे अनेक महापुरूषों ने मनुष्य को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर सादा जीवन जीने का उपदेश दिया। गांधी जी का जीवन तो आज भी सादगी का जबर्दस्त उदाहरण है। सादगी पर उनके जैसा चिंतन और व्यावहारिक प्रयोग विश्व के लिए अमूल्य धरोहर है। आज भी हजारों-लाखों लोग उनके विचारों से सादगी भरा जीवन जीने के लिए प्रेरित होते हैं। गांधीजी तो आवश्यकता से अधिक किसी भी वस्तु की प्राप्ति या उपभोग को एक प्रकार की हिंसा ही मानते थे। उनकी मान्‍यता थी कि कुदरत प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकती है लेकिन लोभ-लालच को पूरा नहीं कर सकती। इस तरह से देखा जाए तो उच्च जीवन शैली एक प्रकार से लोभ और लालच की संस्‍कृति है, जो प्रकृतिविरोधी और मानवताविरोधी है।

सादगी की तकनीकी और अर्थशास्त्र

सादगी को लेकर दुनिया भर में आधुनिक तकनीकी विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री बरसों से खासकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चिंतन करते आए हैं और उनका निष्कर्ष है कि आधुनिक तकनीक का अगर उचित ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो विश्व में व्याप्त बहुत सी समस्या‍एं सुलझाई जा सकती हैं। इस दृष्टि से ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई.एफ. शुमाखर की विश्वप्रसिद्ध किताब ‘स्मा‍ल इज़ ब्यू्टीफुल’ ने दुनिया भर के सादगीपसंद लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इस पुस्तक में वैश्वीकरण के जवाब में एक वैकल्पिक किस्म की उत्पादन और वितरण की व्यावहारिक और स्थायी व्यवस्था प्रस्तावित की गई है, जिसे अपनाकर सभी राष्ट्र अपने उपलब्ध संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करते हुए विकास कर सकते हैं। यह पुस्तक हिंदी में भी प्रकाशित हो चुकी है। इसी प्रकार ग्लोबल वार्मिंग के बढते खतरे को लेकर दुनिया के हजारों तकनीकी विशेषज्ञों ने सादगी भरे वैकल्पिक संसाधनों और तकनीक की वकालत की है, जिसके अनुसार इंटरनेट जैसे संचार साधनों का अधिकाधिक इस्तेमाल कर संवाद को सहज सुगम और तीव्र ही नहीं बल्कि पर्यावरण हितैषी भी बनाया जा सकता है। इससे कागज का इस्तेामाल कम होगा और हजारों-लाखों पेड़ बचाए जा सकेंगे। ‘फूड माइल्स‘ नामक एक आंदोलन के अनुसार खेत से थाली तक खाद्यान्न को जितनी दूरी तय करनी पड़ती है, उसे स्थानीय उत्पादन से कम करके करोड़ों बैरल पेट्रोलियम उत्पाद बचाए जा सकते हैं। स्वैच्छिक सादगी के प्रवक्ता कहते हैं कि विज्ञापन के माध्यम से उपभोक्ता‍वाद का प्रचार-प्रसार बिल्कुल गलत है। वे तो टेलीविजन के बजाय सामुदायिक टीवी और रेडियो की बात करते हैं।

आजकल लोगों के पास समय की कमी रहती है, इसलिए सादगी भरे जीवन का मतलब यह नहीं कि समय की बर्बादी की जाए। महान पत्रकार स्व. राजेंद्र माथुर बेहद सादगीपसंद थे। वे समय बचाने के लिए हवाई जहाज से यात्रा करते थे किंतु अपने खादी के झोले में महज एक जोड़ी कपड़े और किताब रखते थे। सादगी का असल मतलब यह है कि सामान्य सहज रूप से जिंदगी की गाड़ी चलती रहे और अपने किसी भी किस्म के आचरण से समुदाय और प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचे।


Sunday, 20 September 2009

एक महाद्वीप को साहित्‍य में सिर्फ एक नोबल पुरस्‍कार


नोबल पुरस्‍कार के इतिहास में संभवत: यह एक मात्र उदाहरण है जिसमें एक महाद्वीप को एक ही बार पुरस्‍कार मिला। यह अद्भुत संयोग हुआ ऑस्‍ट्रेलिया के साथ। यूं ऑस्‍ट्रेलियाई साहित्‍य अंग्रेजी में होने के कारण पूरी दुनिया में पढा और सराहा जाता है किंतु 1973 में जब पैट्रिक व्‍हाइट को नोबल पुरस्‍कार मिला तब दुनिया का ध्‍यान इस विशाल महाद्वीप के साहित्‍य की ओर गया। पैट्रिक व्‍हाइट को महाकाव्‍यात्‍मक और मनोवैज्ञानिक विवरणों के अद्भुत उपन्‍यासकार के रूप में जाना जाता है। 28 मई, 1912 को लंदन में व्‍हाइट का जन्‍म हुआ और जब वो छह महीने के थे, पिता परिवार सहित ऑस्‍ट्रेलिया चले आए। व्‍हाइट का बचपन पिता की इस सनक और समझ के चलते बहुत मुश्किलों में बीता कि इस लड़के को लेखक या कलाकार के बजाय किसान बनना चाहिए। बचपन से ही अस्‍थमा के रोगी बालक को दस बरस की उम्र में पढने के लिए एक बोर्डिंग स्‍कूल में भेज दिया गया। उस स्‍कूल के बंद होने की नौबत आई तो प्रधानाध्‍यापक की सलाह पर व्‍हाइट को इंग्‍लैंड भेज दिया गया। अपने रोग के कारण व्‍हाइट ने बचपन से ही एकाकी स्‍वभाव अपना लिया और स्‍कूल में भी अपनी काल्‍पनिक दुनिया में मगन रहने लगे।
इंग्‍लैंड में व्‍हाइट ने एक छोटी सी मित्र मण्‍डली बना ली थी, जिसमें वो अक्‍सर थियेटर जाते और घूमने निकल पड़ते। छुट्टियों में माता-पिता के साथ वो यूरोप और अमेरिका घूमने जाते। लेकिन परिवार से पैट्रिक की भावनात्‍मक दूरी वैसी ही बनी रही। अपने चार साल के इंग्‍लैंड प्रवास को पैट्रिक व्‍हाइट ‘कैद’ कहते थे। व्‍हाइट अभिनेता बनना चाहते थे और जब उन्‍होंने माता-पिता को अपनी इच्‍छा बताई तो उन्‍होंने पहले ऑस्‍ट्रलिया आने के लिए कहा।
लौटने पर पिता ने बजाय कलाकार बनाने के व्‍हाइट को एक जानवरों के एक फार्महाउस पर पशुपालक का काम करने भेज दिया, जहां उसका मन काम से अधिक लिखने और अपनी कल्‍पना की दुनिया में ज्‍यादा लगता था। यहां आकर स्‍वास्‍थ्‍य खुली आबोहवा में सुधरने लगा तो अपने बंद कमरे में व्‍हाइट ने कई कहानियां, उपन्‍यास, नाटक और कविताएं लिख डालीं। व्‍हाइट ने छद्म नाम से एक कविता बड़े अखबार में भेजी जो प्रकाशित भी हुई।
1932 में व्‍हाइट फिर से इंग्‍लैंड चले गए, जहां केंब्रिज चार साल तक फ्रेंच और जर्मन साहित्‍य का अध्‍ययन किया। इस बार व्‍हाइट ने लंदन में अपने लिखे नाटकों के मंचन करवाने और रचनाएं प्रकाशित करवाने की कोशिशें कीं। कुछ कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं, लेकिन नाटक को लेकर व्‍हाइट को इंतजार करना पड़ा। इन्‍हीं दिनों पहला काव्‍य संग्रह ‘द प्‍लौमैन एण्‍ड अदर पोएम्‍स‘ प्रकाशित हुआ और एक नाटक शौकिया कलाकारों के समूह ने मंचित किया। प्रकाशन से जो उत्‍साह मिला उसके चलते व्‍हाइट ने लगातार लिखना जारी रखा और पुराने उपन्‍यास ‘हैप्‍पी वैली’ को फिर से लिखा। इस उपन्‍यास में पशुपालक के तौर पर देखे गए जीवनानुभवों को उन्‍होंने बहुत खूबसूरती से चित्रित किया। यह उपन्‍यास प्रकाशित हुआ तो इंग्‍लैंड के समीक्षकों ने सराहा, लेकिन ऑस्‍ट्रेलिया में किसी ने इस पर ध्‍यान नहीं दिया। 1937 में पिता की मृत्‍यु हो गई और वे पुत्र के लिए अच्‍छी खासी रकम छोड़कर गए, जिससे वो पूरी तरह लेखन के लिए समर्पित हो सकते थे।
द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद कुछ वक्‍त वो अमेरिका रहे और वापस लौटकर ऑस्‍ट्रेलिया आ गए, जहां सिडनी के पास एक कस्‍बे में रहने लगे। यहां आने के बाद उन्‍होंने अपना पहला महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास लिखा ‘द आन्‍ट्स स्‍टोरी’। इस उपन्‍यास में व्‍हाइट ने एक अविवाहित ऑस्‍ट्रेलियाई महिला का संघर्षमय जीवन दिखाया जो ऑस्‍ट्रेलिया और ब्रिटेन की दो संस्‍कृतियों के द्वंद्व में फंसी है। वह अपनी मां की मृत्‍यु के बाद यूरोप और अमेरिका की यात्रा पर जाती है और अकेलेपन के चलते मानसिक रूप से विक्षिप्‍तता की हद तक पहुंच जाती है। उसके एकाकीपन को व्‍हाइट ने बहुत संवेदनशील तरीके से पाठकों तक पहुंचाया। यह व्‍हाइट का प्रिय उपन्‍यास भी रहा। आलोचकों ने प्रारंभ में इसे नहीं सराहा, लेकिन पुनर्प्रकाशन के बाद इसे जबर्दस्‍त लोकप्रियता हासिल हुई। 1955 में व्‍हाइट ने अपने जीवन का सबसे महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास लिखा ‘द ट्री ऑफ मैन’। इसके बारे में खुद व्‍हाइट ने लिखा कि सिडनी के पास रहने के दौरान शहरी-कस्‍बाई उबाउ जिंदगी के भीतर से मुझे किसी कविता का संगीत सुनाई दिया और उपन्‍यास का जन्‍म हुआ। इस उपन्‍यास में व्‍हाइट ने पार्कर परिवार की नाटकीय जिंदगी का वर्णन किया है जिसमें ऑस्‍ट्रेलिया के लोकसंगीत, लोक परंपराओं और मिथकों को कहानी में बहुत खूबसूरती के साथ पिरोया गया है। इस उपन्‍यास को भी पहले खारिज कर दिया गया और बाद में इसका महत्‍व स्‍वीकारा गया।
ऑस्‍ट्रेलिया में उनके जिस उपन्‍यास को सबसे ज्‍यादा पसंद किया गया वो था ‘वॉस’, जो 1957 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्‍यास के प्रारंभ में 1845 में एक सनकी जर्मन खोजकर्ता वॉस यहां की एक अनाथ लड़की लॉरा से मिलता है और दोनों में प्रेम हो जाता है। वॉस पूरे महाद्वीप को पैदल पार कर अंतहीन विस्‍मयों से साक्षात करना चाहता है। उपन्‍यास में वॉस की ऑस्‍ट्रेलिया महाद्वीप की यात्रा का रोमांचक वर्णन है। दो दलों में बंटकर यह खोजी अभियान दल करीब बीस साल तक ऑस्‍ट्रेलिया के सुदूर इलाकों की यात्रा करता है और एक-एक कर सब लोग मारे जाते हैं। वॉस और लॉरा दैवीय शक्तियों से एक दूसरे से संवाद करते रहते हैं और कहानी में दोनों पात्रों का जीवन क्रम चलता रहता है। आदम और हव्‍वा की कहानी को व्‍हाइट ने कई स्‍तरों पर रचते हुए एक अद्भुत उपन्‍यास की रचना की है। इस उपन्‍यास को पहला माइल्‍स फ्रेंकलिन लिटरेरी अवार्ड दिया गया। 1961 में व्‍हाइट का एक और महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास आया ‘राइडर्स इन द चेरियट’। इसमें व्‍हाइट ने 1950 के दशक में एक काल्‍पनिक ऑस्‍ट्रेलियाई कस्‍बे सरसापारिल्‍ला के रहन-सहन का चार लोगों के माध्‍यम से वर्णन किया है। रहस्‍यवाद, आध्‍यात्मिकता और कस्‍बाई सांस्‍कृतिक जीवन का यह शानदार मिश्रण है।
1970 में व्‍हाइट का आठवां उपन्‍यास प्रकाशित हुआ ‘द विविसेक्‍टर’। इसमें एक काल्‍पनिक चित्रकार की जिंदगी की यादों का खजाना है। कैसे एक गरीब परिवार में पैदा हुआ बालक महलों में जा पहुंचता है और जिंदगी भर कला में सत्‍य की खोज करता हुआ ईश्‍वर के लिए अपनी नायाब कृति रचता है। 1973 में पैट्रिक व्‍हाइट की एक और कृति आई ‘द आई ऑफ द स्‍टॉर्म’। इस उपन्‍यास के बाद व्‍हाइट को नोबल पुरस्‍कार प्रदान किया गया। अपनी एकांतप्रियता की वजह से व्‍हाइट नहीं गए और अपने मित्र को पुरस्‍कार ग्रहण करने के लिए भेजा। समारोह में इस उपन्‍यास की चर्चा करते हुए कहा गया कि व्‍हाइट थोड़े मुश्किल लेखक हैं । यह बात सही भी है तो सिर्फ इसलिए ही नहीं कि वे एक अलग तरह की जटिल और सांकेतिक महाकाव्‍यात्‍मक भाषा का प्रयोग करते हैं, बल्कि इसलिए भी कि उनके विचार और उनके उपन्‍यासों में प्रस्‍तुत समस्‍याएं भी बिल्‍कुल अलग किस्‍म की हैं, जिन पर एकबारगी लोगों का ध्‍यान नहीं जाता। पैट्रिक व्‍हाइट ने ज्‍यादा नहीं कुल एक दर्जन उपन्‍यास लिखे, लेकिन उनकी कल्‍पनाशीलता इन दर्जन भर उपन्‍यासों में आश्‍चर्यचकित कर देती है। नोबल पुरस्‍कार मिलने के बाद उन्‍होंने तीन उपन्‍यास और लिखे। ‘ए फ्रिंज ऑफ लीव्‍ज़’ में एक महिला के दुख भरे दुर्दिनों की कथा है, जो जहाज डूबने से आदिवासियों के बीच पहुंच जाती है। ‘द ट्वायबॉर्न अफेयर’ में ऑस्‍ट्रेलिया, फ्रांस और ब्रिटेन में प्रथम विश्‍व युद्ध से दूसरे विश्‍व युद्ध तक अपनी अस्मिता और पहचान तलाशते व्‍यक्ति की दास्‍तान बयां होती है। ‘मेमोयर्स ऑफ मैनी इन वन’ की पाण्‍डुपलपि व्‍हाइट ने दक्षिणी ऑस्‍ट्रेलिया में साक्षरता के प्रसार के लिए दान कर दी थी, जिसे बाद में प्रकाशित किया गया।
अपने विशाल घर के एकांतवास में व्‍हाइट ने कविता-कहानियों के दो-दो संग्रह और सात नाटक भी लिखे। उनकी आत्‍मकथा ‘फ्लाज़ इन द ग्‍लास’ 1986 में प्रकाशित हुई। पैट्रिक व्‍हाइट के लेखन का मूल केंद्र है अस्मिता की तलाश। ब्रिटेन में पैदा होकर ऑस्‍ट्रेलियाई होने का द्वंद्व उनकी रचनाओं में निरंतर झलकता है। द्वितीय विश्‍व युद्ध में उन्‍हें जबर्दस्‍ती कई देशों में भेजा गया और इस दौरान उन्‍होंने युद्ध की निरर्थकता को निकट से देखा-भोगा। जीवन में जहां कहीं वो गए उसे किसी ना किसी प्रकार से अपनी रचना में इस्‍तेमाल किया।
लेखक की निजता के वे जबर्दस्‍त पक्षधर थे और आम लोगों या पाठकों-आलोचकों से मिलना उन्‍हें बिल्‍कुल पसंद नहीं था। आलोचकों से वे चिढते थे और उन्‍हें अपनी पाण्‍डुलिपि दिखाना भी पसंद नहीं करते थे। बाद के वर्षों में वे बहुत मुखर हो गए थे और ऑस्‍ट्रेलियाई मूल निवासियों के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण, परमाणु निशस्‍त्रीकरण, समलैंगिकों के अधिकारों आदि विविध विषयों पर खुलकर बोलने लगे थे। एक बार उन्‍हें सुनने के लिए तीस हजार लोग इकट्ठा हुए थे। लेकिन एकांत उन्‍हें इतना पसंद था कि लंबी बीमारी के बाद जब 30 सितंबर, 1990 को उनका निधन हुआ तो इसकी खबर भी लोगों को उनके अंतिम संस्‍कार के बाद मिली।
मूलभूत तथ्‍य

जन्‍म 28 मई, 1912
सम्‍मान पुरस्‍कार
दो बार माइल्‍स फ्रेंकलिन अवार्ड
ऑस्‍ट्रेलियन ऑफ द ईयर अवार्ड
नोबल पुरस्‍कार
प्रमुख उपन्‍यास
हैप्‍पी वैली, द आन्‍ट्स स्‍टोरी, द ट्री ऑफ मैन, वॉस, राइडर्स इन द चेरियट, द विविसेक्‍टर, द आई ऑफ द स्‍टॉर्म, द ट्वायबॉर्न अफेयर और फ्लाज़ इन द ग्‍लास।
निधन - 30 सितंबर, 1990

Sunday, 13 September 2009

नंद भारद्वाज की कहानी ‘उलझन में अकेले’


राजस्थान के साहित्य को जिन रचनाकारों ने पिछले पचास बरसों में सबसे ज्यादा समृद्ध किया है उनमें नंद भारद्वाज का नाम बेहद आदर के साथ लिया जाता है। अत्यंत संघर्षपूर्ण जीवन परिस्थितियों से गुजर कर नंद भारद्वाज ने अखिल भारतीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया है। कविता, कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता और मीडिया जैसे विविध अनुशासनों में रचनाकर्म करने वाले नंद भारद्वाज के यहां आम आदमी का संघर्ष और उसके भविष्य को लेकर गहरी चिंताएं देखने को मिलती हैं। उनके समूचे रचनाकर्म में एक गहरी प्रतिबद्धता और ऐसी रचनात्मकता दिखाई देती है, जिससे उनके बहुआयामी रचनाकार के विविध आयाम परिलक्षित होते हैं। उनके चर्चित कविता संग्रह ‘हरी दूब का सपना’ पर 2008 का के.के. बिडला फाउण्‍डेशन द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित बिहारी पुरस्कार पिछले दिनों राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदान किया जाएगा। इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी एक अत्यंत चर्चित कहानी ‘उलझन में अकेले’ । इस कहानी से नंद भारद्वाज की गहरी संवेदनशीलता और रचनात्मकता के कई पक्ष उजागर होते हैं।


रात काफी गहरा गई थी और बाहर बढ़ती सर्दी के तेवर उत्तरोत्तर तीखे होते जा रहे थे। तिबारी (बैठक) के बीचो-बीच जलते अलाव से निकलती अग्नि की अशान्त ज्वालाएं फिर मंदी पड़ गई थीं। थोड़ी देर पहले जिन लकड़ियों को अंगारों पर रखा गया था, वे जलकर खुद अंगारे बन गई थीं और अंगारे फिर नई लकड़ियों की आहुति मांग रहे थे। कुछ ठूंठ के टुकड़े अभी तक जल रहे थे और कुछ अधजले धुंआ उगलते-से आग में अपना अस्तित्व विलीन करने को तैयार हो रहे थे। मैंने कुछ पतळी लकड़ियों को अंगारों पर रखकर दो-एक लंबी फूंकें दी - फूंक के उत्ताप में सनसनाती हुई आग फिर से सचेतन हो गई। उस सचेतन आग की सलोनी ज्वालाओं से अपने ठंडे पड़ते हाथों को गर्म करते और धीमी पड़ती मुस्कान को गरमास के नजदीक रखते मुझे मंद होती ज्वालाएं कुछ फीकी पड़ती-सी लगी। एक सूखा ठूंठ मैंने उन धीमी पड़ती लपटों पर धीरे-से और रख दिया। अंगारों और लपटों के लगातार उकसावे में अलाव के चारों ओर एक बार फिर गरमास-सा व्याप्त हो गया था और मन में कहीं इस बात की तसल्ली भी हुई कि इस गरमास का कुछ असर जीसा (पिता) तक अवश्‍य पहुंच रहा होगा, जो अभी तक मेरे सामने अलाव के उस पार आंगन पर बिछी दरी पर अबोले बैठे थे।

मैं तय नहीं कर पा रहा था कि जीसा से कैसे बात शुरू की जाए, क्योंकि बात जो करनी थी वह तो शायद पहले ही उन तक पहुंच चुकी थी और जो कुछ कहना था उन्हीं को कहना था, मुझे तो फकत् इतना ही बताना था कि मेरे सामने फिलहाल दूसरा कोई रास्ता खुला नहीं है। यह एक अच्छा अवसर हाथ आया है और मैं अपनी भटकती किस्मत को एक बार इस जमींन पर टिकाना चाहता हूं, लेकिन वे समझने को तैयार हों तब न!

मन में कई तरह की शंकाएं उठ रही थी कि शायद जीसा मुझे लेकर बहुत तनाव में हों और छूटते ही उलाहनों से मुझे अबोला कर दें या नाराजगी दिखाते हुए यह उलाहना भी दे सकते हैं कि ‘जब मां-बाप की दी हुई कोई सीख-सलाह सुहाती ही न हो तो अकारथ पूछताछ की रीत क्यों रखनी... मन-मरजी की ही करनी हो तो करो फिर... पूछना किस बात का...मां-बाप कहां-किसे बाधा देने आते हैं... लेकिन वे कुछ बोलें तब न, एक स्थिर दीठ जलते ठूंठ पर टिकाए वे फकत् बैठे थे...गहरे सोच में डूबे...अबोले!
ठूंठ अब पूरी तरह आग की लपटों में घिर गया था और उसके चारों ओर से लपटें निकल रही थी। आग के पीले उजास में जीसा के चेहरे की ओर देखकर साफ लग रहा था कि वे नाराज होने की बजाय कुछ उदास हैं, और उनका चेहरा भावहीन-सा हो गया है।

भाभू (मां) बता रही थी, ‘पिछले डेढ़ महीने से तुम्हारे जीसा काफी बीमार रहे हैं। यों आठ-पहर खाट तो कभी नहीं पकड़ी, लेकिन बुखार, खांसी और दमे के कारण जीव में आराम कम ही रहता है। हमने तो कितनी ही झाड़-फूंक करवा ली, दवाई-फाकी भी देकर देख ली, लेकिन जीव में आराम तो कभी आता ही नहीं। कोई दुख-दर्द की बात पूछ लें तो बताते और नहीं। रोटी जीमने के नाम पर तो फकत् टंक टालते हैं, मुश्किल से एकाध रोटी या थोड़ा-बहुत खीच-दलिया ले लेते हैं। चिकनाई के लिए वैद्यजी ने यों भी मनाही करवा रखी है। अफीम, चाय और तंबाखू की मात्रा जरूर बढ़ गई है, जो एक बारगी तो कौन जाने सीधा होने में मदद करते होंगे, लेकिन आखिर तो ये चीजें हानि ही पहुंचाती है। कोई आया-गया भी आजकल कम ही सुहाता है। आधी रात तक अलाव के पास अकेले गुमसुम बैठे रहते हैं, कोई बतला ले तो बहुत कम बोलते हैं। बरजने-डांटने का स्वभाव तो जाने कहां चला गया।‘
‘‘आपने कभी इस बारे में कुछ पूछा नहीं। मैंने भाभू से पूछा।
कहने लगी, बताते कहां है, ज्यादा जोर देते हैं, तो खारी दीठ से सामने देखते रहते हैं, या फिर बोलेंगे तो फकत् इत्ती-सी बात कि ‘तुम्हें क्या करना है - दूसरा कोई काम नहीं है घर में और हमें चुप रह जाना पड़ता है।

क्या कारण हो सकता है, मैं दिन भर इसी बात पर सोच-विचार करता रहा। दिन में तिबारी एकदम सूनी पड़ी थी। जीसा घर में कहीं नहीं थे, शायद अपनी अफीम की खुराक के लिए किसी ठेकेदार की ओर गये होंगे! पूछने पर, भाभू ने यही बताया था।
‘‘तो किसी को साथ ले जाते, या किसी को भेजकर मंगवा लेते! तबियत ठीक न हो तो यों अकेले भेजना तो ठीक बात नहीं है ना।
‘‘किसी को बताएं तब न! यह तो मुकने रबारी ने थोड़ी देर पहले खबर दी थी कि आज बाबोसा सवेरे ही मूंडसर के रास्ते जा रहे थे। मूंडसर में जगमाल और दो-एक जने अफीम का धंधा करते हैं। यों हरेक पर विश्वास भी तो नहीं किया जा सकता। लोग बताते हैं कि आजकाल अफीम पर सरकार की ओर से एकदम पाबंदी हो रखी है। मैंने तो तेरे जीसा को बहुत समझाया कि एक बार हिम्मत करके इससे जान छुड़ाओ न! बिना बात इत्ती-सी किरची के लिये ना-कुछ लोगां की गरज़ें करनी पड़ती हैं। भाभू ने अपनी चिन्ता प्रकट कर दी।

‘‘यह व्यसन ऐसा ही होता है, भाभू! और वह इस अवस्था में छूटना तो और भी मुकिल है। एकबार शुरू हो जाने के बाद तो अच्छे-भले जवानों का धैर्य जवाब दे जाता है, इन्होंने तो सत्तर पार कर लिये हैं! मेरे साथ पढ़ने वाले कई लड़के-लड़कियों में मैंने यह ऐब देखा है, लेकिन जीसा की बात दूसरी है। वे इतने बरसों से सेवन करने के बाद भी इसके वश में नहीं हैं।

‘‘अरे बेटा, ये तो मुंह के ही नहीं लगाते थे। ये तो शिवदान के बिखे में टूट गये! इतने जोध-जवान बेटे का यों अकस्मात् उठ जाना, क्या कोई सही जा सकने वाली बात है..औलाद बूढ़े मां-बाप के जीने का आधार-सहारा होती है.... और जब यह सहारा ही हाथ से छिन जाए...तो जीना बोझ हो जाता है... यह बात कहते हुए भाभू का गला भर आया और आंखों से टलक-टलक आंसुओं की धारा-सी छूट गई।
शिवदानसिंह मेरे बड़े भाई थे। वे बी.एस.एफ. में सूबेदार-मेजर थे। तीन बरस पहले पड़ौसी मुल्क से झगड़ा हुआ तब वे अखनूर के हल्के में कहीं मोर्चे पर थे। उनकी टुकड़ी ने मोर्चा जीत भी लिया था, पर कौन जाने ईश्वर की क्या मर्जी थी, जब गोली-बारी एकदम बंद हो गई, तब वे बंकर से बाहर फकत् यह देखने आए थे कि कोई दुश्मन नजदीक-दूर तो नहीं है, और उसी वक्त किसी घायल दुश्मन ने तक कर ऐसा निशाना साधा कि उसकी गोली शिवदान की छाती को आर-पार बींध गई। फिर तो उसके साथियों ने उस अधमरे दुश्मन को गोलियों से छलनी कर दिया, लेकिन उससे शिवदान तो वापस सीधे नहीं हो पाए। दो दिन बाद काठ में बंधी उनकी मिट्टी ही घरवालों के पास पहुंची और तब से जीसा तो जैसे जीते-जी मरे-समान हो गये। उनके सीने में ऐसी बूज आई कि गले से चीख भी नहीं निकल पाई। भाभू और भाभीसा तो बेहाल थे ही, उन्हें संभालने में हम सभी का जैसे धैर्य ही जवाब दे गया था। भाभी को तो तीन दिन बाद जाते होश आया, लेकिन एक बार होश आने के बाद उन्होंने जल्दी ही अपने को संभाल लिया और खुद को इस असह्य वेदना का मुकाबला करने के लिए तैयार भी कर लिया। धन्य है उनकी हिम्मत को! उन्होंने अपनी चिन्ता छोड़, मुझे बुलाकर यह हिदायत दी कि नरपत बना, आप मेरी चिन्ता छोड़ें, आप जीसा का ध्यान रक्खें, उनका आपके भाई पर बहुत जीव था! वे अपनी तकलीफ किसी को नहीं बताएंगे! उस दिन से मेरी नज़र में भाभी की इज्जत बहुत बढ़ गई थी।
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जीसा ने अपनी इकहत्तर वर्षों की उम्र में कठिन समय देखा है। खुद बदलते जमाने और दुनियादारी की अच्छी सूझ-समझ रखते हैं। हो सकता है कि उनका वक्त थोड़ा दूसरा रहा हो, लेकिन फकत् चारणों के घर में जन्म लेने मात्र से उन्हें अपने हलके या समाज में ज्यादा मान-सम्मान या सुविधा मिल गई हो, उस बात की तो उन्होंने कभी आस भी नहीं रखी। लोकहित और न्याय की बात करनेवाले एक नेक इंसान के रूप में सींथळ और आस-पास के गांवों में पाबूदानसिंह का नाम किसी से अजाना नहीं था। अपने जमाने की पौशाल में कुछ पढ़ाई भी कर रखी थी। घर में कथा-भागवत, माताजी की चिरजें, तुलसीदासजी की रामायण और कितनी ही पौराणिक गाथाएं उन्हें कंठस्थ थीं। लोग उनसे सुनने के लिए नजदीक-दूर के कई गांवों से आते थे।
उनके पुरखों ने न कभी किसी दरबार में हाजरी भरी और न किसी की जागीरी में कोई ओहदा ही संभाला। उल्टे जागीरी जुल्म के विरोध में अपने भाई-संबंधियों से लड़ते ही रहे। मेरे दादाजी कभी गंगा रिसाले में अपनी टुकड़ी के मुखिया हुआ करते थे, उन्हीं के नाम आई यह सौ बीघा जमीन है, जो पिछले वर्षों में परिवार की जीवारी का आधार रही है।

हाथ के काम के लेखे तो मेरी भाभू भी कम नहीं थीं। वे तो जीसा से भी दो कदम आगे रहतीं। घर में चार-चार दूध देनेवाली गायें थीं। उन गाय-बछड़ों और ढोर-डांगरों की पूरी सार-संभाळ उनके ही जिम्मे रहती थी। फकत् एक गोरधन राईका और उसकी घरवाली उनके घर-बाहर के काम में थोड़ा हाथ बंटा देते, जो गरीब थे और उनकी ही शरण-सहारे से अपना पेट पालते थे, लेकिन यह धीणा और धान किस तरह अंवेरना है, यह देखने का काम तो भाभू का ही होता था। आगे चलकर भाभी ने भी कुछ अपना आपा और मन मिला दिया था। इस बार भाभू से बात करते हुए मुझे इस बात का अचंभा हुआ कि उन्होंने एक बार भी किसी बात में भाभी का जिक्र नहीं किया। यह बात मुझे पूछने पर ही पता लगी कि वे अपने पीहर जयपुर गई हुई हैं, उन्हें सरकार की तरफ से शहीद की विधवा के नाम पर कोई बडी इमदाद मिलने वाली है।

फौज में एक सिपाही या हवलदार की कितनी-सी वक़त होती है, यह बात खुद घर के बड़े बेटे शिवदान ने अपनी उन्नीस बरस की नौकरी में अच्छी तरह से समझ ली थी। बारहवीं पास करने के बाद वे बी.एस.एफ. में एक हवलदार के रूप में भरती हुए थे और इतने बरसों में फकत् सूबेदार-मेजर के ओहदे तक पहुंच पाए थे। जो तो उन्होंने नौकरी में रहते हुए प्राइवेट बी.ए. भी कर ली थी। खुद भाभी भी दसवीं पास थी, लेकिन भाई की हिदायत के कारण घर के किसी काम में पीछे नहीं रहतीं। वे कहतीं, अपने घर और खेत में काम करते किस बात की शर्म या शंका! उनकी दो बेटियां हैं और दोनों अच्छी पढ़ाई कर रही हैं। बड़ी बेटी सुगन को शिवदान ने खुद वनस्थली ले जाकर भर्ती करवा दिया था। सुगन ने पिछले साल सीनियर सेंकेण्ड्री की मेरिट लिस्ट में अपनी जगह बनाई और फिर पी.एम.टी की परीक्षा पास कर मेडिकल में दाखिला लेने में कामयाब रही। उससे छोटी मेघा भी कम नहीं है।
शिवदान का बारहवां बीतने के बाद भाभी के पिता और भाइयों ने बहुत निहौरे किये कि वे उनके साथ पीहर में रहें और दोनों बेटियों को शहर में रखकर पढ़ाएं, लेकिन उस वक्त तो भाभी ने साफ मनाही कर दी थी। कहा,‘’बाबोसा, यह मेरा अपना घर है और ये सास-ससुर ही अब मेरे मां-बाप हैं, मैं इन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।‘ जीसा को जब इस बात का पता लगा तो उन्हें अपनी इस बहू-बेटी पर बहुत गर्व हुआ और पहली बार उनकी आंखों में आंसू की दो बूंदें दिखाई दीं।

असल में शिवदान पर जीसा की बढ़ती उम्मीदों की एक बड़ी वजह खुद शिवदान की अपनी नयी सोच और घर को उस पुराने ढर्रे से बाहर निकाल लाने की उनकी जिजीविषा थी। गांव में बिजली आते ही उन्होंने सबसे पहले कोशिश करके घर में बिजली लगवाई। खेत की जमीन के नीचे गहराई में अथाह पानी था, उन्होंने सरकार और बैंक से मदद लेकर गांव में सबसे पहले अपने खेत में ट्यूब-वैल खुदवाया और खेती के लिए नये साधन-तरीके अपनाए। उन्हें छुट्टी भले ही कम मिलती हो, लेकिन दूर बैठे ही वे घर की व्यवस्था सुधारने में पूरी रुचि लेते थे। नये साधनों और तकनीक के कारण खेती की उपज भी चौगुनी हो गई। खुद शिवदान नौकरी से रिटायरमेंट लेकर घर की व्यवस्था संभालने के लिए आने के बारे में सोच रहे थे और इसी की खातिर उन्होंने अपने परिवार को गांव में ही बनाए रखा। खुद भाभी ने भी अपने पति की इस योजना को खूब बढ़ावा दिया और उनकी गैर-मौजूदगी में वे सारी जिम्मेदारियां निभाने को तैयार रहतीं, जो इस बदलाव के लिए जरूरी थीं।

घर की माली हालत में रातों-रात तब्दीली आ गई। खुद मुझे भी बड़े शहर में रहकर अपनी सी.ए. की पढ़ाई करते हुए कभी तंगी महसूस नहीं हुई। वे कोई मैनेजमेंट का कोर्स किये हुए आदमी नहीं थे, लेकिन उनकी व्यावहारिक बुद्धि अच्छे-अच्छे मैनेजमेंट किये हुओं को पीछे छोड़ देती। खुद मेरी पढ़ाई के खर्चे पर भी उनकी पूरी नज़र रहती। उन्हें भरम में रखकर कोई फिजूल-खर्ची कर लेना असंभव था। उनकी इच्छा थी कि मैं किसी बड़ी कंपनी में चार्टेड अकाउण्टेंट बनूं। इस मामले में जीसा की राय शुरू से ही अलग थी। वे कहते थे कि मैं भले सी.ए. करूं या एम.बी.ए., कोई सरकारी या प्राइवेट नौकरी की तजवीज करने की बजाय यदि अपनी खेती या घर के धंधे में रुचि लूं तो वह किसी भी नौकरी से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। लेकिन मुझे भाई की राय ही ठीक लगती थी।
पिछले दो वर्षों में मैंने खूब मेहनत की थी और यह शायद उसी का नतीजा था कि एक भी साल बेकार गंवाए बिना मैंने सी.ए. की डिग्री समय पर हासिल कर ली। पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद कई जगह आवेदन-पत्र भिजवाये। कुछ बाहरी कंपनियों और बड़े बैंकों की मांग के अनुसार अपना बायोडेटा भेजकर इंतजार करता रहा कि कहीं से कोई बुलावा आयेगा। पहली कोशिश तो यही थी कि अपने ही आस-पास के किसी शहर में मन-रुचि का काम मिल जाए, तो घर से ज्यादा दूर जाने की नौबत न आए।
सी.ए. करने के बाद जब तक दूसरे काम की व्यवस्था नहीं हो गई, मैं बीकानेर की उसी कंपनी में बराबर काम करता रहा, जिसमें काम करते हुए मैंने अपनी शिक्षा पूरी की थी। यों कंपनी की साख अच्छी थी और देश के दूसरे शहरों में भी इसकी अपनी शाखाएं थी। उसके मालिक तो यहीं के निवासी थे, लेकिन कंपनी का हैड आफिस उन्होंने मुंबई में ही बना रक्खा था, जहां मैं पहले भी कई बार जा चुका था। मैं कंपनी के नये प्रोजेक्ट पर काम कर ही रहा था, तभी एक दिन मुझे मुंबई से इंटरव्यू के लिए बुलावा आ गया। कंपनी से तीन-चार दिन का अवकाश लेकर मैं मुंबई निकल गया।


इंटरव्यू अच्छा ही हुआ था, लेकिन मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। पांचवें दिन मैं वापस अपने शहर लौट आया और वापस कंपनी के काम में लग गया। महीना पूरा होने से पहले मुंबई से भी बुलावा आ गया। बुलावे पर जाने से पहले मुझे जीसा और भाभू से इजाजत लेनी जरूरी थी, क्योंकि शिवदान की अकाल मृत्यु के बाद जीसा ने अपनी सारी उम्मीदें और जिम्मेदारियां मुझ पर छोड़ रखी थीं और उनसे बिना पूछे कोई कदम उठाना तो और बड़ी गलती होती। मैं उन्हें यह समझाना चाहता था कि बैंक की यह नौकरी, जीवन में आगे बढ़ने का एक अच्छा मौका है, खुद भाई की भी यही राय थी कि मैं किसी बडी कंपनी से जुड़कर काम करूं।
‘‘जीसा, अपने लिए यह खुशी की बात है कि मुझे मुंबई से एक बड़ी बैंक में काम करने के लिए बुलावा आया है.... मैं आपकी इजाजत लेने के लिए आया हूं...! उन्होंने मुझे अगले हफ्ते ही मुंबई आने के लिए कहा है... आप कहें तो मैं कल ही उन्हें अपनी मंजूरी भेज दूं... आखिर मैंने ही हिम्मत जुटा कर जीसा के सामने अपनी इच्छा प्रकट कर दी। जीसा बिना कोई उत्तर दिये अलाव से उठती ज्वालाओं की ओर देखते रहे... उन्होंने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, फकत् एकबार मेरी ओर देखा और वापस नज़र नीची कर ली...वे शायद उत्तर तलाश कर रहे थे... किसी गहरी चिन्ता में डूबे हुए!

उन्हें यों चुप और गुमसुम बैठे देखकर मुझे चिन्ता भी हो रही थी। फिर यह भी लगा कि नौकरी के लिए इजाजत मांगना तो इतनी चिन्ता का कारण नहीं होना चाहिए, मैं खुद एकबारगी चिन्ता में पड़ गया और विचार करने लगा कि ऐसा क्या कारण हो सकता है, अगर बिना पूछे चला जाता तो जीसा और घरवालों का उम्र भर का उलाहना रह जाता और पूछ रहा हूं तो यह हाल है! मुझे अपने सामने एक-टक निहारते देखकर वे बोले, ‘बुलावा आ गया, वह तो बड़ी बात है, लेकिन यहां के घर-परिवार के बारे में क्या सोचा है, इसे किसके भरोसै छोड़ने का इरादा है... मेरी उम्र इकहत्तर पार कर गई है...इसी के आस-पास अपनी मां की जान लो... अब कोई दुबारा तो जवान होने से रहे... पीछे रही तुम्हारी भाभी और उनकी दोनों बेटियां, तो उनकी रखवाली और संरक्षण मुझे तो तुम्हारे ही जिम्मे दीखती है, अब विचार कर लो कि तुम्हें क्या करना चाहिए... जीसा ने संजीदा स्वर में अपनी समझ से पूरी बात बता दी थी।

अपने तर्क को और वजनी बनाते हुए उन्होंने फिर आगे बात बढ़ाई, ‘मुझे तो यह समझा दो कि इस घर में क्या आज तुम्हें अपने जिम्मे कोई काम नहीं दीखता कि सैकड़ों कोस दूर जाने को तैयार हो गये... यदि नौकरी का उद्देश्य ऊंची कमाई करना है, तो वह भी हिसाब लगाकर देख लो कि क्या कोई नौकरी तुम्हें इस घर के काम से बढ़कर कमाई दे सकती है। हो सकता है कि बडे़ शहर में रहने की कुछ नयी सुख-सुविधाएं मिल जाएं... लेकिन अपने पूर्वजों की बरसों की कमाई और साख से बनाया हुआ यह घर क्या तुम्हें इतना सुकून नहीं देता कि उसकी अनदेखी करके उन सुख-सुविधाओं को ज्यादा महत्व दे रहे हो... थोड़ा सोच-विचार कर फैसला करें नरपत बना, क्योंकि अब आप बड़े हो, बालिग हो गये हो और आनेवाले दिनों में इस घर के मुखिया भी होंगे... मैं तो आज ही तुमको यह जिम्मेदारी सौंपने को तैयार बैठा हूं... इतनी बात कहकर वे चुप हो गये, जैसे अब और कुछ कहने को बाकी न रहा हो। उन्होंने मेरी चेतना और मर्म पर पूरा दबाव बनाया था और अपने मन निश्चिंत हो गये थे कि उनकी इस सोच का मेरे पास कोई तोड़ नहीं हो सकता...!
मुझे अचरज हुआ कि जीसा बदले हुए हालात से परिचित होते हुए भी, जाने क्यों अनजान-से बन रहे थे। वे जानते थे कि शिवदान के स्वर्गवास के बाद इन तीन वर्षों में भाभी की सोच में काफी फर्क आ गया था और वह मुझे तो स्वाभाविक ही लग रहा था। आने वाले दिनों में उनकी दोनों बेटियां अपना भविष्य किसी बड़े शहर के आश्रय में ही खोजने में लगी हुई हैं... खुद भाभी को जयपुर में शहीद विधवा के नाम पर एक पेट्राल पंप चलाने की सुविधा मिलने वाली है...।
मैंने भाभू से बात की तो उन्होंने तो इसे हंसकर ही टाल दिया। खुद भाभू, जो कभी बहुत-सी दुधारू गायों की मालकिन हुआ करती थीं, अब एक गाय रखकर ही संतुष्ट हैं और इतनी ही घर की जरूरत मानती हैं। पिछले तीन वर्षों से खेती हिस्सेदारी के आधार पर हो रही है... खुद जीसा का यही सोच है कि अब इतनी ही पार पड़ जाए तो बहुत है! इससे अधिक न घर की जरूरत है और न सम्हालनी ही संभव। खुद लोगों को कहते फिरते हैं कि यदि नरपत को इतनी ऊंची पढ़ाई करवाई है, तो कोई एक जगह बांधकर बिठाने के लिए थोड़े ही करवाई है। मैं यह बात अच्छी तरह समझता हूं कि आज सभी अपने मन की उलझन में निपट अकेले हैं, अपने सवालों के उत्तर से वे अनजान नहीं हैं, लेकिन आश्चर्य की बात है कि वे आज मुझसे ही इसका उत्तर और निराकरण मांग रहे हैं।
अपनी बात पर और बल देते हुए वे बोले, ‘मुझे तो यह बताओ नरपत बना कि कल को तुम्हारी शादी होगी, दुल्हन आएगी... दीखती बात है कि उसे तुम अपने साथ ही रखना पसंद करोगे... यह भी हो सकता है कि जहां काम लगो, वहीं किसी के साथ घर बसाने का संयोग बना लो....इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि तुम्हें इस घर में या इस हलके में खुद के टिकाव की कोई गुंजाइश दीखती हो।‘
मैं अपनी जुबान पर आती यह बात कहना चाहता था कि ‘जीसा, पंछी अपनी उड़ान के जिस मुकाम पर किसी डाल पर अपना रातवासा लेता है, वह एक तरह से उसका घर ही हुआ करता है और उसे इतनी छूट तो देनी ही पड़ती है कि वह अपनी पहचान कायम रख सके। इनसान की यह खासियत मानी जाती है कि वह भले ही दुनिया में कहीं किसी कोने में रहे-जीए, वक्त आने पर वह अपनी ज़मीन और जड़ जरूर ढूंढ़ लेता है। मेरे भीतर आपके और अपने बड़ों के दिये हुए ये संस्कार आज भी कायम हैं, इसलिए उन्हें अपनी सीख और संस्कारों पर थोड़ा तो भरोसा रखना ही चाहिए। लेकिन उन्हें ऐसा उत्तर देना शायद छोटे-मुंह बड़ी बात होती, इसलिए प्रत्यक्ष में तो मैं कुछ भी नहीं कह सका।
मैं जानता था कि उनके सवालों के उत्तर उन्हीं के धरातल पर खड़े होकर देना आसान नहीं था। इसी उलझन में एक-बारगी मैं अपने आप में अकेला-सा हो गया। जीसा, भाभू और भाभीसा की अपनी उलझनें थीं। खुद मुझे ही इन सारी बातों पर नये सिरे से विचार करना था और वह भी किसी के मन को बिना कोई ठेस लगाए। घर-परिवार का अहित किये बिना, ऐसा निराकरण खोजना था, जो उस पुश्तैनी घर का और मेरी अपनी जिन्दगी का, दोनों का मान रख सके...